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रवानगी
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© Pratiman Uniyal

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आज विभाग में सुबह से गहमागहमी थी। ज्यादा बड़ा विभाग नहीं है। मात्र 7 लोग काम करते है रमेश जी को मिलाकर। और आज रमेश जी का इस दफ्तर में आखरी दिन है। नहीं नहीं... रिटायर नहीं, बल्कि अपने भविष्य को नया रंग देने के लिए सम्मानीय तरीके से इस्तीफा दिया था। भविष्य को नया रंग देना क्या होता है और क्यों कोई दस साल के बाद अचानक इस्तीफा देदे, यह राज दफ्तर के किसी भी व्यक्ति को नहीं पता चल पाया। रमेश जी को विभाग में सब सम्मान से देखते है, चूंकि विभाग में बॉस के बाद वरिष्ठता में उनका ही नंबर आता है तो उनको सेकेंड इन कमांड का दर्जा भी मिला हुआ है।

ठीक 8:45 बजे रमेश जी धीमे पर सधे कदमों से अपना केबिन खोलते हैं। पियून दौडता हुआ उनके पास आता है गुड मार्निंग सर। हमेशा की तरह आज भी रमेश जी सबसे पहले दफ्तर पहुंचा था। बाकी लोग 9:15 या 9:30 से पहले तो बिल्कुल नहीं पहुंचते, हां बल्कि बॉस के हमख्याला और हमनिवाला ज़रूर 10 बजे तक पहुंच जाते। पर रमेश जी हमेशा कहते है कि समय से आओ और अगर काम खत्म हो गया है तो समय से घर जाओ। हमेशा अपने काम से प्यार करो, कंपनी से नहीं। परिवार ही जीवन भर साथ रहेगा, कंपनी हमेशा साथ ना देगी।

संजय, पियून उनके पास आया, कहा, सर आज आप सच में जा रहे हो। हां भाई, जा रहा हूं, पर सिर्फ इस कंपनी से। मेरा घर तो तूने देखा ही, जब मन करे आ जाना और जो नया काम मैं शुरू करने जा रहा हूं, उसमें तेरी ज़रूरत पड़ेगी। पियून की नहीं बल्कि एक अफसर की। संजय की आंख में आंसू आ गए। तीन साल पहले की बात थी। संजय को पियून के रूप में काम करते हुए तब एक साल हो गया था। उसको दुनिया जहान की जानकारी होती। कई बार पर जब कोई सीट पर नहीं होता और फोन की घंटी बजती तो बिल्कुल पेशेवर तरीके से वो फोन पर बात करता और संदेश लिख लेता। कभी जब बाहर से एग्जीक्यूटिव लेवल का कोई आता अपना गिफ्ट का सैंपल दिखाने के लिए, तो संजय हमेशा उस माल में मीन मेख निकालता और पैसे कम करने की बात करता। कभी जब बॉस उसे कहती कि अखबारों से कंपनी की खबरे निकालो तो वह हिन्दी अंग्रजी अखबारों से अपनी कंपनी की खबरे निकालता, काटता और फाईल में चिपकाता। एक दिन रमेश जी ने कहा कि तू बीए क्यों नहीं कर लेता। कैसे करूं सर, 12 घंटे यहां काम फिर घर में पूरा परिवार। ना समय निकाल पाउंगा और ना ही फीस के पैसे हो पाएंगें। रमेश जी ने सलाह दी की पत्राचार से तो लगभग हर यूनिवर्सिटी बीए कराती है और उनकी फीस भी कम होती है। जोर डालने पर अगले हफ्ते संजय फॉर्म ले आया। रमेश जी ने अपने हाथों से उसका फॉर्म भरा और कहा फीस की कभी चिंता पर करना, मैं हूं ना।

दोे महीने पहले ही उसने सबको मिठाई खिलाई थी। उसका बीए पूरा हो गया था। एक चपरासी ग्रेज्यूएट हो गया, कुछ को यह बात हजम नहीं हो पा रही थी। पर रमेश जी सबसे ज्यादा खुश दिखे। एक महीना गुजरने के बाद रमेश जी ने संजय से पूछा कि बीए तो कर लिया अब एमए कर ले। संजय ने कहा कि सर मैं आपसे सलाह लेने ही वाला था कि एमए करूं या कुछ और। कुछ और क्या। सर एमबीए। क्या एमबीए, पागल मत बन, नहीं हो पाएगा तुझसे और फीस भी तो हजारों में होगी। संजय अपने बैग से एक ब्रोशर निकालकर लाया। सर यह निजी विश्वविद्यालय पत्राचार से एमबीए कराता है और क्लासेस सिर्फ शनिवार और इतवार। फीस तो देखिए हर सेमेस्टर में सिर्फ 7500 रूपये। रमेश जी ने कहा कि पर तेरा वेतन तो सिर्फ 7000 है फिर पूरा परिवार। अरे सर, संजय ने समझाते हुए कहा कि हजार बारह सौ हर महीने जमा करूंगा। सर, संभाल लूंगा परिवार को। अगर कुछ करना ही है तो कुछ झेलना भी पडेगा। और सर ऐसा करो आज आप इनके सैंटर चलो। आप को ज्यादा आइडिया है। अगर आपको ठीक लगा तो एडमिशन ले लूंगा। रमेश जी ना केवल संजय के साथ सैंटर गए बल्कि उसका फॉर्म भी भरवा दिया साथ ही साथ एडमीशन और पहले सेमेस्टर की फीस भी तुरंत वहीं जमा करा दी। संजय को सिर्फ इतना कहा कि एमबीए बन के दिखा और बता दे इन ऑफिस वालों को कि चपरासी भी अफसर बन सकता है।

पता नहीं क्यों आज संजय कांपते हाथों से चाय लेकर रमेशजी के केबिन में दाखिल हुआ। सर मत जाओ। उसी वक्त अखिल दफ्तर में दाखिल हुआ। डील डौल के कारण वह विभाग का महाबली भीम है। पर आज अखिल की चाल भी सुस्त थी। रमेश जी का केबिन सबसे पहले पड़ता है। अखिल अंदर घुसा और सामने की कुर्सी में धंसते हुए बोला। सर, पक्का जा रहे हो ना। प्लान तो नहीं बदलोगे। आखिर आपके बाद मैं ही संभालूंगा आपका केबिन। अखिल की आंख से आंसू टपाटप झर रहे थे। रमेश जी भी मुस्कुराते हुए बोले हां कमीने अब तू यहां पर राज करियो। राज। हां सर राज करने के दिन आ गए एक आप ही कांटा थे।

बहुत गहरी दोस्ती है अखिल और रमेश जी की। अखिल के बडे भाई संदीप, रमेश जी के कॉलेज के जमाने के दोस्त है और आज भी संदीप और रमेश के परिवार वाले दोस्ती से ज्यादा रिश्तेदारों वाला व्यव्हार करते हैं। करीब नौ दस साल पहले जब दोनो की शादी नहीं हुई थी तो अमूमन रोज ही एक दूसरे के घर आया जाया करते थे। अब कहां इतनी फुर्सत। बहरहाल, एक दिन संदीप ने कहा कि उसका छोटा भाई किसी भी एंट्रेंस में निकल नहीं पा रहा है। कौन सा कोर्स करे की भविष्य में नौकरी मिल जाए। रमेश जी ने कहा कि जो कुछ नहीं कर पाते वह पत्रकारिता करते है। और इस तरह से अखिल का पत्रकारिता में प्रवेश हुआ। फिर अखिल ने छोटे मोटे अखबारों में काम किया पर आय ज्यादा नहीं होती और उसकी शादी करवाने के लिए परिवार का दबाव। संदीप को रमेश जी ने सलाह दी कि हमारा दफ्तर जनसंपर्क कार्यालय है और अखिल के पास पत्रकारिता का अनुभव भी है तो हमारे यहां नौकरी के लिए अपना बॉयोडेटा भेज दे। इस तरह अखिल का विभाग में प्रवेश हुआ।

रमेश जी हमेशा अखिल को कहते कि तू मेरे छोटे भाई समान है इसलिए यहां चिंता मत करना। अखिल भी बहुत मान देता है रमेश जी को। रमेश जी दिल्ली में रहते और अखिल गाजियाबाद। इन दोनो की दोस्ती इस कदर घनघोर थी कि रोज शाम को एक साथ निकलते और कभी अखिल दिल्ली होते हुए गाजियाबाद जाते तो कभी रमेश जी गाजियाबाद होते हुए दिल्ली। अखिल को खाने का बहुत शौक है। दोनो के दोनो शाम को कभी किसी ढाबे में चाय ऑमलेट खाना, कभी किसी ठेले में लिट्टी चोखा या कचौड़ी समोसे आदि।

अभी कुछ महीने पहले रमेश जी के पास उनके केबिन में अखिल आया और सर नीचे झुकाकर कहा कि सर बहुत दिनों से आपसे सलाह लेने की सोच रहा था। क्या हुआ? सर, आपको पता है कि मैं भाई के साथ रहता हूं। उनका भी दो बच्चों का भरा पूरा परिवार है और अब मेरा बेटा बाबू भी बड़ा हो रहा है। कुछ महीनों में स्कूल जाना शुरू करेगा। अरे तो दिक्कत क्या है। सर, मैं कुछ दिनों से घर ढूंढ रहा हूं। एक पसंद कर लिया है, दो कमरो का है। मतलब, क्या कहना चाहते हो रमेश जी ने आंखों में आंख डालते हुए कहा। मैं भाई से अलग होना चाहता हूं। गुस्सा तो रमेश जी को इतना आया कि अगर दफ्तर ना होता तो एक झापड़ रसीद कर देते। पर इतना ही कहा कि अब बच्चा इतना बड़ा हो गया कि अपने मां बाप से अलग होना चाहता है। तुम्हारे मां पिताजी तो गांव में रहते है पर यहां किसने तेरे को बाप की तरह पाला। भूल गया कि तेरी भाभी तेरे को अपने बेटे जितना प्यार करती है। हां सर आप ठीक कह रहे है पर एक पौधा तभी पनप सकता है जब वह पेड़ से थोडा दूर रहे। अभी तक मैं पेड़ पर निर्भर था पर अब मेरा परिवार मुझ पर निर्भर है। आज नहीं तो कल यह दिन आएगा सर।

रमेश जी ने पूछा संदीप को मालूम है। ना हिम्मत नहीं हो रही। रमेश जी ने पलटवार किया मतलब जिस पेड़ से अलग होना चाहते हो उसी को नहीं मालूम। सर प्लीज आप ही भाई से बात करे। रमेश जी ने कहा कि देख अखिल मेरा उसूल है कि मैं पारिवारिक मामलों में नहीं पड़ता। अगर तुम छोटे भाई समान तो वो भी मेरा दोस्त है। अरे तुम्हे ना लगे या संदीप को ना लगे पर पूरा जमाने को तो यही लगेगा कि एक दोस्त ने दूसरे दोस्त का परिवार तोड दिया। ना, तुम्हे ही हिम्मत करके बात करनी होगी। ठीक सर, मैं बात करूंगा।
जब बेटा अलग होता है तो जिस तरह पिता अपने दुख को छुपा कर बेटे की मंगलकामना करते हुए स्वीकृति देता है वैसे ही संदीप भी मान गया। अच्छी बात यह हुई कि दोनो भाईयों का परिवार रोज ही एक दूसरे के घर जाते हैं और रमेश जी को भी दो घरों का व्यंजन चखने का मौका मिल जाता।

अरे कहां जा रहा है, रूक चाय यही पी ले। नहीं सर मैं अपनी सीट पर ही चाय पीउंगा। बहुत काम है। हां कामचोर तेरे को भी काम है, रमेश जी ने आंख मारते हुए कहा। उसके आंसूं थम नहीं रहे थे और कांपते हाथों से चाय को छलकाते हुए अपनी सीट पर सिर नीचे कर बैठ गया।

तभी धडधडाते हुए देवेश दाखिल हुआ। सर कैसे हो, अरे अखिल को क्या हुआ। ओह! अरे, आज तो आप, अरे सर, एक बार बोलो ना...। एचआर से कहकर आपका इस्तीफा रूकवा देते हैं। बॉस भी यही कह रहे थे कि उसे बोलो इस्तीफा वापस लेले। देवेश भाई अगर बॉस सीधे मुझसे कहती तो सोच सकता था। पर छोडो अभी नहीं जा पाया तो फिर कभी हिम्मत नहीं दिखा पाउंगा।

रमेश-देवेश-अखिल को पूरा ऑफिस त्रिदेव कहता। कुछ लोग थ्री मस्कीटियरस भी कहते। जोड़ी है ही इतनी बेजोड। तीनों के तीनों अगर पहिए है तो एक दूसरे के लिए स्टेपनी भी है मतलब तीनों एक। अखिल से पहले रमेश और देवेश की जोड़ी एसे ही थी बेजोड।

देवेश ने रमेश से कुछ महीने पहले दफ्तर ज्वाईन किया था। दस साल कैसे बीत गए। रमेश की शादी दिल्ली से दूर उनके अपने शहर में हुई थी। देवेश ना सिर्फ खुद आया बल्कि शादी की पूरी फोटोग्रफी और विडियोग्राफी का जिम्मा भी खुद लिया और फोटोग्राफर को लेकर भी आया। शुरू के कुछ साल तो रमेश, देवेश के साथ उनकी मोटरसाईकल में आते थे। रमेश महीने में एक या दो बार मोटरसाईकल में टंकी फुल के पैस देते। फिर बाद में रमेशजी ने कैब करवा दी थी। पर जब भी शाम को ऑफिस से निकलते हुए देर हो जाती तो बेधड़क देवेश की बाईक में बैठ जाते।

यादों की शो रील में तब खलल पड़ा जब बॉस की आवाज़ आई। खैर आज रमेश जी के पास कोई काम नहीं था। अपनी ज़िम्मेदारियों को बाकी लोगों में बांट दी थी। तो सोचा डेस्क और ड्राअर का अपना सामान ही अलग कर लिया जाए। डेस्क में अपना क्या होता। कंप्यूटर, फाईलें, टेलीफोन सब ऑफिस का था। बस एक डायरी थी पर उसमें भी ऑफिशियल जानकारियां थी। मतलब अब डेस्क बेगाना हो गया। ड्राअर भरा पूरा था। बहुत कुछ।

पहली नज़र एक फोटो पर पड़ी, ग्रुप फोटो, जब कंपनी के प्रोग्राम से सब लोग जयपुर गए थे। शायद 8 साल पुरानी बात थी, अखिल से पहले, वहां कंपनी की जयपुर ब्रांच का वार्षिकोत्सव था। सुबह सब लोग ‍- तब थे ही कितने, चार ‍- जयपुर के लिए निकले। रास्ते भर गाने गाते हुए, शोर मचाते हुए। ऐसा लग रहा था मानो अफसर नहीं, स्कूल ‍- कॉलेज के बच्चे जा रहे हो। मानेसर, नीमराणा, नीम का थाना, ना जाने कहां कहां गाडी रूकवा रूकवा कर खाने की फरमाईश करना, ऊंट दिखते ही गाडी रूकवाकर उसकी सवारी करना, चलती गाड़ी से बाहर की फोटो खींचना। समारोह खत्म होने के बाद जयपुर घूमना और शॉपिंग करना।

साड़ी की दुकान में रमेश और देवेश खरीददारी करने के लिए पहुंचे। मोलभाव पुरूषों के रगो में तो बहता नहीं है, जो दुकानदार ने भाव लगाए उसी पर कार्ड से भुगतान कर दिया। निकल ही रहे थे कि बॉस आ पहुंंची, साड़ियाँ देखी, कितने की ली। क्या!! 5 हजार। अरे दिमाग खराब है क्या। और आव ना देखा ताव दुकानदार से भिड़ गई। लड़के समझ के लूटोगे क्या। इस तरह की साड़ी अभी बीस मिनट पहले मै 800 में ले गई। यह वाली 1200 सौ में। ऐसा करते करते सभी साड़ियों के दाम बताए। वहां ग्राहकों का भी मजमा लग गया। अरे लूट मचा रखी है। पैसे वापस करो। पूरे 2 हजार। दुकानदार बोला, अरे मैडम इन्होने कार्ड से भुगतान किया है। तो मैं क्या करूं, तुम्हे पैसे मिल गए तो बाकी वापस करो। नहीं मैडम। ठीक, मैं अभी पुलिस को फोन करती हूं। और सच में फोन मिला दिया। दुकानदार की हवा खराब। बोला, अरे मैडम, मैं कर रहा हूं पैसे वापस। लो भाई 2 हजार, जाओ भाई। देवेश ने बॉस से पूछा कि अब पुलिस ने कॉल बैक कर दिया तो। बॉस ने आंखें झपकाते हुए कहा कि मैनें तो ड्राईवर को मिलाया था ताकि कार लेकर इधर ही आ जाए। मुझे जयपुर थाने का नंबर थोडे ही मालूम है।

बरबस हंसी फूट पड़ी, अरे दूसरा फोटो बॉस और उनका। हां... तब कंपनी के मालिक के बेटे की शादी हुई थी। बॉस को फोटो खिंचवाने का बहुत शौक रहा है। अरे यह फोटो दिवाली वाली, यह होली से पहले। ना जाने कितनी ही फोटो, ड्राअर ने अपने में समेटे हुई थी, जिसमें हर के साथ यादें लिपटी हुई थी। सोचा बैग में रखूं ना रखूं पर फिर रख ही लिया।
अरे यह क्या एक रॉलर कंघा। अखिल हर सुबह सबसे पहले आकर इसी रॉलर कंघे से अपने मैगी जैसे बाल बनाता और यह ज़रूर कहता कि इसकी सुइंयां इतनी तेज है कि आप पक्का गंजे हो जाओगे सर। पर सच, में रमेश जी के बाल कम हो रहे थे। पर रॉलर कंघे से नहीं बल्कि वंशानुगत।

लंच का समय हो गया था। रमेश ने दफ्तर के ऑवन से खाना निकाला और देवेश के डेस्क की तरफ बढ़ गया। यह एक पुराना अलिखित नियम था कि खाना सब एक साथ देवेश के डेस्क पर ही खाते थे। चाहे कोई नया हो या पुराना, सब एक साथ। यह भी एक नियम सा बन गया था कि देवेश अपना डिब्बा खोलते, बुदबुदाते और अपने घर फोन करके बोलते, क्या बेकार खाना बनाया है या इसमें नमक तो है ही नहीं। उनको और बाकियों को रमेश जी के घर के बने भरवां करेले बहुत पसंद थे और रमेश को देवेश के घर की लाल मिर्च लहसुन की चटनी। आज भी रमेश भरवां करेले लाए थे पर किसी का भी आज खाने का मन नहीं था।

तभी एचआर से पियून आया और रमेश से कहा कि सर आपके कागज तैयार हो गए है, आपको बुलाया है। मतलब विदाई का समय आ गया। यार मैं पहले खाना तो खा लूं। सब लोग बहाना बनाकर अपनी अपनी सीट पर बैठ गए पर खाना किसी ने नहीं खाया। आज पहली बार अकेले खा रहे थे रमेश जी। एक रोटी खाकर डिब्बा बंद कर दिया और अपने केबिन को बंद करके सामान अपने बैग में रखने लगे।

अपना बरसों पुराना बैग और अपनी चिरपिरचित मुस्कान ओढे बॉस के कमरे में गये और हमेशा की तरह कहा, राईट मैडम, अब जाने की परमिशन दीजिए। आज कॉन्टेक्ट की बजाए चश्मा लगा रखा था उन्होने। बॉस ने बिना निगाह ऊपर उठाए कहा ठीक है, ऑल द बेस्ट। लगा कि उनके चश्में के नीचें से कुछ बूंदे ढलक रही है। शायद मन का वहम था।

केबिन से बाहर आकर सबके गले मिले। अखिल तेरा पीछा नहीं छोडूंगा, साले अब तेरे घर आउंगा। आ जाना सर, आपका ही है। देवेश ने भी कहा कि मिलते रहना। बाकी लोग भी गले मिले। संजय पता नहीं कहां चला गया था। भागा भागा अंदर दाखिल हुआ। कुछ छुपाते हुए संजना, प्रकृति और मुस्कान को पकडा दिया।

रमेश ने हमेशा से संजना को अपनी छोटी बहन समान माना। जब भी कोई परेशानी होती तो अधकचरी पंजाबी में कहते तुस्सी चिंता ना करो, त्वाडा वीर इत्थे ही है। प्रकृति को आए हुए अभी महीना ही हुआ था पर रमेश सबसे कहते इस लड़की में सीखने की लगन है। आज जाते जाते भी संजना और अखिल को कहा कि देखो मैं जा रहा हूं पर प्रकृति उसकी कमी पूरी करेंगी बहुत होशियार है यह, समझो लेडी रमेश ही है। किसी भी रोते को हंसाने की क्षमता है रमेश में। किसी भी परिस्थिती में वह चुटकुले बोल सकते थे। उनके चुटकुले, जिसको संजना हमेशा पीजे कहती है। आज भी उनके पीजे सुनकर सब के होंठों पर हंसी आ गई।

संजना ने संजय का लाया हुआ पैकेट खोलकर किताब निकाल कर उसमें कुछ लिखा। प्रकृति ने चॉकलेट निकालकर दी। रमेश जी के पसंद के लेखक की किताब, जिसमें उन्होने लिखा था। एक बेहतरीन साथी को... सदा यूं ही खुश रहना और ऐसे ही खुशियां बांटना... और सबके नाम लिखे थे।

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