ए रात अब मुझे सोने दे...
ए रात अब मुझे सोने दे...
ए बेबाकों वाली रात अब मुझे सोने दे,
हकीकत में न सही ,
पर ख्वाबो में तो अरमानो को पूरे होने दे.
ए रात अब मुझे सोने दे...
अब सही नहीं जाती है मुझसे वो तन्हाई वाली बातें,
तू है बेखबर कि कितना तड़पाती हैं वो बेहया यादें
मुझे कुछ सुनहरे ख्वाबो में अब खोने दे
ए रात अब मुझे सोने दे ...
कितनी मुश्किलें बढ़ जाती हैं उन फुरकत के लम्हो में फिर से जाकर,
सिमटती जाती है ये रूह जैसे मचलती है मछली पानी से बाहर आकर
तकिये के नीचे मेरे ज़ज़्बातों को अब संजोने दे
ए रात अब मुझे सोने दे...
सोचने में कितना वक़्त हो जाता है रोज ज़ाया,
बिना किये किसी को कुछ कहाँ है मिल पाया
मुझे उन ख्वाबों के लिए कुछ करने दे...
ए रात अब मुझे सोने दे...
इन ख्यालों के गहरे समंदर में मुझे इतना न डूबा,
हाथ पैर को कर आज़ाद थोड़ा तैरना सीखा
इन में तैरने की सीख तो होने दे
ए रात अब मुझे सोने दे...
इस बंद कमरे में अंधेरों से यूँ न मुझे डरा,
रातों में लगता है ये जैसे भूतों से हो भरा
मुझे इन डरो से अब दूर होने दे
ए रात मुझे सोने दे...
इस सूखे बंजर ज़मीन पर बेदर्द हल को न चला,
कर दुआ बारिश के होने की होगा इनका भला...
अश्कों से सींचकर इस पर बीज तो बोने दे...
ए रात अब मुझे सोने दे...
कल की सोचकर हम कल को भी आज में ही जिये जा रहे है,
आज को आज इसी तरह हम अँधेरे में ही किये जा रहे हैं,
आज में आज के दीप को तो जलने दे,
ए रात अब मुझे सोने दे...
ए रात अब मुझे सोने दे...
