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अमिता मिश्रा 'निःशब्द'

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4.3  

अमिता मिश्रा 'निःशब्द'

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अजब महीना है ये साहिब जी...!!

अजब महीना है ये साहिब जी...!!

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दोस्तों! यह पीताभ वसंत केवल प्रकृति का श्रृंगार नहीं, बल्कि कभी कभी लगता है मानो विरह और संयोग का सम्मिलित प्रत्यक्षीकरण है... क्योंकि जहाँ सरसों का खिलना मिलन के उल्लास और नव-जीवन के उत्साह को प्रकट कर रहा हो ठीक वहीं अमलतास का चुपचाप झरना उन मनों की व्यथा है जिनके हिस्से इस बहार में भी एक एकाकीपन आया हो। 

आज की यह कविता वसंतोत्सव के इसी दोहरे रंग को टटोलती है—जहाँ उत्सव की चकाचौंध के पीछे कहीं विरह का पीलापन भी छिपा है।..💕

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💛"अजब महीना है ये साहिब जी...!! ईमानदारी से कह रही हूँ... 

मुझे समझ नहीं आता कि..... सरसों का पीलापन प्रकृति का उल्लास है...  या उसका हरा रक्त.... सहम कर पीला पड़ गया है.... 

आम के बौर समझ लूँ यही बहुत है... पर अमलतास का उल्लास में झरना.... मुझे समझ नहीं आता... साहिब! 

 सच कहूँ तो.... सरसों के फूल जैसा बसंत आता तो है दिल पर 'निःशब्द', सरसों जैसी चार पल की पत्तियों वाला..., 

अभी था अभी झर गया।"💛


अंत में लेखिका की कलम से:

"सरस्वती पूजन के आध्यात्मिक उल्लास के बाद, अब वसंत अपने पूर्ण यौवन पर है। अमलतास को झरते देख अक्सर मन इस सोच में पड़ जाता है कि क्या हर पीलापन खुशी का ही संदेश है? 

क्योंकि साहित्य जगत में वसंत अक्सर संयोग का पर्याय माना गया, पर मेरा मानना है कि झरने वाले फूल उन विरही मनःस्थितियों का दर्पण हैं जो इस उत्सव में भी खुद को एकांत में पाते हैं। यह रचना प्रकृति के उसी विरोधाभास को समर्पित है, जो एक ओर खिलती है तो दूसरी ओर चुपचाप बिखर जाती है।"


 🙏अमिता मिश्रा 'निःशब्द'...💐 

🙏💛आप सभी को वसंत ऋतु की मंगलकामनाओं सहित💛🙏




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