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झाड़ू
झाड़ू
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© Sushant Supriy

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एक दिन पत्नी ज़िद करने लगी , " अपने पहले प्यार के बारे में बताइए न । आपके जीवन में मेरे आने से पहले कोई तो रही होगी । स्टूडेंट-लाइफ़ में आपने किसी से तो इश्क़ किया होगा । "
           मैंने मुस्करा कर उसे टालना चाहा । लेकिन वह अड़ गई , "आज तो आपको बताना ही होगा । मैं आपके बारे में सब कुछ जानना चाहती हूँ । देखिए , यह आपके जीवन में मेरे आने से पहले की बात है । मैं बिल्कुल बुरा नहीं मानूँगी । मेरी ओर से निश्चिंत रहिए । बताइए न , प्लीज़ । "
           यह स्मृति की जमी हुई झील की सतह पर स्केटिंग करने जैसा था । ख़तरा यह था कि न जाने कहाँ बर्फ़ की सतह पतली रह गई हो । आपने वहाँ पैर रखा नहीं कि सतह चटख जाए और आप उस झील में डूबने लग जाएँ ।
           मैंने पत्नी को टालना चाहा । पर वह नहीं मानी । हार कर मैंने जोख़िम उठाने का निश्चय किया ।
           " आज मैं तुम्हें झाड़ू की कहानी सुनाऊँगा । " मैंने कहा । मेरी स्मृति में कहीं एक सलोनी छवि अटकी थी । अधमिटे अक्षर-सी बची हुई थी कोई अब भी मेरी स्मृति के पन्ने पर । अस्फुट स्वर-सी बजती थी कोई अब भी मेरे ब्रह्मांड के निनाद में ।
           " मैं झाड़ू की नहीं , आपके पहले प्यार की कहानी सुनना चाहती हूँ । " पत्नी ने ज़रा खीझकर कहा ।
           " सुन सकोगी ? " मैंने पूछा ।
           " हाँ , मैं तैयार हूँ । " जवाब आया ।
           " मैं जब भी झाड़ू देखता हूँ , मुझे किसी की याद आ जाती है । " मैंने कहा ।
           " किसकी ? "
           " उसकी, जो कहती थी -- यातनाओं के सैकड़ों हज़ारों वर्ष ज़िंदा हैं झाड़ू में । "
           कुछ शब्द आपको फिर से पीछे ले जाते हैं । उस अतीत की ओर जो किसी मरी तितली-सी बंद पड़ी होती है बच्चे की किताब के किसी भूले हुए पन्ने में ...

           जब भी काम वाली बाई नहीं आती , मैं झाड़ू उठा कर सारा घर ख़ुद ही साफ़ कर देता । पत्नी रोकती भी । कहती -- " लाइए , मैं झाड़ू मार देती हूँ । आप क्यों तकलीफ़ कर रहे हैं ? "
           लेकिन मैं नहीं रुकता । हालाँकि बेटा यह देखकर नाक-भौं सिकोड़ता । वह कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ता था । एक दिन वह कहने लगा -- " पापा , ये तो गंदा काम है । मेड्स का काम है । व्हाइ डु यू डू दिस डर्टी वर्क ? "
           तब मैंने उसे समझाया -- " बेटा , अपने घर का सारा काम ख़ुद करना आना चाहिए । कोई काम गंदा नहीं होता । अगर एक हफ़्ता मेड नहीं आएगी तो क्या तुम गंदगी में ही पड़े रहोगे ? फिर जो काम पसीना बहा कर किया जाता है , जो काम मेहनत से किया जाता है , वह काम कभी डर्टी नहीं होता । "
            धीरे-धीरे बेटा भी यह बात समझ गया । अब कभी-कभी काम वाली बाई के नहीं आने पर वह भी घर में झाड़ू लगा देता है ।

            " पहेलियाँ मत बुझाइए । अब साफ़-साफ़ बताइए कि किसकी याद आ जाती है आपको झाड़ू देखकर ? " पत्नी पूछ रही थी ।
            " वह कॉलेज में मेरी सहपाठी थी । उसकी माँ लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा मारती थी । उस इलाक़े के एक मास्टर साहब ने उसे मुँहबोली बेटी बना कर पढ़ाया लिखाया था । उसका नाम कुछ भी हो सकता था -- धनिया , झुनिया ... । लेकिन असल में उसका नाम कमला था । " मैंने कहा ।
            " तो आपको एक काम वाली बाई की बेटी से इश्क़ हो गया ! " पत्नी ने व्यंग्य से कहा ।
            " क्यों ? काम वाली बाई की बेटी इन्सान नहीं होती? उससे इश्क़ करना गुनाह है क्या ? " मैं बोला ।
            इस पर पत्नी चुप रही ।
            मैंने फिर कहना शुरू किया -- " जितनी मेधावी छात्रा थी वह , उतना ही ख़ूबसूरत उसका व्यक्तित्व था । "
            " फिर क्या हुआ ? आपने उसी से शादी क्यों नहीं कर ली ? " पत्नी ने पूछा । उसके स्वर में थोड़ी जलन थी ।
            " हालाँकि वह मेरे साथ पढ़ती थी , हँसती-बोलती थी , लेकिन उसके चेहरे पर उसका दर्द भरा इतिहास हमेशा ज़िंदा रहता था । हमारे बीच जातियों के जंजाल
का बार्ब्ड-वायर फ़ेंस मौजूद था । मैं इस कँटीली तारों के फ़ेंस को पार करना चाहता था । फ़ेंस के उस पार वह थी । फ़ेंस के इस पार मैं था ।
             " कमला के माँ की झुग्गी जिस जे. जे. क्लस्टर में थी उस जगह को एक बिल्डर ने ख़रीद लिया था । बिल्डर के गुंडे झुग्गी वालों को वहाँ से खदेड़ने के लिए उन्हें डरा-धमका रहे थे । हालाँकि कमला मास्टरजी के घर रहती थी लेकिन वह हफ़्ते में एकाध बार अपनी माँ और भाई-बहनों से मिलने के लिए माँ की झुग्गी में ज़रूर जाती थी । "
             " कमला के पिता नहीं थे क्या ? " यह पत्नी की आवाज़ थी ।
             " तुमने खैरलाँजी और मिर्चपुर की घटनाओं के बारे में पढ़ा-सुना है न । कमला के पिता अपने गाँव में उस ज़माने के खैरलाँजी-मिर्चपुर की बलि चढ़ गए । ऊँची जाति वालों के हमले में कमला के चाचा , ताया , दादा वग़ैरह भी मारे गए थे । तब कमला  की माँ किसी तरह जान बचा कर , कमला और उसके दो छोटे भाई-बहनों को ले कर इस शहर में भाग आई थी । " मैंने कहा ।
             " ओह ! " पत्नी के मुँह से निकला । " फिर क्या हुआ ? "
             " बिल्डर के गुंडे लगातार झुग्गी वालों को डरा-धमका रहे थे । एक रात कमला अपनी डरी-सहमी माँ और भाई-बहनों से मिलने गई । देर हो जाने की वजह से उस रात वह अपनी माँ की झुग्गी में ही रुक गई । वह रात उसकी अंतिम रात बन गई । " बाहर झुटपुटा ढह रहा था ।
             " क्या ? " पत्नी को जैसे झटका लगा ।
             " हाँ ! बीच रात में बिल्डर के गुंडों ने पूरी झुग्गी में जगह-जगह आग लगा दी । झुग्गी वाले नींद में ही जल कर मर गए । उनमें कमला , उसकी माँ , और उसके भाई-बहन भी थे । " मैंने रुँधी आवाज़ में कहा । गले में कुछ फँस गया था । आँखें नम हो गई थीं ।
              पत्नी ने मेरा हाथ पकड़ कर मेरा सिर अपनी गोद में रख लिया । मुझ पर झुकते हुए उसने धीरे से पूछा -- " आप बहुत प्यार करते थे उससे ? "
              बाहर अब सलेटी अँधेरा चूरे-सा झरने लगा था । एक थरथराहट समूची शिला-सी बह रही थी मेरी धमनियों में । वह थरथराहट चुप थी । पत्नी के वक्ष में मुँह छिपाए ।
              " बिल्डर के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं हुई ? " पत्नी ने पूछा ।
              " उसकी एप्रोच ऊपर तक थी । उसके पास रुपया था । कांटैक्ट्स थे ।इस मामले को शॉर्ट-सर्किट से हुई दुर्घटना बता कर रफ़ा-दफ़ा कर दिया गया । कहा गया कि झुग्गी वालों ने पोल पर काँटे डाल कर बिजली के दर्जनों अवैध कनेक्शन ले रखे थे । उन्हीं में स्पार्किंग की वजह से यह हादसा हुआ । जानती हो , अब उस जगह पर क्या है ? " मैंने पत्नी की गोद में से सिर उठा कर कहा ।
               " क्या ? "
               " वहाँ अब शहर का मशहूर अटलांटिक मॉल है जहाँ सभी मल्टीनेशनल कम्पनियों की चमचमाती दुकानें हैं । शो-विंडोज़ में सजे-धजे मैनेक्विन्स हैं । एस्केलेटर्स हैं । शीशे वाली लिफ़्ट है । सारे चर्चित ब्रांड हैं । जहाँ रोज़ाना बाज़ार को ख़रीद कर घर ले आने के लिए अपार भीड़ जुटती है । वहीं मरी थी कमला , उसकी माँ , उसके भाई-बहन और उन जैसे दर्जनों बदकिस्मत ग़रीब झुग्गीवाले । "
              " अब आप उधर से गुज़रते हैं तो आपको कैसा लगता है ? "
              " कहीं पढ़ा था -- जगहें अपने-आप में कुछ नहीं होतीं । जगहों की अहमियत उन लोगों से होती है जो एक निश्चित काल-अवधि में वहाँ मौजूद होते हैं । आपके जीवन में उपस्थित होते हैं । उसे भरा-पूरा बना रहे होते हैं । मैं जब-जब उस मॉल को देखता हूँ , मुझे कमला और दूसरे झुग्गीवालों की दर्दनाक मौत याद आती है । यह मॉल उनकी लाशों पर खड़ा है । " मैंने कहा । एक पुराना दर्द जैसे ठंड के मौसम में फिर से उखड़ आया था ।
              "  एक बात पूछूँ ? क्या आपके कमला से अंतरंग सम्बन्ध थे ? " यह पत्नी थी । अपने अधिकार-क्षेत्र की सीमा पर खड़ी मुस्तैद प्रहरी-सी ।
              और मुझे वह शाम याद आ गई जब कॉलेज के बाद कमला मेरे साथ मेरे किराए के मकान पर आ गई थी ...

              ... सुबह मैं जल्दी-जल्दी कॉलेज के लिए भाग लिया था । सारा कमरा बेतरतीब पड़ा था । मेरा गीला तौलिया सिलवट भरी चादर वाले बिस्तर पर मुचड़ा पड़ा था । कुर्सी पर सुबह उतारे हुए अधोवस्त्र पड़े हुए थे । ऐश-ट्रे बना दी गई एक कटोरी में ढेर सारी राख जमा थी और जल्दी में आधी पी कर बुझा दी गई एक सिगरेट भी वहीं पड़ी थी । कमरे में सुबह झाड़ू लगाना भूल गया था । फ़र्श गंदा था ।
मेज़ पर चाय की जूठी प्याली और एक तश्तरी पड़ी थी जिसमें सुबह हड़बड़ी में बनाकर खाए ब्रेड-ऑमलेट के कुछ टुकड़े भी बचे हुए थे । कोने में मकड़ी के जाले
थे । दीवार पर मधुबाला की पोस्टर थी जिस पर गर्द की एक परत कपडे से साफ़ कर दिये जाने की अनंत प्रतीक्षा में बूढ़ी हो रही थी । तो यह था मेरा कमरा जहाँ कमला को बुलाने से पहले मैंने इस सब के बारे में सोचा ही नहीं था ।
              मैंने जल्दी से कमरे की बेतरतीबी को कुछ ठीक किया । कमला कुछ सकुचाई-सी कुर्सी पर बैठ गई । पलंग के नीचे से झाड़ू निकाल कर मैं फ़र्श बुहारने लगा ।
             और तब कमला ने कहा था -- " प्रशान्त , यातनाओं के सैकड़ों-हज़ारों वर्ष ज़िंदा हैं झाड़ू में । " उसका आधा चेहरा रोशनी में , आधा अँधेरे में था । उसका कथन बिना प्रश्नवाचक-चिह्न का एक सुलगता हुआ सवाल था जिसे अभी हल होना था । सदियों की पीड़ा जैसे उसके चेहरे पर जम गई थी ।
             मैं झाड़ू बिस्तर के नीचे रखकर उसके पास चला आया था । कँटीली तारों के फ़ेंस के दूसरी तरफ़ । स्वेच्छा से ।
             हौले से उसका हाथ पकड़कर मैंने प्यार से कहा था -- " स्मृति की पपड़ी को मत कुरेदो । घावों से ख़ून निकल आएगा । "
             यह कहकर मैंने उसके चेहरे पर गिर आई बालों की लटों को पीछे हटाकर उसका माथा चूम लिया था । कमला का खिंचा हुआ चेहरा मेरा स्पर्श पा कर धीरे-धीरे नरम पड़ने लगा था । फिर उसके चेहरे पर एक सलोनी मुस्कान आ गई थी जिसका मैं दीवाना था । हमारे भीतर इच्छाओं के निशाचर पंछी पंख फैलाने लगे थे ।
फिर कमरे की ट्यूब-लाइट बुझ गई थी और ज़ीरो वॉट का बल्ब जल गया था । एक चाहत भरी फुसफुसाहट उभरी थी । फिर एक मादक हँसी गूँजी थी ।
             खिडकी के बाहर एक सलेटी रात रोशनी के बचे-खुचे क़तरे बीनकर ले जा रही थी । लेकिन कमरे के भीतर हमारे अन्तर्मन रोशन थे ।
             धीरे-धीरे हवा कसाव से भर गई थी । दीवार पर दो छिपकलियाँ आलिंगन-बद्ध पड़ी थीं । मैं अपनी प्रिया के स्नेह-पाश में था । जैसे सबसे ज़्यादा चमकता हुआ नक्षत्र मेरे आकाश में था । उसके भीतर से सम्मोहक ख़ुशबुएँ फूट रही थीं । ज़ीरो वॉट के ताँबई उजाले में मांसल सुख अपने पैर फैला रहा था । मेरी धानी - परी मेरी बाँहों में थी । मेरी मरमेड मेरी निगाहों में थी । ऊपर गेंहुआ शंख-से उसके उत्सुक वक्ष थे जिनकी जामुनी गोलाइयों में अपार गुरुत्वाकर्षण था । नीचे ठंडी सुराही-सी उसकी कमनीय कमर थी जहाँ पास ही महुआ के फूलों से भरा एक आदिम जंगल महक रहा था । बीच समुद्र में भटकता जहाज़ एक हरे-भरे द्वीप पर पहुँच गया था ।
             एक ऐसा समय होता है जब तन और मन के घाव भरने लगते हैं , जब सपने सच होने लगते हैं , जब सुख अपनी मुट्ठी में होता है और मुँदी आँखें फिर से नहीं खुलना चाहतीं । जब सारी चाहतें ख़ुशबूदार फूलों में बदल जाती हैं और जीभ पर शहद का स्वाद आ जाता है । वह एक ऐसा ही पल था -- घनत्व में भारी किंतु फिर भी बेहद हल्का । समय का रथ एक उत्सव की राह पर से गुज़र रहा था ।
             अब हम दोनों कँटीली तारों के फ़ेंस के एक ही ओर थे । मन में उजाला लिए । उस रात बिस्तर पर एक-दूसरे से लिपटे हुए हमने ढेर सारी बातें की थीं । सपने सँजोए थे । मुझे क्या पता था कि उन सपनों की तह में मौत थी । मुझे क्या पता था कि मैं फूटने से ठीक पहले एक पारदर्शी बुलबुले को देख रहा था । ठीक दो दिन बाद कमला अतीत बन गई थी । इतिहास बन गई थी । मेरी उड़ान का आकाश खो गया था ...

             " बताइए न । क्या आपके उससे अंतरंग संबंध भी थे ? " पत्नी दूरबीन ले कर मेरी अतीत की दिशा में दूर तक देखना चाह रही थी ।
             मैंने अपने पैरों के नीचे स्मृति की जमी हुई झील की पतली परत को चटखते हुए सुना । डूबने का ख़तरा मँडराने लगा था ।
             जवाब में मैंने कुछ नहीं कहा । केवल पत्नी का माथा चूम लिया । मैं अपनी पत्नी से भी प्यार करता था । वह मेरे बच्चों की माँ थी ।
             पता नहीं , पत्नी ने मेरी इस हरकत का क्या अर्थ निकाला । शायद वह सब कुछ भाँप गई । स्त्री की छठी इन्द्रिय सब जान जाती है । लेकिन वह इतनी बड़ी बात भी झेल गई । बहुत बड़ा कलेजा है उसका । मैं इसके लिए उसे सलाम करता
हूँ ।
             इस घटना के बाद हमारे जीवन में केवल एक बदलाव आया । अब काम वाली बाई के नहीं आने पर जब कभी मैं पूरे घर में झाड़ू लगा रहा होता हूँ तो मेरी पत्नी मुझसे झाड़ू ले लेने का प्रयास नहीं करती है ।

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प्रेषकः सुशांत सुप्रिय
       

मौलिक कहानी

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