अध्यात्म विश्वास या फिर गुरुओं माया जाल
अध्यात्म विश्वास या फिर गुरुओं माया जाल
जिंदगी के बढ़ते-घटते पढ़ावों पर
जिंदगी के नए-नए मुकामों पर
कभी-कभी थक - हार कर
और कभी-कभी कामयाबी की
करार पर
तुम हमेशा याद आते हो
मेरी आस्था के विश्वास में
मैं अक्सर थक जाती हूं,
जब मैं हार जाती हूं
मैं विश्वास का दिया जलाती हूं,
और तुम्हें मनाती हूं
लोग मुझे देखकर तुमसे मिलवाने
वाले गुरु का नाम बताते है
वो रास्ता बता देगा,
पर चलना मुझे होगा
लोग अक्सर ऐसा कह जाते है
वो फोटो तेरी लगाकर के
अक्सर कहानियां सुनाते है
वो अक्सर खुद को
भगवान का ठेकेदार बताते है
भगवान के नाम पर वो लाखों
ढोग रचाते है
तुझ पर मेरे विश्वास का अक्सर
गला वहीं दबाते है
तू देख रहा है सब कुछ
फिर भी क्यूँ खामोश है
देख तेरे संसार में सब
तेरे ही इंसान है
पहले सत्ययुग और अब कलयुग
अब क्या आगे आएगा
तू बता तू भगवान है
या फिर आध्यात्म
बस एक भ्रम का विश्वास है
