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चेहरों पर चेहरे
चेहरों पर चेहरे
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© Neela Prasad

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दिमाग जड़ था, अहसास जड़ थे, पर कुछ था जो लगातार खल रहा था। अमृत समझ नहीं पा रही थी कि क्या? क्या टूटा ज़िंदगी में, क्या बदला अचानक, जिसका न दिल को पता, न दिमाग को! बाहर से सब लगभग जस का तस - वही दीवारों से घिरा, एकरस, सूना-सूना -सा जीवन! पहले भी जीती रही थी, राजीव के इंतजार में इधर-उधर डोलते, पौधों को पानी और नौकरों को आदेश देते, बेटियों को दुलारते-डांटते, खुद नहाते-खाते, टी.वी. देखते, बाजार जाते, सब्जी खरीदते... सुबह होने पर खिड़की से परदे हटा देते और अंधेरा होते ही फिर से खींच देते... अब भी घर पर लोग इधर-उधर डोलते, नौकरों को धीमे स्वर में टोकते-डांटते, खाना बनवाते, सब्जियां खरीदते, अमृत के कमरे का परदा सुबह हटा, शाम को बंद कर देते, कपड़े पकड़ाकर उसे नहाने जाने, थाली पकड़ाकर खा लेने को कहते नजर आ रहे थे। बातें धीमे-धीमे हो रही थीं, खाना बिना उत्साह खाया जा रहा था। बे-रस से दिन बीतते जा रहे थे।

नजरों के सामने इतने लोग थे, पर उसे किसी से जीवन का कुछ साझा करने का मन नहीं था। ‘किसी के कंधे पर सर रखकर नहीं रोई, तो बीमार हो जाएगी’ -जाने कौन कह रहा था। ‘सिर्फ और सिर्फ अपने साथ नहीं रोई, तो उबर नहीं पाऊंगी’ -अमृत का दिल कह रहा था।

‘राजीव’ शब्द कानों में पड़ते ही नजरें उसे खोजने लगतीं। वह नहीं मिलता, तो झटका-सा लगता। ये क्या हुआ? कैसे हुआ? क्यों हुआ? मेरे ही साथ क्यों हुआ? इन सवालों के सवाल वह शांति से, खाली घर में अकेली डोलती खोजना चाहती थी–सिर्फ अपने साथ! घर की भीड़ उसे खल रही थी। कब तक रहेंगे लोग? उसे अपने लिए वही निश्चिंतता भरा एकांत चाहिए था जो राजीव के टूर पर रहते मिलता था। पता रहे कि राजीव घर पर नहीं है पर ज़िंदगी में सब ठीक है। दो-चार दिनों बाद राजीव आ जाएगा बाहर से और नौकर को चाय बनाने को कहकर, अमृत की बरजती आंखों को अनदेखा करता सूटकेस बेड पर डालकर ही खोलेगा। फिर चुपके से एक साड़ी, या कुछ और, उसके हाथों में थमा देगा। वह मुस्कराएगी और लेती हुई पूछेगी, ‘और क्या लाए?’ वह कहेगा ‘और तो कुछ नहीं, बस रिया के लिए यह सूट का कपड़ा’, या फिर कोई जेवर, नकली ही सही। बेटी के लिए कुछ नहीं होता तो वह तूफान मचा देती। अमृत के लिए कुछ नहीं होता, तो वह ही कौन-सा रूठने से बाज आती! पहले तो सिया के लिए भी आता था कुछ, पर उसकी शादी के बाद आना बंद हो गया। बेटी के लिए लाओ तो दामाद-नातिन के लिए कैसे नहीं लाओ?

उसे एकांत का अभाव बहुत खल रहा था। कभी सोचा थोड़े था कि राजीव के इतने-इतने रिश्तेदार आएंगे और फिर जाएंगे ही नहीं! पहले कभी किसी ने खोज-खबर ली नहीं न, तो अब अजीब-सा लग रहा है। पर वे नहीं आते तब भी लगता कि कोई आया ही नहीं, दुख के इन पलों में!

हां, यह दुख था जो खल रहा था। वह दुख देखना-महसूसना नहीं चाहती थी - पति का झटके से चले जाना तो एकदम नहीं! यह क्या कि टूर से आए, खाना खाते ही चेस्ट पेन शुरू, फिर डॉक्टर को दिखाया, हॉस्पिटल गए, मैसिव हार्ट अटैक हुआ... और उसके अगले दिन, लो जी, ये तो चले भी गए हमेशा के लिए! भरोसा ही नहीं हो रहा अब तक कि राजीव, उसका पति पलक झपकते एक बेजान शरीर में तबदील हो गया, जिसे इसी घर में लाकर जमीन पर रख दिया गया। अमृत तो शॉक के मारे सुन्न हो गई। घर चार-पांच दिनों तक रिश्तेदारों से भरा रहा, रस्में होती रहीं। अब सब जा चुके हैं, इन कुछ लोगों को छोड़कर! अब सोचिए तो संख्या में छह लोगों का होना, काफी लोगों का होना होता है। ये न जाते हैं, न अकेले में रोने देते हैं। जैसे ही आंखों में आंसू आएं, ये पास आकर पोंछने लगते हैं... ‘मत रो अमरत’, ‘मत रो भाभी’, ‘मत रो मामी’... ‘मत रो बहू’... अब अमृत रोए नहीं तो क्या करे?

 

तो क्या यह न रो पाना था, जो खल रहा था? एकांत में बिलख-बिलख रो लेती जी भरकर, तो दुख गल जाता, अंदर रखा बोझ टल जाता। टल पाता?

ये रुपये-पैसे की बातें कैसी हो रही हैं? उसने चुप्पी तोड़े बिना सोचा। एक पल को दिल में आया कि वह और राजीव यह सोचकर अफसोस से घिर जाया करहे थे कि सिया की शादी के वक्त किसी ने मदद को पूछा तक नहीं। शान से शादी हुई और लोग देखते रहे। अब तो पैसों की बातें वह बाद में सोचेगी। तत्काल तो कुछ पैसे राजीव के ऑफिस से आ गए हैं न! कुछ क्या, काफी सारे! दामाद ने बैंक में डाल दिए। राजीव की बुआ अमृत की नौकरी की बात कर रही थीं कि वह तो जनरल मैनेजर की वाइफ है, तो ऑफिस में कोई अच्छी पोस्ट मिलनी चाहिए। अमृत जड़ की तरह शून्य में ताकती रही। ऑफिस? मैं? ऑफिस तो राजीव जाता है! फिर याद आया कि ‘जाता है नहीं’, ‘जाता था’।

हां, राजीव का अभाव बेतरह खल रहा था।

 

रिश्तेदार विदा हुए तब जाकर अमृत खुद को आंसुओं और राजीव के साथ खुला छोड़ पाई। उस राजीव के साथ, जो अब था नहीं। बुलाने-पुकारने पर भी आता नहीं था। एकांत में दिल को समझाते, हिचक-हिचक रोते, राजीव की यादों में बसी कुछ दिन जी लेने के बाद, वह धीरे-धीरे वर्तमान में लौटने लगी।

राजीव अब दुनिया में नहीं है। अब वह पूरे का पूरा दिल में समा गया है। वहीं रहेगा हमेशा!

राजीव से शादी तो पारिवारिक दोस्तों ने तय करा दी। अमृत खूबसूरत कही जाने वाली तेज दिमाग लड़की और राजीव वेल सेटेल्ड कहा जाने वाला अच्छा -सा इंजीनियर। राजीव के मम्मी-पापा की ख्वाहिश कि कोई खूबसूरत-सी लड़की बहुत सारा दहेज लेकर घर आए, और अमृत के मम्मी-पापा का सपना कि दहेज भले बहुत सारा लगे, दामाद वेल सेटेल्ड, गुड लुकिंग, अच्छे परिवार का मिले। फिर बात कहां अटकती! हो गई शादी, दोनों परिवार खुश! और अमृत? वह खुशी-नाखुशी, पसंद-नापसंद, सुख-दुख के महीन मसलों में कभी नहीं उलझी। शादी हो गई, तो पति के घर आकर रहने लगी। पति सास-ससुर से अच्छा बर्ताव करती सजने-धजने में समय काटती जीने लगी। नौकर -चाकर थे ही, काम क्या करना होता! बस जी, खुद सजो, घर सजाओ, घूमो -फिरो, पैसे खर्चो जी भर के और जीते जाओ! पति से प्यार हुआ कि नहीं, पति को उससे प्यार हुआ कि नहीं, इन सब में उलझने की क्या जरूरत? ज़िंदगी ठीक तो थी। दो बेटियां हुईं, बाद में सास-ससुर गुजर गए, फिर बड़ी बेटी सिया को बीस की होते ही राजीव ने ब्याह दिया... और अब, जब छोटी रिया उन्नीस की है, राजीव चला गया। पैंतालीस की उम्र में विधवा हुई अमृत को एक नौकरी बैठे-बिठाए मिल गई और बेमन से सही, उसे ऑफिस जाने लगना पड़ा। उसने सारे बैंक अकाउंट खंगाले तो पता चला कि राजीव के पास उतना था नहीं, जितना जताकर अमृत के पापा से इतना दहेज ऐंठ लिया था। लो जी, यहां तो नौकरों को हटा देने की नौबत है। बस, एक मकान है अपना, वही कहो कि ससुरजी दे गए। वैसे बड़ा वाला मकान तो जेठजी को यह कहकर दे दिया कि वहां दो लड़के हैं... चलो जी, राजीव भी क्या करता, या वह खुद क्या कर सकती थी? ससुरजी की अपनी कमाई थी, जिसे चाहा दे दिया। अमृत तो तब सोचती थी कि राजीव के पास खुद इतना है कि जेठजी को मिले मकान से बड़ा मकान बनवा ले! असलियत तो अब उसके जाने के बाद खुली न!

नौकरी ज्वाइन करने गई तो अमृत ने साफ-साफ कह दिया,‘मैं जी.एम की वाइफ हूं, यह सोचकर ही काम दीजिएगा। मैं तो जी, ये कैटेगरी-वन वाले काम नहीं करूंगी।’ दिल में था कहीं कि ये रतन की वाइफ की तरह नहीं जीना कि पति तो तब भी छोटा-मोटा अफसर हो गया था, पर ये उसकी जगह नौकरी पाकर इतनी दीन-हीन बनी दिनभर सर झुकाए बैल की तरह कैटेगरी-वन वाले काम में जुटी रहती हैं कि... सी.जी.एम बोले, ‘भाभीजी, आप सोच भी कैसे सकती हैं कि हम आपसे कैटेगरी-वन वाले काम कराएंगे?.. आप तो बस बैठे-बैठे कम्प्यूटर पर डाटा एंट्री करो... नहीं मन हो, कुछ मत करो। ऑफिस आ जाओ, अटेंडेंस बना दो, बस!’

 पर ऑफिस में दिन भर बैठी-बैठी करती क्या, तो चलो डाटा एंट्री ही सही। सुबह उठकर कुछ भी पका लेती और रिया के कालेज चली जाने के बाद खुद एक खूबसूरत साड़ी पहनकर ऑफिस आकर बैठ जाती। एसी की हवा खाते-खाते कुछ काम शुरू करके मातमपुर्सी करने मिलने आने वाले लोगों से बातें करती रहती। सोचो कि पच्चीस सालों का साथ था, तो लगाव तो हो ही जाता है, साथ की आदत पड़ जाती है। राजीव उसे कभी नापसंद नहीं था। उसकी बहुत याद आती है, अभाव बेतरह खलता है, उसकी बात निकलते ही रोना आने लगता है कि राजीव ऐसे चला गया... अभी जिंदा रहता तो ज़िंदगी कुछ और होती! वह लाड़ करता, आराम से घर पर रखता और अमृत टी.वी देखती दोपहर गुजारती। सप्ताहांत पर होटल जाती, घूमती... दोनों हाथों खर्चा करती... अब तो जी, सब सोच-समझकर करना है। न होटलबाजी, न खुले हाथों खर्चा... पर किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि उसके पास उतना है नहीं, जितने का दिखावा करती है। साड़ियां तो खैर इतनी हैं कि पंद्रह सालों तक ऑफिस आना आराम से कट जाएगा। घर पर शानदार फर्नीचर, पर्दे, क्रॉकरी सब हैं। फिर भी पार्लर जाना, गृहस्थी चलाना, रिया को पढ़ाना, रिया के लिए ढंग के कपड़े, उसकी शादी... यह सब तो करना ही पड़ेगा।

अब देखिए कि ज़िंदगी कैसे बदल जाती है एक दिन में! राजीव का जूनियर - वह काला-कलूटा अमोल, आया तो था मातमपुर्सी करने, पर ऑफिस में कुछ ज्यादा ही देर सामने बैठ गया। टलने का नाम ही न ले और कहता जाए कुछ न कुछ राजीव के बारे में! अमृत धर्मसंकट में पड़ गई। जाने को कैसे कहे, ऑफिस में बॉस है उसका, और पहले भी घर आता ही रहता था। पर आखिर कितनी देर झेले? टालने की नीयत से बोली, ‘कभी घर आइए न’... और वह ‘ठीक है’, कहकर तुरंत उठ गया। उस समय लगा कि चलो, बला टली, पर शाम को टल चुकी बला फिर से सर पर सवार थी! वही-वही बातें ‘मैं जानता हूं कि आप कितनी दुखी होंगी’ वगैरह। सही है, वह दुखी है। पति के मरने पर सुखी कौन महिला हो सकती है? आजिज आकर चलताऊ ढंग से बोली ‘बैठिए, कॉफी बनाती हूं।’ अमोल ने फट से कहा, ‘नहीं, चलिए बाहर कहीं पीते हैं कॉफी। राजीव सर के साथ आप अकसर होटल जाती रहती थीं। अब नहीं जा पाना आपको खलता होगा और अकेले जाना अच्छा भी नहीं लगता होगा। आज मैं ले चलता हूं’। वह क्षण भर ठिठकी, फिर बोली ‘ठीक है, रिया को भी ले लेते हैं।’ रिया को असाइनमेंट कम्प्लीट करने थे, वह जाने को राजी नहीं हुई। वे दोनों अकेले ही गए... और लो जी, वहां तो वह सीधे कमरे में ले गया। बोला कि ऑफिशल डीलिंग है इस होटल से, हम तो हमेशा कमरे में ही कॉफी पीते हैं। सबों के साथ रेस्तरां में क्या पीना कि कोई प्राइवेसी ही न मिले! उसके बाद तो वह जाने कितनी बातें बनाने लगा और सोफे पर अमृत के पास आकर बैठ गया-एकदम पास!! अमृत की आंखों से झरझर आंसू बह रहे थे। पुरानी यादों से घिरी राजीव को बेतरह मिस कर रही अमृत को कतई पता नहीं चला कि कब उसके बहते आंसुओं को अमोल का रुमाल पोंछने लगा, अमोल के हाथ उसकी पीठ सहलाने लगे, कब चुपके से उसने अमृत को बांहों में ले बिस्तर पर लिटा दिया और कैसे-कब वे दोनों एक दूसरे में समाने लगे। कुछ मिनटों बाद अमृत को झटका-सा लगा। ये क्या हो गया? क्या मुंह दिखाएगी खुद को, रिया - सिया को?  वह तो पति खो चुकी मध्य आयु की विधवा है। जो हुआ, वह न तो पहला अनुभव था, न ही नया, न अमृत की किसी से कोई जवाबदेही थी। पर अमोल की तो बीवी है, बच्चे हैं और यह साला अमृत पर मिटा जा रहा है! कह रहा है बेशर्मी से कि मैं तो कब से मन ही मन आपको चाहता-सराहता रहा हूं। दीवाना हूं आपकी खूबसूरती, आपकी गुलाबी रंगत और सधी चाल का... आपके घर की साज-सज्जा, आपकी आवाज, आपकी सलोनी गुड़िया का...

उस रात को बिस्तर पर लेटी रोती हुई अमृत उलझने लगी। शर्म आ रही थी। कल ऑफिस कैसे जाएगी, अमोल से नजरें कैसे मिलाएगी? पर राजीव तो कहता था ‘सोचना, तर्क करना तुम्हारा काम नहीं। तर्क और सोच महिलाओं की सुंदरता छीन लेते हैं, उन्हें पुरुषों की तरह कठोर बना देते हैं। तुम बस जीती जाओ और सुंदर बनी रहो।’ इस विचार से उसे राहत महसूस हुई। अगर कमजोर पलों में सहारा देते हाथ आलिंगन बन भी गए, सान्त्वना के शब्द कहते होंठ उसके होंठों से चिपक भी गए, उसकी देह अमृत की देह से मिल भी गई, तो भूल जाना ही अच्छा! सब ठीक हो जाएगा... कुछ मत सोचो और सो जाओ। पता है, यह सब सोचती, देह के बहुत दिनों बाद मिले सुख के साथ, वह सचमुच बड़े आराम से सो गई!

 

अगले दिन ऑफिस में अमोल से नजरें मिलाने से बचना चाहती थी। एक बार हो गई गलती, तो हो गई... आगे से कुछ नहीं होना चाहिए, बस! पर वह घटना ‘सिर्फ एक बार की बात’ नहीं निकली! हां, राहत की बात यह रही कि अमोल साथ सोने लगा तो चलो, ख्याल भी रखने लगा, मान देने लगा। ऑफिस में ज्यादा काम नहीं करवाता, कोई उससे ऊंची आवाज में बोले तो तुरंत खबर लेता है। ‘मेरे बॉस की वाइफ हैं, कोई बदतमीजी नहीं करेगा। ये तो ऑफिस की शान हैं। बस मन लगाने को ऑफिस आ जाती हैं।’ अमृत मुस्करा देती। अमोल उसके लिए उपहार लाया था, रिया के लिए भी। रिया बहुत खुश हुई। वरना दामाद कुछ लाए तो लाए, उसके अलावा कौन पूछता है उन्हें! रिश्तेदारों को बस यही फिकर लगी है कि रिया की शादी के समय उनसे उधार न मांगा जाए।

 

अमोल के अक्सर घर आ जाने से आजिज रिया एक दिन बोल पड़ी­- ‘लगभग रोज ही ये अंकल हमारे घर आ टपकते हैं, इनका अपना कोई घर-बार नहीं है क्या?’

अमृत ने समझाया- ‘हमारी तो मदद ही कर रहे हैं। घुमा लाते हैं, गृहस्थी की जिम्मेदारियों में हाथ बंटा देते हैं, ऑफिस में मेरा ख्याल रखते हैं... अब और क्या चाहिए मुझे!’

रिया चुप लगा गई, पर अमोल ने सुन लिया। तुरंत बोला ‘आज रिया को घुमाने ले जाऊंगा, आपको नहीं। वह नाराज है मुझसे, और मेरा फर्ज है कि उसे भी खुश रखूं।’

अमृत ने जाने दिया। अमोल की अपनी बेटी भी रिया की उमर की ही होगी, क्या चिंता..

रिया दो घंटे में लौट आई। उसे कार से उतरती देख अमृत को खटका-सा हुआ। थोड़ी बिखरी-बिखरी -सी नहीं लग रही? पर उसने कुछ पूछा नहीं। रिया खुश थी, इतना काफी था। बीच-बीच में अमोल रिया को ले जाने लगा। ‘रिया को घुमाए बहुत दिन हो गए, आज आपको नहीं, उसे ले जाऊंगा’, वह कहता और रिया जाने को खुशी-खुशी तैयार हो जाती। आने के बाद न अमृत उससे कुछ पूछती, न वह बताती। पर एक दिन उसकी गर्दन पर चूमने के निशान ने सारी पोल खोल दी। कच्ची उमर और अमृत से भी गोरी रंगत है, तो चूमना-छूना सब दिख जाता है। अमृत फिर से उलझने लगी। आखिर हिम्मत करके बेटी से पूछा तो उसने बिना हिचक तुरंत बता दिया। अमोल उसे भी बिस्तर पर ले जाता है, यह सुनकर अमृत आसमान से गिरी। दिल बैठ गया। उसे एकदम से घबरा जाते देख रिया हंसती हुई बोली- ‘दिक्कत क्या है ममा, देह कहीं जूठी होती है? शादी आखिर किसी और से ही करूंगी... और तब ये ही अंकल बन, सारी रस्में निभाएगा। मदद करेगा, पैसे खर्चेगा…’ वह अवाक रह गई। गलत नहीं हो रहा था यह सब? ज़िंदगी में यह सब हो क्या रहा था? पर अब किया क्या जाए? तभी लगा कि राजीव सामने खड़ा हंसता हुआ कह रहा है (जैसे पहले कहा करता था, अमृत के किसी भी सवाल पर) ‘तुम्हारा काम है जीते जाना, सोचना-सवाल करना नहीं। सोचोगी, सवाल करोगी तो खूबसूरती कम हो जाएगी और ज़िंदगी बदमज़ा।’

अब खूबसूरती की तो खाक चिन्ता थी उसे, फिर भी लगा कि सच यही है कि हमें बस जीते जाना चाहिए। सही-गलत में पड़ने का वक्त यह था भी नहीं। अमोल को कुछ कहकर बात बढ़ाने, या दूसरों को सच बताने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था। उससे क्या हासिल होना था? उसने अमोल से मिलना, उसे घर बुलाना बंद करके ग्रेजुएशन कर रही रिया के लिए लड़का देखना शुरू कर दिया। कह दिया सभी रिश्तेदारों से कि चाहती हूं रिया की शादी जल्दी से हो जाए। रिया की किस्मत, कि जल्दी ही यू.एस. में रिश्ता पक्का हो गया। इतनी खूबसूरत, पढ़ने में तेज, अच्छे परिवार की लड़की और खर्च करने को अमृत पूरी तरह तैयार... तो ऐसा रिश्ता कौन छोड़ता!

 

अब जो भी कहिए, शादी तय होने की खबर सुनते ही, थोड़े अरसे उसकी ज़िंदगी से गायब रहा अमोल दौड़ा आया और चिरौरियां करने लगा- ‘जो हुआ, भूल जाइए। रिया है तो मेरी बेटी जैसी ही! उसकी शादी में काम का जिम्मा पूरी तरह मेरा।’ जबतक अमृत हर तरह की मदद लेने को तैयार नहीं हो गई, वह जमा रहा। सिया और दामाद सीरज के अलावा अगर किसी ने शादी में मदद की या खर्चा किया तो वह अमोल था। अमृत ने बहुत सारे गहने बेच डाले पर किसी को यह कहने का मौका नहीं दिया कि राजीव होता तो इससे ज्यादा शान से शादी होती। रिया के कुंवारी नहीं रहने वाली बात पर अमृत को थोड़ा तनाव था। दामाद रहता भले यू.एस. में हो, होगा तो आखिर उसी भारतीय मानसिकता का, कि खुद चाहे जितना खेला-खाया हो, पत्नी अनछुई चाहिए। अब अमृत और रिया की किस्मत कहिए, कि दामाद बहुत ब्रॉड माइन्डेड मिला। वह समझ नहीं पाया या फिर उसने इस बात को कोई मुद्दा नहीं बनाया कि रिया कुंवारी नहीं। हो यह भी सकता है कि रिया की खूबसूरती या ढेरों-ढेर दहेज ने उसे मुंह बंद रखने को मजबूर कर दिया हो। ऋषभ हर वक्त हंसता-हंसाता रहने वाला मसखरे किस्म का छोटा दामाद निकला और ससुराल में सबों से- यहां तक कि अमोल से भी  उसकी तुरंत दोस्ती हो गई। फिर तो रिया को ग्रेजुएशन पूरा करने तक अमृत ने रोका नहीं, दामाद के साथ सीधे यू.एस. भेज दिया। अब वहीं पढ़ लेगी कुछ!

 

अब आप समझ ही सकते हैं कि रिया की शादी के बाद अमृत कितनी अकेली हो गई! सिया को शायद उसके और अमोल के बारे में पता था। कहीं रिया ने ही तो नहीं बता दिया? सिया न मायके आती है, न अमृत को अपने घर बुलाती है। अब क्या पता कि अमोल ने खुद ही बताया हो रिया को, और रिया ने सिया को... पर रिया को पता होता तो क्या वह ऐसा स्वीकारती कि वह भी उसी के साथ सोए, जिसके साथ उसकी मां सोती है? क्या पता! कहा न, सही-गलत के विश्लेषण के चक्कर में पड़ने से अमृत हमेशा बचती रही है। जो होना था, हो गया। दोनों लड़कियां सुखी रहें, उसकी भी जरूरतें पूरी होती रहें और क्या चाहिए? नियति ने पति छीन लिया पर खूबसूरती तो बरकरार रखी न, कि किसी के द्वारा चाही जा सके! कोई ऐसा दे भी दिया जिसने पति की कमी उतनी खलने नहीं दी।

माफी मांग लेने के बाद अमोल फिर से उसकी ज़िंदगी में शामिल हो गया था। कहता रहता था कि अब तो उसे सपने भी अमृत के ही आते हैं। घूमना, साथ डिनर लेना, जमाने भर की बातें करना... कार में हाथ पकड़े, गाने सुनते दूर-दूर घूम आना... पर तब भी कभी-कभार एक झोंका उठता है अंदर... मन होता है कि खूब सुनाए साले को, कि रिया को क्यों नहीं बख्शा? बेटी की नजर से क्यों नहीं देखा, जब प्यार उसकी मां से करता था? पर सोचती है अमृत कि कहीं इन बहसों से अमोल उससे दूर न हो जाए। आखिर जो होना था, हो चुका। रिया को किस्मत से इतना अच्छा पति मिल गया, सुख से यू.एस. में रह रही है... अब क्यों बेकार में बात निकाली जाए! वैसे भी जाने कैसे ये काला-कलूटा अमोल अब इतना अच्छा लगने लगा है कि उससे सिर्फ देह का नहीं, दिल का रिश्ता भी हो गया लगता है। छू ही लिया आखिर इसने अमृत को अंदर-बाहर!

क्या प्यार इसी को कहते हैं? इतने अच्छे, गोरे-चिट्टे, खूबसूरत, मिठबोले राजीव के साथ रहते कभी ऐसा कुछ महसूस क्यों नहीं हुआ, कि लगे कि प्यार हो गया है पति से?  सच यह है कि प्यार-व्यार के बारे में कभी सोचा कहां उसने! कालेज में थी, तब भी कई लड़के आगे-पीछे घूमते रहते थे। कभी उन्हें लिफ्ट नहीं दी। शायद अपनी खूबसूरती का घमंड रहा होगा मन में! फिर राजीव मिला तो साथ रहते, एक अलग-सा सुकून दिल में भर गया। प्यार है कि नहीं, यह सोचने की जहमत उठाने की कोई जरूरत थी क्या? इतनी खूबसूरत ज़िंदगी, इतना प्यारा पति, ऐशो-आराम... सब कुछ तो था ज़िंदगी में! एक खुशबू थी राजीव के साथ की। भरोसा था, निश्चिंतता थी, क्या यह प्यार नहीं था? अब भी एक खुशबू है अमोल के साथ की, पर इसमें-उसमें कितना अंतर है। निश्चिंतता तो खैर बिल्कुल नहीं है और भरोसा है कि नहीं है, यह सोचने की जहमत वह उठाती नहीं। उसकी जरूरत क्या है? क्या लेना-देना है अमोल से उसे? कौन-सा कोई सामाजिक रिश्ता है! एक कशिश है, जो खींचती है, वह भी इस उमर में, इतना ही काफी है। जब तक है यह कशिश है... उसके बाद... पर उसके बाद की सोचना ही क्यों?

वह आता है तो अमृत के घर रात देर तक पड़ा रहता है या फिर वे होटल चले जाते हैं। कभी तो वह ऑफिस से उसी की कार में बैठकर घर आ जाती है। सोचती है अमृत कि जाने कैसी भोली है अमोल की पत्नी, कि उसे भनक तक नहीं लगती! असहाय होगी बेचारी, बस नहीं चलता होगा! यह भी तो है कि एक पत्नी के पास ऐसे मामलों में ताकत होती ही क्या है आखिर?  हद से हद रो-धो लो, व्रत-उपवास कर लो, पूजा करा लो कि पति तुम्हारा ही बना रहे... किसी बड़े बुजुर्ग से कहलवाकर समझाने की कोशिश करवा लो... और तब भी सह नहीं पाओ, तो तुम्हारी बदकिस्मती कि पति संभाल नहीं पाई। डिप्रेशन में चली गई तो जाओ जी, मनोचिकित्सक से अपॉइंटमेंट ले लो न! करवाते रहो सेशन, खर्चते रहो पैसे। पर अमोल की पत्नी थोड़े न जाती है किसी मनोचिकित्सक वगैरह के पास... वह परेशान-वरेशान होकर नहीं जीती! वरना बताता नहीं अमोल कभी? वैसे सुना है कि अमोल की पत्नी है बहुत सुघड़, सुंदर, सलोनी... अमोल साला, गोरेपन और खूबसूरती का दीवाना लगता है- जितनी भी चुनीं, सब खूबसूरत!!

 

अब तो लगने लगा है कि कुछ ज्यादा ही जा रहा है अमोल! उसके वर्तमान की चिंता, तो भविष्य की भी... कहने लगा उस दिन ‘तुम्हारा प्रमोशन नहीं हो रहा, सी.एम.डी से मिल क्यों नहीं लेती?’ अब अमृत को तो प्रमोशन से खाक असर पड़ने वाला था पर अमोल ने समझाया कि पड़ने वाला है फर्क -पेंशन में, ग्रैच्युइटी में, जाने किस-किस अकाउंट में... तो बोली वह कि ठीक है, मिल लेती हूं। सोच थोड़े ही न पाई कि कोई पेंच है इसमें!

नहीं, कसम से, उसे कतई पता नहीं था कि उसके प्रेमी बने अमोल साले ने गोटी सेट कर रखी है। सी.एम.डी. दिल्ली आए हुए थे, ऑफिस-कम-गेस्ट हाउस में ठहरे थे। वह मिलने चली गई। लो जी, गई तो थी उनके ऑफिस में, पर वहां एक बेडरूम भी था, जहां साहब आराम फरमा रहे थे। उसे वहीं भेज दिया गया। उसने बातें शुरू की ही थीं कि साहब ने बड़ी कोमलता से हाथ पकड़ लिया। पर अमृत इतनी भोली नहीं। हल्के से हाथ छुड़ाया और कह दिया- ‘यह सब मेरे बस का नहीं। विधवा हूं, उसी तरह रहती हूं। न मिले प्रमोशन, न मिले अच्छी पेंशन, किसी तरह बुढ़ापा काट लूंगी... अब ज़िंदगी के कितने साल बचे ही हैं जो... ’सी.एम.डी साला एकदम से घबरा गया और पसीना-पसीना होते बोला- ‘ठीक है, ठीक है। मुझे तो लगा कि आप खुद ही इंटरेस्टेड हैं इसीलिए... आप चिंता मत कीजिए। राजीव सर मेरे सीनियर थे। आज वे होते तो मेरी जगह वे ही सी.एम.डी बने होते। मैं आपकी बहुत इज्जत करता हूं। यह सब मुझ पर छोड़ दीजिए कि आपका प्रमोशन कैसे होगा... और मैं इस अमोल को भी देख लूंगा जिसने आपको बदनाम किया है कि आप इस तरह की हैं... भाभीजी, नमस्कार।’

बाहर निकलकर अमृत एक कुर्सी पर धड़ाम से बैठ गई। चक्कर आ रहे थे। दिल की धड़कनों पर काबू पाकर, उसने खुद को बधाई दी कि संभाल लिया सब! स्वीकार नहीं कर पा रही थी कि प्रेमी बने घनचक्कर अमोल के अंदर का असली कमीना इस रूप में बाहर आएगा! साला दिल्ली में बने रहने के लिए अमृत का पासा फेंक रहा है सी.एम.डी के सामने। फिर वह दृढ़ता के साथ उठ खड़ी हुई। तू भी देख अमोल कि किसे ठगने चला था। मुझे गोटी बना रहा था अपना स्वार्थ साधने को? अगले दिन अमोल आया तो उसने उसे कुछ बताया नहीं कि क्या हुआ। बस इतना ही बोली कि सी.एम.डी ने वादा किया है कि प्रमोशन हो जाएगा। अमोल मुस्कराया, तो अमृत भी। आग अंदर लग चुकी थी। हफ्ते भर के अंदर अमोल का ट्रांसफर ऑर्डर आ गया। खुद को नासमझ दिखाती अमृत मौन रही। वह परेशान होता है तो हो। अगर अमोल ने सोचा कि खुद तो अमृत को भोगेगा ही, उसे यूज़ करेगा और बदनाम भी, तो अब भुगते साला! अमृत यूज़ नहीं होती, जो करती है अपनी मर्जी से! अमोल से देह का रिश्ता अनजाने में शुरू हो गया, तो क्या! कुत्ते ने हिंट कर दिया होता, तब भी ठीक था... वे दोनों बैठकर अमोल के दिल्ली बने रहने का कोई जुगाड़ बिठा सकते थे। वह भूल कैसे गया कि अमृत, राजीव की वाइफ है- उसके सर की, जो बाईस सालों तक दिल्ली पोस्टेड रहे। पर इस कमीने ने टेकन फॉर ग्रांटेड ले लिया अमृत को। अब रहे अपनी औकात में, जाए सीधे कस्बे और बीवी से दिल बहलाए... वैसे भी इस रिश्ते में इन दिनों ऊब घुस आई थी। पुरुष देह की जरूरत अब उतनी महसूस होती नहीं थी, बातें करने को कोई नया टॉपिक  नहीं बचा था और प्यार की वही-वही बातें सुनते, कार में हाथ पकड़े घूमते वही-वही गाने सुनते कान पक गए थे। घर की अलमारियां गिफ्ट से इस कदर अंटी पड़ी थीं कि वह चाहने लगी थी कि अमोल कुछ लाने की बजाए अपना दिया कुछ वापस लेता जाए, ताकि थोड़ी जगह हो जाए।

अमोल को नई जगह जाना पड़ा। सी.एम.डी ने उसकी एक न सुनी। जाते वक्त मिलने आया तो उदास था। अमृत भी थोड़ी इमोशनल हो गई, पर कहा तब भी कुछ नहीं। उसके और रिया के साथ अमोल ने जो किया, उसकी याद वैसे ही दिल में आग लगा देने को काफी थी। अमोल को रिया वाले कांड के बाद ज़िंदगी में फिर से शामिल कर लेना तो भारी भूल थी। पर कहीं कुछ तो था जो साल रहा था। इतने सालों का साथ रहा। क्या अमोल को तनिक भी प्रेम नहीं था? सिर्फ अमृत ही करने लगी थी प्यार? आखिर अमोल अपने हित में अमृत को बांट क्यों रहा था सी.एम.डी से? दिल्ली ही बने रहना चाहता था अमृत के साथ की खातिर, इसीलिए? अब कारण चाहे जो भी हो, आप मानें कि न मानें, अमोल को विदा देते अमृत की आंखों में सच्चे आंसू थे।

 

अमोल को गए महीनों हो गए। जाने के बाद एक बार भी फोन नहीं किया साले ने! अमृत को बड़ा खाली-खाली -सा लगने लगा। कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे राजीव के जाने के बाद लगा था। अब राजीव के जाने के तुरंत बाद अमोल मिल गया तो खालीपन महसूसने का ज्यादा वक्त मिला नहीं। अबकी तो कोई था नहीं न, इसीलिए खालीपन उसे कुतरने लगा। रोज बेटियों को फोन करती। कभी सिया की बेटी से खेलने चली जाती। सोचती कि वह रोकेगी ‘ममा यहीं रह जाओ आज की रात’, तो रह जाएगी... पर सिया कभी रोकती ही नहीं। आईने के सामने खड़ी होती तो लगता कि वह रोज-रोज, खुद को पिछले दिन से ज्यादा बूढ़ी होती देख रही है। क्या इसीलिए कि अनचाहे भी सोचने, चिंता करने लगी है, अकेलेपन में डूबने लगी है? राजीव सही कहा करता था कि सोचने, चिंता करने से महिलाओं की खूबसूरती नष्ट होने लगती है।

ऊब से बचने को एक दिन वह उसी होटल में चली गई, जहां अमोल के साथ अनगिनत बार जा चुकी थी। पैसे थे ही पास में, क्या एक दिन अपने खर्चे से थ्री स्टार होटल में स्नैक्स-कॉफी नहीं ले सकती? रिसेप्शनिस्ट पहचानती थी पर उसके पास क्यों रुकना!  सीधे रेस्तरां में घुसकर बैठ गई और उन्हीं चीजों का ऑर्डर दे दिया, जो अमोल के साथ खाया करती थी। अचानक कोने में बैठे एक कपल पर नजर पड़ी। पुरुष की पीठ अमोल जैसी लग रही थी। साले ने आदत खराब कर दी थी। दिल में कुछ होता था और नजरें उसे ही ढूंढती रहती थीं। पुरुष की पीठ अमृत की ओर थी, इसीलिए दिखती थी तो बस साथ वाली महिला। खूबसूरत लग रही थी। गुलाबी रंगत लिए प्यारा-सा भोला-भाला चेहरा, बड़ी-बड़ी आंखें!! अमोल की बीवी सुमि भी ऐसी ही रही होगी, तभी पति की करतूतों की कभी भनक तक नहीं लग पाई उसे! भनक लगी भी होगी तो हिम्मत नहीं कर पाई बेचारी कि एक फोन करके पूछ ही ले कि रात के बारह बजे तक उसने उसके पति को रोक क्यों रखा है आखिर? पहले ही हिसाब कर लेती तो ज़िंदगी यहां तक तो नहीं पहुंचती! अमोल अपनी औकात में रहता और अमृत को खुलेआम किसी और के पास भेजने की हिम्मत नहीं करता! पर अमृत ने भी मजा चखा दिया न! पहले-पहल वह अमृत के पास आया था, कौन-सा अमृत गई थी उसके पास!  सारी चीजें, सारे उपहार भी बिन मांगे, खुशामद कर करके दिए उसने और रिया की शादी के समय मदद भी अपने मन से की... रिया की शादी के दिन वह अकेला ही आया था। बीवी को साथ लाता तो पहचानती तो होती... जो भी कहो, किसी के साथ कॉफी पीने का जो मजा है, अकेले में नहीं। तभी न वह सामने वाली महिला इतनी खुश नजर आ रही है! खैर, पहली बार अकेली आई है, पैसे लगने वाले हैं, तो पूरा खाकर ही जाएगी। वे दोनों उठ गए। अरे, वही अमोल जैसा दिखने वाला पुरुष और उसके साथ वाली महिला! क्या पता, बीवी है या अमृत की तरह ही… पर नहीं, उसके चेहरे पर लिखा है कि सीधी-सादी, पतिव्रता है। लटके-झटके नहीं, अदाएं नहीं, इतराना-शर्माना नहीं। वे दोनों उठकर एक्ज़िट की ओर मुड़े और पुरुष का चेहरा अपनी ओर होते ही अमृत चौंक गई। अरे, ये तो सचमुच वही दोनों निकले! अमोल पास से ऐसे गुजर गया जैसे पहचानता ही नहीं... पर उसकी पत्नी की नजर अमृत पर पड़ी तो वह रुक गई।

‘मैंने आपको कहीं देखा है’, वह बोली। ‘अरे हां, आप ही तो हैं राजीव सर की वाइफ! राजीव सर नहीं रहे, तो गई थी आपके घर... पर आपको कहां याद होगा? वैसी स्थिति में किसका दिमाग ठिकाने रहता है भला! अमोल, देखो तो यहां कौन बैठा है? ये तो दरवाजे के पार चले गए, इसीलिए सुन नहीं पा रहे, इनका तो ट्रांसफर हो गया था न... पर फिर से यहीं आ गए हैं, फरीदाबाद वाले ऑफिस में!  दिल्ली के इतना पास वापस आ जाने पर हम सेलिब्रेट करने आए थे। आपकी इतनी चर्चा करते रहते थे मुझसे! कितने लोग, कितनी बातें करते थे आप दोनों के बारे में, पर मैंने कभी भरोसा नहीं किया। किसी महिला के विधवा होने का दुख कोई दूसरी महिला नहीं समझेगी, तो कौन समझेगा? इसीलिए ये जितनी देर भी आपकी मदद की खातिर आपके घर रह जाएं, मैंने कभी नहीं टोका, न संदेह किया...अब कोई विधवा क्या इतना गिर सकती है? वह भी राजीव सर जैसे रेपुटेशन वाले ऑफिसर की वाइफ... वह भी इस उमर में??... और प्यार है अगर तो चुपके–चुपके क्यों? जो करे, खुल्लम-खुल्ला, डंके की चोट पर करे न प्यार... असली प्यार कहीं चुपके-चुपके होता है? चुपके-चुपके तो व्यभिचार होता है। वह थीं न शादी-शुदा सीमा मैम, पति चुपचाप घर पर रख छोड़, इनको पटाने में लगी रहती थीं। प्यार इन्हें इतनी सारी करती हैं, पर ‘अमोल से प्यार करती हूं’, कहकर भी अपने पति को छोड़ती नहीं... क्यों भला! आपको मेरा पति पसंद है पर उतना भी नहीं कि अपने वाले को छोड़ दें? इन्हें ही अपना लें??... या फिर हिम्मत नहीं, बकरी का कलेजा लेकर शेरनी होने का ढोंग करती हैं सब! यही तो चिढ़ाती हूं मैं अमोल को... कि इतने बार इस्तेमाल हो चुके को खरीदता कौन है? उलट-पलटकर देखा, चखा और छोड़ दिया’ वह ठहाका मारकर हंसी।‘ पर जो जितना भी पटाने की कोशिश करे, सूंघे-चखे, इन्हें भी पता है कि प्यार के नाम पर है तो बेवफाई और बेहयाई का खेल ही। खेल खत्म होने की सीटी कभी न कभी तो बजेगी ही... और मैं तो यह सोचती हूं कि एक बार अपना लिया, तो हर हाल में निभाऊंगी... ये जैसे भी हों, इन्हें सही राह पर लाने की कोशिश करती जीऊंगी, प्यार करना कभी बंद नहीं करूंगी... एतराज पाप पर, पापी पर क्यों?.. इसीलिए तो हैं आज तक मेरे ही साथ, जान मुझ पर ही देते हैं... चलिए, मिलते हैं फिर कभी... घर आइये न एक दिन... अच्छा बाय!’

वह जल्दी से गेट के बाहर इंतजार कर रहे पति के पीछे लपकी।

अमृत ठक बैठी रही। इस कदर परेशान हो गई कि कुछ न सूझे। लगा कि अपमान के मारे जलकर राख हो जाएगी. कुतिया साली, पत्नी बनी फिरती है! एक मिनट में इज्जत उतार कर रख दी मेरी! कहां तो मैं इसे भोली- भाली समझती जीती थी, कहां निकली यह पूरी घाघ! सब जानते-समझते भी अमोल पर कब्जा जमाए है। इतनों के पीछे घूमता है तेरा पति, तो छोड़ क्यों नहीं देती उसे? कब तक सुधारने की कोशिश करेगी, आखिर कब तक?‘ हैं तो मेरे ही साथ... जान मुझ पर ही देते हैं’ रह ले साथ! दिखाती फिर समाज में अपना पति तमगे की तरह लहराकर!!... मैं बताती हूं तुझे कि किसी का पति कैसे साथ होते हुए भी साथ नहीं होता। जान देता तुझ पर तो मेरे पीछे कुत्ते की तरह दुम हिलाता घूमता? अमोल साले को अपनी औकात मालूम है, इसीलिए तो खुल्लम-खुल्ला होते हुए भी खुल्लम-खुल्ला नहीं है सब! करती रह, उसे सही राह पर लाने की कोशिश और गला ले ज़िंदगी। बेवफा को प्यार कर और मर जा जीते जी, मेरी बला से!

 

प्यार हो कि शादी... कोई भी रिश्ता साला, सत्ता का खेल ही तो है! जो ताकतवर होगा, पलड़ा उसी का भारी रहेगा। प्यार भी शुद्ध व्यापार है- और व्यापार में घाटा किसे बर्दाश्त होगा? लेन-देन के इस व्यापार में हरेक को ज्यादा से ज्यादा मुनाफा चाहिए- देह का, दिल का, चाहे दोनों का! इस साली अमोल की पत्नी ने मुझे समझ क्या रखा है! वह पति को सज्जा की तरह साथ लिए घूमकर मुझसे जीत जाएगी? चिपकी रहेगी पति से अपने फायदे के लिए और उसे प्यार बताएगी? औकात क्या है कमीनी की? कल ही छीनती हूं उसकी सजावट!  परत उघाड़कर दिखा देती हूं असलियत उसकी शादी की, प्यार की... वह पति से घर और बिस्तर सजाए पर पति को मेरे इशारे पर खट् से पाला बदल, मेरे दिल की सज्जा बनने को तैयार होना ही होगा- चाहे मर्जी से, चाहे मजबूरी में... न करे ऐसा तो खोल न दूं, उसकी शराफत की हकीकत! एक चिट्ठी लिख दूं बॉस को कि मेरे साथ जबर्दस्ती करता है तो तुरंत चली जाएगी नौकरी सेक्सुअल हैरसमेंट के क्लॉज़ में... पर नहीं, ये मैं क्या सोचने लगी? क्या मैं ऐसा कभी कर सकती हूं? कभी नहीं। सी.एम.डी वाले मामले में उसे ऐसा सबक सिखाऊंगी, ये सोचा थोड़े था, पर हो जाता है कभी-कभी। आप जिससे प्यार करते हैं, वह आपसे खेलने लगे तो आप उसकी हानि कर बैठते हैं।

अगले दिन ऑफिस के लैंडलाइन फोन से अमृत ने फ़रीदाबाद वाले ऑफिस में अमोल के लैंडलाइन पर फोन किया। अमोल ने हंसकर बातें कीं। बहुत खुश हुआ। अमृत को अरसे बाद सुकून मिला। लगता है साला वह भी मेरे बिना छटपटा रहा है। ‘भेजता हूं कार शाम को, गेस्ट हाउस चली आना।’ अमोल बोला, तो अमृत का दिल धड़कने लगा। गुलाबी गाल, लाल हो गए। पहनी तो थी उसके पसंद की प्याजी रंग वाली साड़ी ही, जिसमें उसका चेहरा भी प्याजी-सा दिखता है, पर इतने महीनों बाद उसके साथ, उसकी छुअन की बात से उसे सिहरन-सी हुई... क्या उसका दिल इस बात से धड़क रहा है कि वह अमोल से इतने दिनों बाद मिलेगी या इस बात से कि कहीं अमोल को पता न चल गया हो कि ट्रांसफर किसकी करनी थी! साला, मजा चखाने को तो नहीं बुला रहा! मजा चखाने की सोचेगा तो मजा चखेगा फिर से... अभी तो उसपर प्यार आ रहा है बस! न, न इमोशन के वश न हो जाना, उसने खुद को याद दिलाया। प्रेमी अगर अमोल जैसा हो, तो इमोशन अपने आप वह फालतू, गलीज-सी चीज हो जाती है, जिसकी जगह दिल नहीं, कूड़ेदान में होनी चाहिए। पर ये दिल साला...

पूरे ऑफिस ने देखा कि शाम को चार बजे एक कार नीचे आई, मोबाइल बजा और अमृत फट् से सीट से उठकर चल दी। वह दिल ही दिल अमोल की पत्नी से कह रही थी- अब सब खुल्लम-खुल्ला ही चलेगा मेरी प्यारी सुम्मी! जमाना बदल गया है। यह न सोच कि अब प्यार, ईमानदारी और डेडिकेशन से पति संभल जाएगा। मेरी जान, सीधी-सादी, ईमानदार, पति पर न्योछावर पतिव्रता पत्नी अब पति को भाती नहीं, उकताती है। रिश्ते की दाल में थोड़ी बेवफाई, लटक-झटक, थ्रिल का तड़का लगा और स्वाद बढ़ा। मान ले कि ज़िंदगी में न कुछ सही होता है, न गलत! तेरा अमोल जैसे पति से चिपके रहना, अमोल का मुझे सी.एम.डी के पास भेज देना, मेरा अमोल के ट्रांसफर के मुद्दे पर चुप लगा जाना, अमोल का रिया को कुंवारी नहीं रहने देना, रिया का देह जूठी नहीं होती समझना... इसमें सही क्या था, क्या गलत?  क्या कई बार बहुत सारे गलत मिलकर सही नहीं हो जाते? क्या कई-कई सही मिलकर, गलत को जन्म नहीं देते? अब सोच कि प्यार और सुविधा, प्यार और आदत, प्यार और घृणा, प्यार और बदला, के बीच की दीवार क्या इतनी पतली नहीं होती कि कभी भी टूट जाए? साली मेरी सोच, बार-बार परेशान क्यों करने लगती है? वह कार में बैठते ही सोचना छोड़, आंखें बंद करके अमोल से मिलन के हर्ष में खोने लगी।

 

उधर अमृत के कार में बैठ जाने की खबर ड्राइवर से पाते ही अमोल बॉस को फोन मिला रहा था।

‘सर, मैम जा रही हैं... अब आगे आप जानें! ( हंसी) हां, हां, क्यों नहीं... बस एक बार मैनेज करने की बात है, चलता रहेगा... हां, इतनी हिम्मत क्यों करेंगी दुबारा... समझा दीजिएगा कि राजीव सर अब रहे नहीं और उनका ट्रांसफर करके उन्हें देश के किसी भी कोने में फेंक दिया जा सकता है... वैसे हैं तो बहुत बोल्ड पर सब ठीक हो जाएगा। सर, चिंता मत कीजिए... और सर, प्लीज़ मेरा दिल्ली ऑफिस ट्रांसफर वाला ऑर्डर कल ही इशू करवा दीजिए। फ़रीदाबाद आने -जाने में बहुत दिक्कत होती है। ओके सर, गुडनाइट।’

 

 

 

 

 

 

 

 

वफा बेवफाई बदलते रिश्ते

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