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© Archana Chaturvedi

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"अरे 9 बज गये आज मुझे कृति की प्रिसीपल को मिलने जाना है।कृति मेरी बेटी है कॉलेज में एडमीशन के सिलसिले में उसके साथ जाना है" उसके पापा बिजनेस के काम से बाहर गये हैं।"कृति बेटी जल्दी आओ देर हो रही है"।"आ रही हूँ मम्मी"। 'ठीक है तुम आओ में बाहर गाडी में बैठती हूँ।'"ओके मम्मी

 

।।।।।।पांच मिनट बाद .  चलें मम्मी "हॉं बेटा 'दरवाज़ा ठीक से बन्द कर दिया "हॉ मम्मा।"बेटी तुमने अपनी माक्सशीट और फार्म ले लिये ?"जी मम्मी "'वैसे तुम्हारी कॉलेज की प्रिसीपल का नाम क्या है बेटी" मम्मी उनका नाम सुप्रिया शर्मा है।  सुप्रिया ! हॉं मम्मी क्या हुआ ? मम्मी आप जानती है क्या उन्हें ? नही बेटा बस मेरी एक बचपन की सहेली थी उसका नाम भी था सुप्रिया पढ़ने में बहुत तेज थी, हमेशा फर्स्ट आती थी बस वो याद आ गयी । अब वो कहॉ है मम्मी ? पता नही बेटी जब उसने 12वीं  की परीक्षा दी थी तभी उसके मम्मी पापा ने उसकी शादी एक छोटे से कस्बे में कर दी थी । उसने बारहवी  में हमारे शहर में टॉप किया था। वो आगे पढ़ना चाहती थी लेकिन उसकी एक न चली। बहुत रोई तब वो। फिर कुछ समय बाद मेरे पापा का ट्रांसफर दूसरे शहर में हो गया । हम फिर कभी मिले ही नही पर जब वहॉं थे तभी सुना था कि उसके ससुराल वाले काफी दकियानूसी थे । मैं उसे कभी भुला नही पाई आज नाम सुना तो फिर से जैसे यादें ताजा हो गई।चलो तुम्हारा कॉलेज आ गया।

कृति :"मम्मी वो लेफ्ट में प्रिसीपल रूम है।अच्छा बेटा

क्या में अन्दर आ सकती हूँ। प्रिसीपल : जी आइये ।"जी नमस्ते में कृति की मम्मी हूँ उसके एडमीशन के लिए आई हूॅ। ये उसके पेपर है"। प्रिसीपल: एकटक देखते हुए तुम रीमा हो ना ? जी हॉं पर आप ?" ये क्या आप आप लगा रखी है अपनी बचपन की सहेली को भूल गई तुम

ध्यान से देखते हुए .......सुप्रिया तुम हो क्या ? तुम और कॉलेज की प्रिसीपल सपने में भी नही सोचा था कि तुम मुझे आज ऐसे मिलोगी | नाम सुनकर तुम्हारी याद जरूर आई थी, अभी रास्ते में तुम्हारी बातें कर रही थी अपनी बेटी से "लेकिन ये बताओ तुम्हारी तो शादी  हो गई थी और तुमने पढ़ाई भी छोड़ दी थी । और सुना था तुम्हारी सास भी काफी पुराने विचारों की थी फिर तुम यहॉ तक केसै पहुंची। सुप्रिया : अरे बाबा इतने सारे प्रश्न एकसाथ तुम तो बिल्कुल वैसी ही हो नॉनस्टॉप ।

रीमा :"तुम्हें यहॉ देखकर इतनी खुश हूँ और तुम्हारे बारे में सब कुछ जानना चाहती हूँ। सुप्रिया :अरे बाबा ये बहुत लम्बी कहानी है । आराम से घर पर आ फिर बैठकर इत्मीनान से बातें करेगे । अभी तो बेटी का एडमीशन करा बाहर और भी पेरैन्टस इन्तजार कर रहे होंगे। अ ओ सॉरी ।

सुप्रिया : "अच्छा बराबर वाले रूम में फीस जमा करा दे और बिटिया से मिलवा तो दे । अरे हॉ वो बाहर ही है बुलाती हू लेकिन तुम एक काम करो परसो मेरे घर पर आ जाओ लंच साथ करेगे और बातें भी ,परसों रविवार है कॉलेज की छुट्टी भी होगी । तुम अपना पता दे दो में लेने आ जाऊगी ।

सुप्रिया : अरे तू क्यूँ तकलीफ करेगी में खुद ही आ जाऊंगी, तेरा पता तो मेरे पास आ ही गया है इस फार्म में ।लेकिन एक बात बता तेरे पति क्या करते हैं ? रीमा : वो तो बिजनेस के सिलसिले में अकसर बाहर रहते है आजकल भी मुम्बई गये हुए हैं और तेरे पति क्या करते हैं ? सुप्रिया :वो तो बैक में नौकरी करते है लेकिन आजकल वो भी बाहर गये हुए है। इतने मे कृति अन्दर आ जाती है गुड मार्निंग  मैम । सुप्रिया : गुड मार्निग बेटे

रीमाः सुप्रिया ये मेरी बेटी है कृति और कृति बेटा ये मेरी सहेली है जिनके बारे में मै तुम्हे सुबह बता रही थी।

"ओ मम्मा फिर तो ये मेरी आंटी हुईं "। हॉ लेकिन कॉलेज के बाहर।

अच्छा सुप्रिया हम चलते है परसों लंच पर तुम्हारा इंतजार करूगी । अरे अपना फोन नम्बर तो देना। सुप्रिया ने नम्बर लिखकर दिया।

…… दो दिन बाद

कृति बेटे देखना आंटी आ गई क्या । 2बज रहे हैं। कृति: मम्मी फोन करके पूंछ लू नम्बर है ना आपके पास

नम्बर तो है चल में ही फोन करती हूँ।तभी घंटी बजी अरे लगता है वे आ गई।

कृति :मम्मा मैं दरवाज़ा खोलती हूॅ।

नमस्ते आंटी : सुप्रिया  "नमस्ते बेटा मम्मी कहॉ हैं "कृति  : आंटी मम्मी अंदर है आपका बेसब्री से इंतजार कर रही हैं।

अरे सुप्रिया आ गई तुम कितना इंतजार कराया। इतने सालों बाद तुमसे मिल रही हूँ । इंतजार करना अच्छा नही लग रहा था। सुप्रिया: अरे भई में भी आज का इंतजार बेसब्री से कर रही थी |

लेकिन क्या करूं छुट्टी के दिन थोड़ी आलसी हो जाती हूँ और फिर बच्चों का फोन भी आता है ।

रीमा :अरे में तो पूछना ही भूल गई तुम्हारे कितने बच्चे है और कहॉं है ?

सुप्रियाः बडा बेटा डॉक्टर है यू.एस.ए में सैटल है और छोटा बेटा MBA कर रहा है वही पर है लेकिन कहता है कि यहीं आकर सैटल होगा और तुम्हारे? रीमाः मेरे भी दो बच्चे हैं बेटी से तो तुम मिल चुकी हो और बेट बी टेक फाइनल इयर में है। अरे यार तुम्हें भूख लगी होगी पहले खाना खा लेते हैं फिर आराम से बैठ कर बातें करेगे। कृति बेटा ज़रा मीना को बोलो खाना लगा देगी तू भी मदद कर दे।

जी मम्मी ।

अच्छा सुप्रिया तुम्हारे दोनों बच्चे दूर रहते हैं अकेलापन नही लगता। सुप्रिया : लगता तो है लेकिन बच्चों के भविष्य का भी तो सवाल है। वैसे मेरे साथ मेरी विधवा ननद और उनकी बेटी रहती है । मेरी ननद की बेटी इसी साल मेरे कॉलेज में लेक्चरार नियुक्त हुई है. अब उसकी शादी भी करनी है। कृति : मम्मी खाना लग गया है आ जाइये। अच्छा बेटा . चलो प्रिया खाना खाएं । मै हमेशा प्यार से सुप्रिया को प्रिया कह कर ही बुलाती थी । हम खाना खाने लगे। सुप्रिया : वाह रीमा खाना बहुत ही स्वादिष्ट बनाया है। फिर भी तो ढंग से नही खा रही . सुप्रिया :अरे बाबा कितना खाऊं आज तो स्वाद के चक्कर में पहले ही ज्यादा खा चुकी हूँ।

अरे अभी तो स्वीट डिश भी रहती है तुम्हारी फेवरिट खीर बनाई है। सुप्रिया : अरे तुम्हें याद है अभी तक । क्यों याद नही रहना चाहिये बचपन इतने करीब बिताया है।

सुप्रिया :बाप रे इतन खिला दिया अब तो लेटने का मन करने लगा।

चल मेरे बैडरूम में चलते हैं अभी तो हमें ढेर सारी बातें भी करनी है।

सुप्रियाः रीमा तेरा घर बहुत सुन्दर है और सबसे सुन्दर है तेरा बैडरूम। तुझे संवारने का शौक अभी भी है।

हॉं भई वो तो अब तू सुना तेरी तो शादी हो गई थी फिर पढ़ाई कैसे पूरी हुई।

अब सुप्रिया ने अपने बारे में बताना शुरू किया :रीमा तुझे तो पता ही है कि मेरी शादी मम्मी और दादी की ज़िद का नतीजा थी पर पिताजी मुझे पढ़ना चाहते थे लेकिन उन्होने भी कह दिया कि तुम्हारे ससुराल वाले राजी होंगे तो हम आगे पढ़ा सकते हैं। वैसे मेरे पति और ससुरजी तो पढे. लिखे थे लेकिन सास बहुत दकियानूसी थी। खैर जब में ससुराल गई तो बस मन के किसी कोने में पक्का निश्चय करके गई थी कि कैसे भी मेरी पढ़ाई पूरी हो

क्योंकि में शुरू से ही शिक्षिका बनना चाहती थी। मेरे पति उस समय कॉम्पेटेटीव एग्जाम की तैयारी कर रहे थे ।ससुराल पहॅुच कर जब सारी रस्में पूरी हुई तो मुझे सुहागरात के लिए कमरे में भेज दिया गया। ढेर सारे सामान के बीच एक पलंग बिछा था साधारण लेकिन साफ सुथरा । मेरी ननद जेठानी और रिश्ते की कुछ और लड़कियों ने मुझे घेर रखा था। थोडी देर के बाद मेरी जेठानी उन सबको लेकर चली गईं और तेरे जीजाजी यानि सुदेश कमरे में आए। मैं और सिमट कर बैठ गई। उन्होने मेरा घूंघट उठाया और मुझे एक गुलाब का फूल देते हुए बोले इस चॉद से मुखड़े के लायक मुँह दिखाई देने के काबिल अभी में नही हूँ अभी तो बस यही दे सकता हूँ। लेकिन वादा करता हूँ जिस दिन कुछ बन जाऊंगा तुम्हें हर खुशी दूंगा।मैंने हिम्मत करके कहा कि खुशी तो आप मुझे अभी भी दे सकते हैं वैसे आपकी दी हुई भेंट मुझे बहुत पसंद आई . मुझे गुलाब बहुत पसंद है।

सुदेश बोले साफ साफ बोलो क्या कहना चाहती हो कैसे खुशी दे सकता हूँ। अभी तो में कुछ कमा भी नही रहा। मैंने कहा “मैं आगे पढ़ना चाहती हॅू मेरा सपना है कि में शिक्षिका बनूं और शिक्षा का प्रसार करूं। यदि आप मदद करेंगे तो मैं पत्राचार द्वारा अपनी पढ़ाई जारी रख सकती हूँ।

सुदेश : ये तो बहुत अच्छी बात है कि तुम पढ़ना चाहती हो .में भी चाहता हूँ कि मेरी पत्नी पढ़ी लिखी हो इसलिए ही तुमसे शादी के लिए तैयार हुआ । पिताजी तो मान जाएंगे पर माँ नही मानेंगी वो पुराने विचारों की हैं। उन्होने मेरी बहन लक्ष्मी को भी नहीं पढ़ने दिया। मॉं लड़कियों की शिक्षा के पक्ष में नहीं है। लेकिन तुम पढ़ोगी में वादा करता हूँ । तुम अपने मायके जाकर फार्म भर देना और किताबें ले आना । तुम पढ़ रही हो इस बात का पता मॉं को नहीं लगना चाहिये।

सुप्रिया: लेकिन एग्जाम टाइम पर क्या करूंगी ?

सुदेश: उसकी तुम चिन्ता मत करो में किसी तरह तुम्हें मायके भिजवा दूंगा।

बस रीमा उस रात किया वादा इन्होने हमेशा निभाया। मेरी पढ़ाई शुरू हो गई और साथ ही परेशानियों का सिलसिला भी शुरू हो गया।

ससुराल में शुरूआत में तो सब ठीक रहा । मेरी जेठानी का स्वभाव थोड़ा अलग था | हर बात में बराबरी करना | छोटी सी बात को तिल का ताड़ बना देना l सास के कान भरना और ईष्यालुपन ये सब उनकी आदत में शुमार था । मेरी ननद लक्ष्मी बहुत प्यारी थी और लगभग मेरी हमउम्र थी और वह ज्यादातर मेरे आसपास ही रहती थी । उसे भी पढ़ने का बहुत शौक था लेकिन मेरी सास ने पांचवी के बाद उसे पढ़ने नहीं दिया था । वो भी आगे पढ़ना चाहती थी अपनी सहेलियो से किताबे मांग कर ले आती और मुझसे पढ़ती थी । मैंने मायके जाकर अपना बी ए का फार्म भर दिया था और किताबें भी ले आई थी | अपनी पढ़ाई में दोपहर को या रात को करती थी। मेरे पति का पूरा सहयोग मुझे मिल रहा था। एक दिन मेरे पति ने मुझसे कहा सुप्रिया तुम पढाई कर रही हो और में नौकरी की तैयारी ऐसे में हम अभी बच्चे की जिम्मेदारी नहीं उठा सकते । मैंने पता किया है कि सेन्टर में डॉक्टर साहिबा तरीके बताती हैं उन सबको जो बच्चा नही चाहते कल तुम मेरे साथ चलना हम भी बात करके आएंगे। बस हमने प्लानिंग कर ली कि हमें तीन साल तक बच्चा ना हो।

एक साल तक सब ठीक था, मैंने बी.ए फर्स्ट इयर की परीक्षाएं दे दी थीं। मेरी जेठानी मुझे नीचा दिखाने का अवसर तलाश रहीं थीं। मेरे खिलाफ सास के कान भरती थी और एक दिन तो उन्होने ननद की पढ़ाई को लेकर पता नही सास से क्या कहा सासूजी मेरे ऊपर भड़क गई और चिल्लाने लगीं अरे ओ छोटी बहु यहॉ अपना मास्टरनीपन मत दिखा l हमारे खानदान में लड़कियां पढ़ती नहीं है घर के काम काज सीखती हैं उसको पराए घर जाना है। मैंने कहा मॉं जी पढ़ना लिखना कोई गलत काम नहीं है दीदी के काम ही आएगा। अब तो मॉजी को और गुस्सा आ गया चिल्लाने लगी तेरी मॉं ने तुझे लच्क्षन नही सिखाए हमारी लड़की को बिगाडने की जरूरत नही है । घर में रहना है तो तरीके से रहो । हे भगवान कैसी कुल्क्षनी बहु आई है मांजी बडबडा रही थी । अभी मुझे पता नही क्या क्या सुनना पड़ता तभी मेरे ससुर जी आ गये और बोले भागवान क्यों उसके पीछे पड़ी हो पढना लिखना कोई गलत बात थोडे ही है। उस दिन के बाद से मेरी सास और जेठानी तो मानो मेरी दुश्मन हो गईं थीं । मेरी ननद को मुझसे दूर रखा जाता ।घर के ज़्यादा से ज़्यादा काम मुझसे कराए जाते लेकिन मैंने हार नही मानी। बात बात पर मुझे डांट पड़ती । लेकिन मेरे ससुर और पति ने मेरा साथ दिया और मुझे हिम्मत दी। मेरे ससुर जी कहते बेटा अच्छा काम करो तो राह में कांटे तो आते हैं लेकिन तुम हिम्मत मत हारना और अपना सपना पूरा करना एक दिन ये लोग भी पढ़ाई का महत्व समझ जाएंगे। मेरी शादी के दो साल के बाद मेरी ननद की शादी हुई। घर में सब रिश्तेदार आए हुए थे। इनकी बुआ भी आई थी वो बहुत तेज थी उन्होने मेरी सास से कहा भाभी क्या बात है छोटी बहु के अब तक बच्चा नही हुआ अब तो शादी को दो साल हो गये। मैंने सुना है आजकल की लड़कियां डॉक्टरनी से पूछकर कुछ उपाय कर लेती है जिससे बच्चा ना हो। फिर क्या था सास को एक मौका और मिल गया वो सबके सामने मुझे भला बुरा कहने लगीं।तभी सुदेश की मॉसी ने मेरा साथ दिया वो शहर में रहतीं थी उन्होने मेरी सास को समझाने की कोशिश की और कहा दीदी इसमें बुराई क्या है सुदेश भी अभी अपने पैरों पर खड़ा नही हुआ है और कुछ दिन बच्चे खा पहन लेंगे। अब हम लोगों को ही लो छोटी उम्र मे शादी हुई बच्चे भी जल्दी हुए बस फिर आजतक गृहस्थी की चक्की में पिस रहे हैं।अब माजी कुछ नरम हुई लेकिन बोली कि घर में किस चीज की कमी है बच्चे शुरू मे हो जाए तो ठीक होता है, बाद में मुश्किल होती है । जैसे तैसे मॉसी जी ने उन्हें समझा बुझा कर शांत किया ।

खेैर शादी ठीक से निपट गई और ननद अपने घर चली गई। जिंदगी फिर अपने ढर्रे पर चल पड़ी। मेरे फाइनल इयर के एग्जाम नजदीक आ रहे थे में छुपकर अपनी पढ़ाई में मेहनत कर रही थी l इसी बीच एक अच्छी बात हुई सुदेश की बैंक में नौकरी लग गई। इस बार मेरी सास मुझे मायके भेजने के लिए तैयार नहीं थी शायद उन्हें मेरी पढ़ाई का पता लग गया था। लेकिन पिताजी और सुदेश के आगे उनकी एक न चली सुदेश मुझे परीक्षा के लिए मायके छोड़ आए। लेकिन अब मेरी सास मुझसे और ज्यादा नाराज थीं वो नही चाहतीं थीं कि मैं उस घर में वापिस आऊं। काफी खींचातानी के बाद मैं ससुराल में दोबारा आई, मैंने और सुदेश ने फैसला किया कि अब यदि हम बच्चे के बारे में सोचें तो शायद मॉजी के बर्ताब में कुछ बदलाव आये। हमारा सोचना कुछ हद तक सही रहा दो महीने बाद जब मॉजी को खुशखबरी दी तो वो कॉफी खुश हुईं अब वो मेरा काफी ख्याल रखने लगीं थीं। सुदेश की शहर में पोस्टिंग हो गई थी । डिलीवरी होने तक सास ने मेरा काफी ख्याल रखा इस बीच एक दिन सुदेश शहर से आए बहुत खुश थे सबके लिए कुछ न कुछ सौगात लाए थे और मेरा रिजल्ट लाए थे में बहुत अच्छे नम्बरों के साथ पास हुई थी साथ ही एम ए का फार्म लाए थे। मैंने कहा अब में कैसे कर पाऊंगीतो उन्होने मुझे समझाया जो सपना देखा उसे पूरा करने की कोशिश करो। बच्चे को तो मॉ और बाबूजी ही संभाल लेंगे तुम सिर्फ पढ़ाई शुृरू करो में किताबें लाकर दे दूंगा।

मुझे बेटा हुआ सास पोता पा कर बहुत खुश थी क्योंकि जेठानी की दो बेटियां थी। मेरी ननद को भी बेटी हुई मांजी सारे दिन बच्चे को अपने पास ही रखती और मैं काम खत्म करके अपनी पढ़ाई करती । जब मुन्ना तीन महीने का हुआ तो मैं मायके रहने गई उन्ही दिनो परीक्षा थी वो मैं दे कर आ गई। अब सास का मुझ पर से ध्यान कम हो गया था आजकल वो जिठानी को बेटियां होने की वजह से कोसती रहती थीं। जेठानी की बेटी 11 साल की हो गई थी और पांचवी पास कर चुकी थी और वो उसे आगे पढाना नही चाहती थीं।

मैंने उन्हें बहुत समझाया लेकिन वो मेरी बात सुनने को तैयार नहीं थी। मैं अपने आस पास की अपनी हमउम्र बहुओं को पढ़ाई का महत्व समझाती थी तथा पडोस के बच्चों को भी पढ़ाती थी। अब ऐसा लगने लगा था जैसे दो गुट बन गये थे l  एक उनका जो पढ़ाई का महत्व समझने लगे थे और दूसरा उनका जो पढ़ाई लिखाई को महत्वहीन समझते थे। अब आस पडौस में किसी को कुछ पूछना होता तो मेरे पास आते थे। प्यार और तकरार के साथ जिंदगी चल रही थी। देखते देखते एक साल निकल गया अब सुदेश ने मॉं बाबूजी से मुझे शहर ले जाने की बात की। लेकिन मॉ नही चाहतीं थी कि मैं शहर जाऊं वो मुन्ने से दूर नही होना चाहतीं थी । सुदेश ने मॉं से कहा कि वो भी हमारे साथ चल सकती हैं और हम भी जल्दी आया जाया करेंगे। फिर बहुत समझाने पर मां मान गईं। शुरूआत में मॉ हमारे साथ शहर आ गईं थीं फिर कुछ दिन रहकर चलीं गईं क्योंकि बाबूजी भैया भाभी के साथ घर पर ही थे भैया की गॉव में ही दुकान थी बाबूजी उनके साथ ही दुकान में हाथ बंटाते थे। धीरे धीरे हम सैटल हो गये मेरा एम ए भी पूरा हो गया था। हम गॉव आते जाते रहते थे। मेरा बेटा अब तीन साल का हो गया था और स्कूल जाने लगा था। सुदेश अब चाहते थे कि मैं पी एच डी करूं क्योंकि एम ए में भी मेरे अच्छे अंक आए थे ।में ने पीएच डी की तैयारी शुरू कर दी। सुदेश का भी प्रमोशन हो गया था। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था।अचानक एक बुरी खबर ने हमारे पूरे परिवार को विचलित कर दिया । एक कार दुर्घटना में लक्ष्मी के पति की मृत्यु हो गई। हम जल्दी से वहॉ पहुँच गये। पूरा परिवार बहुत दुखी था। लक्ष्मी की सास ननद उसकी दुश्मन बनी हुई थी। वो लोग उसे अपने साथ नही रखना नही चाहती थीं। मेरे ननदोई की सरकारी नौकरी थी l मेरी ननद की सास चाहती थीं कि मेरी ननद लिखकर दे दें जिससे मेरे ननदोई की जगह उसके देवर को नौकरी मिल जाए। मेरे ननदोई ने कुछ पॉलिसी भी करवाईं हुई थी जिनका पैसा लक्ष्मी के ससुराल वाले लेना चाहते थे । यदि लक्ष्मी ने दसवीं पास की होती तो नौकरी उसे मिल सकती थी। मैंने अपने सास ससुर को समझाया कि लक्ष्मी को घर ले चलो मैं उसे आगे पढ़ाऊगी और ये नौकरी कर पाएगी । पहले तो सास नही मानी फिर मैंने और सुदेश ने समझाया कि बेटी को लेकर सारी जिंदगी कहॉं भटकेगी ससुराल वाले तो सहारा देंगे नहीं। अब तक मेरी सास की आंखे खुल गईं थी उन्हें पढ़ाई का महत्व समझ में आ गया था । मैं  ननद को अपने साथ शहर ले आई और आंठवी की परीक्षा दिलवाई l जब उन्होंने दसबीं पास कर ली तो दौड भाग करके ननदोई की जगह नौकरी दिलवा दी लेकिन पढाई उन्होने जारी रखी। ननदोई का सारा पैसा उनकी बेटी के नाम जमा करा दिया था। अब तक मेरा दूसरा बेटा हो चुका था । मेरी जेठानी भी अब अपने बच्चों को खूब पढ़ाना चाहती थीं। मांजी अब हमारे साथ ही रहती थी क्योंकि लक्ष्मी की पोस्टिंग भी उसी शहर में हुई थी मांजी बच्चों को सम्भालतीं थी। मेरी पी एच डी पूरी हो गई थी और मैं कॉलेज में लेक्चरार बन गई थी।सुदेश ने मेरे जेठ को बैक से लॉन दिलवाया जिससे वो भी शहर में बिजनेस कर सकें क्योकि गॉव में ज्यादा कमाई नही थी। अपनी मेहनत और लगन से मेरे जेठ का बिजनेस जम गया । अब सब लोग शहर में ही रहने लगे थे मेरे जेठ ने अलग घर ले लिया उनकी दोनों बेटियां भी पढ़ रहीं थीं।गॉव भी हमसब आते जाते रहते हैं। हमारे गॉव ने भी काफी तरक्की की है । मेरी जेठानी की बेटियों की शादी हो गई है। मेरी ननद ने भी काफी तरक्की कर ली है। मेरे दोनों बच्चे अपने कैरियर में व्यस्त हैं

ये तो थी मेरी यहॉ तक पंहुचने की दास्तां। अब तुम सुनाओ तुमने इतने सालों में क्या किया।

रीमा : अरे यार मैंने भी बी ए किया उसके बाद मेरी शादी हो गई। मेरे पति का बिजनेस है इसलिए उनके पास ज्यादा वक्त नही होता ज्यादातर तो बाहर ही रहते हैं। इसलिए मैं कुछ नही कर पाई। घर और बच्चों को पूरा टाइम दिया।लेकिन मैं बहुत खुश हूॅ कि तुमने जो सपना देखा उसे पूरा कर पाईं। मैं तो शुरू से पढ़ने में  कुछ खास नहीं थी। हमेशा घर संभालना अच्छा लगता था।

सुप्रिया :अरे शाम हो गई तेरे साथ तो वक्त का पता ही नही चला। अच्छा अब मैं घर चलती हूँ दीदी और  नेहा इंतजार कर रही होंगी। तू भी अब मेरे घर आना ये ले मेरा पता। चल बाय

सुप्रिया चली गई। आज मुझे सचमुच लग रहा था मेरी सहेली असाधारण है। इतना परिश्रम और इतने टकराव और रूकावट के बीच अपना लक्ष्य प्राप्त करना सचमुच बहुत कठिन है। लेकिन उसे देखकर लगता है कि यदि इंसान ठान ले तो सबकुछ कर सकता है। जरूरत है तो बस दृण निश्चय और सही दिशा की और शिक्षा के बिना कुछ भी संभव नही है।

#जहाँ चाह वहां राह

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