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Aditi srivastava

Others

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Aditi srivastava

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देश - बंदी के दो पहलु

देश - बंदी के दो पहलु

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एक काल जो ऐसा आया है 

एक जलती लहर सी लाया है

बंद हुए कईवाड सभी घर के

कुछ बिछड़ - बिलखते मर- मर के 


देश - बंदी के अपार नज़रिए 

कुछ कहते हैं यह मौका है 

साहब, मेरे लिए तो ये काल का झोंका है 

 


आओ घरों मे बैठे साथ 

जोड़ें उन यदों को 

करें कुछ बात - ए - मुलाकात 

  

मैं क्या जोड़ूं उन यदों को? 

टूट गया हूँ भीतर - भीतर 

विश्वास नहीं होता, निर्माता हूँ इन इमारतों का 

आज बिलट गया हूँ तितर - बईतर


घर की चार दीवारी मे सुरक्षित

चल कुछ खिल - कारियां लगाए 

संग अपनो के, आ एक महफ़िल जमाये 


हँसना ? वो तो भूल सा गया हूँ 

अब मेरी मंजिल का कोई कूल नही 

मर रहा हूँ - जी रहा हूँ 

घुट - घुट कर मैं हस रहा हूँ 


एक सूखी रोटी को तरसता हूँ 

जी - हुज़ूरई कर - करके थकता हूँ 

और फिर भी दुत्कआरा जाता हूँ? 


मजदूर हूँ, मजदूरी करता हूँ 

न जाने कितनो के घर सवरता हूँ

आज अपने घर जाने को तरसता हूँ

इन पैर के छालों पर बिलखता हूँ 


मत सोच की विवश हूँ मैं 

मत सोच की लआचर हूँ मैं 

अब भी इतनी हिम्मत है इन पैरों मैं 

कितनी राह चल दूँ, हज़ार मैं 


बस थोड़ा सा ख़फ़ा हूँ मैं 

की इसी परिवार का सदस्य हूँ न मैं ? 

फिर भी सड़कों पर धकेला जाता हूँ मैंं 

अब बंद करो ये मारा-मारी 

न सही जाए अब ये गैर - जिम्मेदारी !


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