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प्रेम नगर के कुलदीप सिंह बड़े सुशील और उन्नत विचार के पुरूष थे। चरित्र बड़ा ही धार्मिक और उज्ज्वल था। उनका मत था कि सत्य, कोमलता और विनम्रता में बहुत बड़ी शक्ति है। इस भौतिकतावादी युग में भी उनकी नज़रों में धन-दौलत का कोई महत्व न था। कॉलेज में प्रोफेसर थे। उनकी युवा पत्नी कंचन अर्थशास्त्र की बड़ी पक्षधर थी। पर, धन-विद्या में निपुण होने का बड़ा अभिमान भी था। सूझबूझ और विवेकशीलता का बड़ा ही अभाव था। वह बहुत जिद्दी भी थी। उचित हो या अनुचित, अपने तर्क पर अड़ जाती। पति-धर्म का तनिक भी ज्ञान न था। नैतिकता और व्यवहार कला से एकदम अनभिज्ञ। कोई काम सोच-समझकर करने का कष्ट कदापि न उठाती। मिया-बीवी में मामूली सी बात पर भी खटपट हो जाती। कुलद्वीप के विपरीत कंचन धन-दौलत को अधिक महत्व देती। वह कहती कि धन के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं। रूपए-पैसे के अभाव में जीवन नरक बन जाता है। निर्धन बेचारे को कोई पूछता भी नहीं। विचार अलग-अलग होने से उनमें प्राय: मनमुटाव हो जाता।

उनकी तकरार कभी-कभी विवाद में बदल जाती। कंचन बड़ी कमसिन और सुंदर थी। हिरनी जैसी बड़ी-बड़ी नशीली आँखें बड़ा ग़जब ढाती। आधुकनिकता के रंग में डूबी हुई कंचन रूप की रानी थी। उनका विवाह बड़ी धूमधाम से एक साल पहले रूपनगर में हुआ था। अनमेल विचारों के चलते शादी के बाद पति-पत्नी में नोक झोक और तनातनी होने पर भी गृहस्थी की गाड़ी पटरी पर ही थी। कुलद्वीप एक कुशल अध्यापक थे। वह सोचते कि नई-नई बीवी है। समझाने-बुझाने पर धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। आखिर, किताबी बातों के अलावा अभी उसने देखा ही क्या है? यह सोचकर वह अपनी शादी की वर्षगांठ को यादगार बनाने का विचार करने लगे। इस काम के लिए मौसम के लिहाज से वह मुंबई को बहुत पसंद करते थे। उनकी दृष्टि में इससे अच्छा दूसरा कोई शहर ही न था। एक जैसा सदाबहार मौसम।

वर्षगांठ निकट आने पर कुलदीप एक दिन कंचन से बोले- मेम साहब! शादी की यह पहली सालगिरह है। हम इसे क्यों न कहीं बाहर जाकर मनाए ? इस बहाने घूमना-फिरना भी हो जाएगा और तुम मुंबई भी देख लोगी। अगर तुम्हारी मर्ज़ी हो तो मैं कल पंजाब मेल का रिजर्वेशन करा दूँ।

तब कुछ झिझक कर कंचन बोली- ठीक है पर, मेरी एक छोटी सी शर्त है। आप वहाँ मन मर्ज़ी कोई फ़िजूल खर्ची न करेंगे। कम से कम पैसों में काम चलाएँगे।

कंचन की रजामंदी मिलते ही कुलदीप बोले-देवी, इसकी चिंता न करो। बिल्कुल बेफिक्र रहो। तुम्हें शिकायत का कोई भी अवसर न दूँगा।

इसके बाद कुलदीप अगले दिन स्टेशन जाकर नई दिल्ली से छत्रपति शिवाजी टर्मिनस तक जाने का सहर्ष दो टिकट बुक करा दिए। तय तारीख पर पति-पत्नी तैयार होकर हँसी-खुशी घर से रेल सफर पर निकले। रास्ते में किसी परेशानी का सामना न करना पड़ा और दूसरे दिन भोर में ही मुंबई पहुँच गए। गाड़ी से उतर कर कंचन के साथ बचपन के मित्र संजीव कुमार के यहाँ कोलाबा में ठहरे। संजीव बाबू के बीवी-बच्चे न थे। वह शादीशुदा न थे। अभी कुँवारे ही थे। कुलदीप और कंचन की बड़ी कद्र करते। कुलदीप को सगा भाई मानते। उन्हें देखकर संजीव बड़े प्रसन्न हुए। रोम-रोम हर्षित हो उठा। उनकी खूब आव-भगत किए। बातचीत करते-करते शाम हो गई। रात में भी खूब ख़ातिरदारी हुई। पति-पत्नी जी भर दावत का जायका लिए। क्या स्वादिष्ट और रूचि कर भोजन था? वे खा-पीकर मीठी-मीठी नींद में सो गए। रोज़ सुबह होते ही कुलदीप और कंचन घूमने-टहलने चले जाते। कभी कहीं जाते तो कभी कहीं।

सैर-सपाटे की मस्ती से उनका मन खिले हुए फूल की भाँति हल्का हो गया। पिकनिक मनाने में ऐसे खोए कि वापसी रेल आरक्षण कराने का ध्यान ही न रहा। कम दूरी का छोटा-मोटा सफर तो बिना रिजर्वेशन के जैसे-तैसे कट जाता है। पर, मुंबई से नई दिल्ली तक 1385 कि.मी. की पहाड़ जैसी इतनी लंबी और आरक्षण रहित यात्रा करना बड़ी टेढ़ी खीर है।

कुलदीप के साथ रहते कंचन को अभी दिन ही कितने हुए थे? अभी उन्हें भली-भाँति पहचान भी न पाई थी। इसलिए कंचन का बड़ा ख्याल रखते। कभी किसी कष्ट का अहसास न होने देते। सैर-तफ़री में दिल खोलकर खर्च किए। किन्तु, रूपयों के मोहजाल में फँसी कंचन को यह बिल्कुल भी अच्छा न लगा। बस, मन मसोसकर रह गई। पति के खर्चीले स्वभाव के विरूद्ध एक चुप हजार चुप, कुछ बोली नहीं। उसने ऐसा कुछ भी न किया जिससे कुलदीप के दिल को कोई ठेस लगे। जबकि वह उन्हें रोक-टोक सकती थी। वह कोई गैर तो थी नहीं, उनकी सहगामिनी थी।

वो दस-बारह दिन तक जी भर मुंबई दर्शन किए। शनिवार का दिन था और दोपहर का समय। कुलदीप बोले- प्रिये,चलो अब घर चलते हैं। घर की याद सता रही है। जब जी करेगा, फिर आ जाएंगे। तब उनकी आँखों में आँखें डालकर कंचन बोली- अजी, याद तो हमें भी आ रही है। चलिए, अब यहाँ से चलते हैं। यह सुनकर कुलदीप मुस्कुराकर बोले- अरे वाह, तुमने तो मेरे मन की कह दी। सच कहता हूँ कंचन, तुम कितनी अच्छी हो? तब कंचन अदा के साथ इतराते हुए बोली- अजी जनाब, फिर देर किस बात की है? चलिए,आज शाम को ही गाड़ी पकड़ लेते हैं। रही बात रात के खाने की तो वह गाड़ी में ही मंगा लेंगे।

इसके बाद वे सामान आदि समेटे और शेरे पंजाब होटल में जाकर खाए पिए। भोजनोपरांत सौंफ और इलायची के साथ बैरा खाने का बिल दे गया। कुलदीप की जेब घूमने-फिरने में ही ढीली हो चुकी थी। पास एक फूटी कौड़ी भी न बची। बैरे की ओर इशारा करके प्राण प्रिया से हँसकर बोले- देवी जी, अब तक का सारा खर्च मेरे नाम रहा। पर, घर तक पहुँचने का व्यय अब तुम वहन करो। मेरी जेब अब जवाब दे चुकी है।

यह सुनते ही कंचन को मानो बिच्छू ने डंक मार दिया। वह अचानक बिगड़ खड़ी हुई। देखते ही देखते बड़े गुस्से और आवेश में आ गई। चेहरा क्रोध से लाल हो गया। आँखें लाल-पीली करके झुंझला कर बोली-यह आप कैसी बकवास कर रहे हैं? मर्द होकर पत्नी से खाने के पैसे मांगते हुए आपको ज़रा भी शर्म नहीं? जाइए कहीं चुल्लू भर पानी में डूब मरिये। अभी तक आपको यह भी न मालूम कि औरत गृह लक्ष्मी है। वह पाई-पाई जोड़ती है। स्त्री अंट-शंट खर्च नहीं करती। वरना, उसका नाम गृहणी नहीं बल्क, खर्चीली होता। कमाता पति है पर, उसे सँभालती पत्नी ही है। वह पहले दर्जे की मितव्ययी होती है। पुरूषों की भाँति अपव्ययी कदापि नहीं। पुरूष भला क्या जाने पैसों की कद्र। अनाप-शनाप व्यय करते हुए ज़रा भी नहीं हिचकते।

मामूली सी बात पर पत्नी का यथार्थ रूप देखकर कुलदीप संयम के साथ उसे समझाते हुए बोले-कंचन! किसी दूसरे को उपदेश देना संसार में सबसे सरल काम है। किताबी बातें मात्र स्कूलों के लिए होती हैं। दुनिया के व्यवहार का कानून दूसरा है। पैसों का मित्र किसी का मित्र नहीं हो सकता। रूपए-पैसों के लिए अनायास हाय-तौबा करने से सुख-चैन में बाधा पैदा होती है। हम जो कुछ देखते हैं, सदैव सच नहीं होता। यह जीवन मात्र धन है, सोचना गलत है। मानव जीवन का उद्देश्य केवल धन संचय ही नहीं होना चाहिए। पति का उपदेश कंचन को लेशमात्र भी पसंद न आया।

वह नाक-भौंह सिकोड़ कर तमतमाते हुए बोली- बेबस और अबला जानकर आप मुझे इस भीड़ भरी बाजार में जानबूझकर बे-आबरू कर रहे हैं। क्या मेरे भरोसे यहाँ सैर करने आए थे? पहले ही मालूम हो जाता तो मैं यहाँ हरगिज़ न आती। पर, एक बात मेरी भी सुनिए मिस्टर, स्त्री को प्रेमपाश में नहीं बल्कि, कंचन के पाश में ही बांधा जा सकता है। आप नारी जाति का सम्मान करना सीखीए, अपमान नहीं। लगता है आप पुरूष नहीं, पुरूष जाति पर एक कलंक हैं।

कंचन का कुतर्क सुन कुलदीप के दिल को बड़ी ठेस लगी। वह सोचने लगे-स्त्री का क्रोध मर्द की अपेक्षा अधिक घातक होता है। औरत जाति ज़रा सी देर में न मालूम क्या से क्या कर दे। वैसे तो मर्दों की तुलना में महिलाएं ज्यादा खर्चीली होती हैं किन्तु, यहाँ तो बात ही कुछ और है। एकदम उलटी गंगा बह रही है। मैंने यह तो सुना है कि कृपण रूपयों को गिन-गिनकर रखता है पर, कोई स्त्री भी इतना कंजूस और पैसों की लोभी होती है, यह जिंदगी में पहली बार ही देखा। स्त्री जाति कुछ समझे न जाने, पैसों के सिवा इसे और कुछ ज्ञान ही नहीं। जबकि दामपत्य सुख के लिए पति-पत्नी के स्वभाव में मेल होना चाहिए। लेकिन, यहाँ सब कुछ अलग ही है। त्रियाहठ के आगे बड़े बड़ों को झुकना पड़ता है।

फिर भी कुलदीप कुछ नरम रूख अपना कर बोले- सुनो कंचन! मिया-बीवी में मैं और मेरा का विचार नहीं होना चाहिए। आपस में मतभेद होने से बसा-बसाया घर उजड़ता है। तेरा-मेरा का भेद भूलकर खाने के पैसे दे दो। राई का पहाड़ बनाने से कुछ हासिल न होगा। घर चलकर हम तुम्हारा पाई-पाई चुका देंगे। काफी हुजजत के बाद न जाने क्या सोचकर कंचन जैसे-तैसे मानी और बड़ी कशमकश के बाद बैरे को पैसे अदा किए। तब वे संजीव बाबू से विदा लिए और सामान वगैरह लेकर स्टेशन पहुँचे। कुलदीप का हाथ खाली तो था ही।

सामान्य टिकट बुकिंग खिड़की पर जाकर वह कंचन से बोले- लाओ साढ़े चार सौ रूपए दे दो, मैं टिकट ले लूँ। कंचन की नजर में रुपयों के सामने मान-सम्मान की कोई कीमत तो थी नहीं, बड़े तैश में आ गई और झल्लाकर बोली- न जाने आप कैसे मर्द हैं? हाथ धो कर मेरे पीछे पड़ गए हैं। स्त्री के आगे हाथ फैलाते हुए ज़रा भी संकोच नहीं करते।

कुलदीप कहने लगे- कंचन, मेरी बात सुनो- हम दोनों एक-दूसरे के सुख-दुःख के साथी हैं। हमारा बदन तो दो है लेकिन, दोनों की जान एक ही है। हमारे बीच धन-दौलत की दीवार नहीं होनी चाहिए। तुम समझती क्यों नहीं?

यह सुनते ही कंचन मानो जल-भुन गई। चेहरा गुस्से से लाल हो गया। वह बोली-श्रीमान जी, यह सतयुग नहीं, कलयुग है कलयुग। आज के जमाने में कंगाल पुरूष को कोई ललना घास भी नहीं डालती। अब स्त्रियों के लिए पति से अधिक धन का महत्व है। घर पत्नी चलाती है, पति नहीं। फिर भी अब घर वापस तो चलना ही है। इसलिए पैसे दे रही हूँ, टिकट ख़रीद लीजिए। उसने बेमन से पैसे निकालकर तत्काल दे दिया। साधारण श्रेणी की दो टिकट लेकर वे पंजाब मेल के स्लीपर कोच में सवार हो गए और दो खाली बर्थ देखकर उस पर बैठ गए।

गाड़ी छूटने का समय होने पर वह चल पड़ी और पलक झपकते ही तीव्र गति से दौड़ने लगी। इतने में एक छापामार टिकट जाँच दल वहाँ आ धमका। गाड़ी के टिकट चेकर महोदय अभी टिकटों को चेक करना शुरू भी न किए थे कि स्क्वॉड टीम ने मुसाफिरों का टिकट जाँचना शुरू कर दिया।

सिर मुड़ाते ही ओले पड़े । कुलदीप दंपति देखते ही देखते उसके हत्थे चढ़ गए। एक स्क्वॉड मेंबर ने झटपट पाँच सौ पंचनामे रूपए की पर्ची काटकर उनकी मुसीबत और बढ़ा दी।

कुलदीप ऊंगली के इशारे से बोले- श्रीमती जी, चुपचाप पैसे दे दीजिए। ना-नुकर करना ठीक न रहेगा। कंचन उस वक्त कोई आनाकानी न की और बिना किसी टालमटोल के ही बटुए से निकालकर रूपए तो दे दिया। पर, तुरंत पुन: बिफर पड़ी और तनतनाती हुई बोली- क्या आपको मालूम है कि धन कैसे जोड़ा जाता है? पैसे कमाना बड़ा सरल है पर, उसे संचित कर धन का रूप देना बड़ा ही कठिन। बड़े आए पैसे देने वाले। वह प्रोफेसर साहब को रूपयों का आर्थिक महत्व समझाने लगी।

कुलदीप रूपए पैसे को ज्यादा अहमियत न देते। वह भली-भाँति जानते थे कि स्वाभिमान के आगे रूपए का कोई मोल नहीं होता। वह बोले-तुम औरतों में बस यही कमी है, धन-दौलत के आगे मान सम्मान की कोई कद्र नहीं करतीं। ज़रा सोचों, यदि वह चेकर किसी पुलिस वाले को बुला कर सबके सामने मेरी कालर पर हाथ डलवा देता तो क्या तुम सहन कर लेतीं ? रूपए न देने पर वह हमें सीट से उठाकर नीचे खड़ा कर देता तो क्या होता? सच बताओ, तुम्हें कैसा अहसास होता? ज़रा सी देर में सफर का सारा मज़ा किरकिरा हो जाता न? कंचन, कुछ समझने की कोशिश करो।

कुलदीप बाबू की शिक्षाप्रद बातें सुनकर कंचन आँखें तरेरती हुई बोली-विद्वान अवसर से लाभ उठाता है। मेरी एक बात कान खोलकर सुनिए-संपन्नता के सामने मान-अपमान जैसी दकियानूसी बातों की आज कोई कीमत नहीं। क्या करना है? कभी-कभी विवेक और विचार से सोच भी लीजिए। आज सरलता और शालीनता का मोल बहुत ही कम है। इतना साहस भी नहीं कि उस चेकर से दो बात कर सकें। आप ही बताइए, जब हमारे जीवन के आदर्श और रूचि-विचार आपस में मेल नहीं खाते तब केले तथा बेर की भाँति विपरीत स्वभाव के हमारे जैसे पति-पत्नी भला एक ही स्थान पर कैसे रह सकते हैं? दामपत्य जीवन की गाड़ी पटरी से उतरती दिखाई दे रही है।

यह सुनते ही कुलदीप होश ही उड़ गए। वह बड़े ग़मगीन हुए। उनके कलेजे में उथल-पुथल होने लगी और हृदय में बर्छी सी चुभने लगी। वह ग़म के सागर में डूबने-उतरने लगे। स्वपत्नी के आत्म विजय का लक्ष्य देखकर बोले-कंचन, मन में ऐसा विचार लाना पाप है। इतनी जल्दबाजी में यह निर्णय लेकर अच्छा नहीं कर रही हो। घर में पुरूष का मित्र स्त्री ही होती है। वह उसके प्रेम और विश्वास की धारा में बहती रहती है। कम से कम तुम ऐसी बातें तो न करो। पति-पत्नी एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। देखो, मेरे मन में अजीब सी पीड़ा हो रही है।

लेकिन, साँप जितना सुन्दर होता है, उतना ही अधिक विषैला भी। कुलदीप के दर्द की कंचन ने तनिक भी परवाह न की। उलटे तिलमिला उठी और उनके पौरूष को ललकारने लगी। बात इतनी बढ़ गई कि कौशलपूर्ण बातें भी देखते ही देखते तकरार में बदल गर्इं। कंचन बार-बार यही सोचती-अगर मैं आज राज़ी हो गई तो यह महाशय हमें हमेशा दबाते रहेंगे। मुझे सदैव झुकना ही पड़ेगा। आज की नारी इतनी कमजोर थोड़े ही है कि मर्दों की अंट-शंट सुनें और जायज़-नाजायज़ मानने के लिए विवश हो। मान न मान, मैं तेरा मेहमान। कंचन अपनी बात पर ही अड़ी हुई थी।

पतिदेव को झुकाने की गरज से बोली- आप भरी गाड़ी में मुझे सरेआम इतना अपमानित कर रहे हैं। बात-बात पर नीचा दिखाने पर तुले हैं। अगर यही बात है तो आप भी कलेजा थामकर सुन लीजिए, मैं आप जैसे जिद्दी मर्द के पास एक पल भी नहीं रहना चाहती। सालगिरह मनाने के नाम पर यहाँ लाकर मेरा बड़ा अपमान किए। मुझे नाहक ही बहुत ज़लील होना पड़ा। वर्षगाँठ का आप जो तोहफ़ा दिए, उसे मैं जीवन भर याद रखूँगी। अब आप का रास्ता अलग है और मेरा अलग। कुलदीप बाबू का हर वक्तव्य उसे निंदनीय ही नजर आता।

वह नागिन की तरह फुफकारते हुए अचानक बोली- मेरी तो तकदीर ही फूट गई। विधाता ने बिना सोचे-विचारे ही मेरी जोड़ी आपके साथ बना दी। यह सुनकर कुलदीप तड़प उठे। मुँह से आह निकल गई। वह उसे समझाने का भरसक प्रयास करते। पर, पत्नी ऐसी कि कुछ सुनने का नाम ही न लेती। उसकी मती मारी गई। मन में गाँठ पड़ गई। उसने खुली बगावत कर दी। वह कुछ सोचने-समझने को तैयार ही न थी। पति- धर्म का मर्म बिना समझे ही कुलदीप नाहक ही उसे दुश्मन नजर आने लगे। तनातनी बढ़ने से उनके अनबन की पराकाष्ठा हद पार कर गई।

लोगों का मेल-मिलाप कराने वाली गाड़ी अब उनके लिए वियोग-स्थल नजर आने लगी। नाच न जाने आंगन टेढ़ा। वे पंजाब मेल को ही कोसने लगे कि न जाने कैसी मनहूस गाड़ी में आ बैठे। पूरे रास्ते उनमें खींचतान ही चलती रही। पत्नी ने पति से अलग रहने को ठान ली। गाड़ी दूसरे दिन शाम को नई दिल्ली स्टेशन पहुँच गई। गाड़ी से उतरते ही उसने कुलदीप से सारे रिश्ते तोड़ लिया और मुँह फेर कर अलग रास्ते पर बढ़ने लगी।

पूछने वह मायके जाने की ज़िद पर अड़ गई। उसका अड़ियल रूख देखकर कुलदीप बोले- कंचन, रात का समय है। चोर-बदमाशों का कोई भरोसा नहीं, कब और कहाँ मिल जाए। नाहक ही कोई ख़तरा मोल लेना ठीक नहीं। इस वक्त तुम सीधे घर चलो। इतनी शीघ्रता भी किस काम की? यदि पीहर की इतनी ही याद आ रही है तो मैं तुम्हें एक-दो दिन में ले चलकर वहाँ घूमा लाऊँगा।

तब कंचन कठोर स्वर में बोली- अब इसकी कोई जरूरत नहीं। मेरे पीछे न पड़ें तभी ठीक रहेगा। क्योंकि मुझे अब आपसे छुटकारा चाहिए। यानी तलाक चाहिए तलाक। मैंने अलग रहने का फैसला कर लिया है। मायके मैं अकेली ही जाऊंगी। रोकने की कोशिश करेंगे तो अंजाम अच्छा न होगा।

यह सुनते ही कुलदीप बाबू पर मानो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। वह बिल्कुल सन्न रह गए। उनकी स्थिति अचानक नाज़ुक हो गई। ऐसा लगता था जैसे उनकी धड़कन ही बंद हो जाएगी। मानो उनके प्राण निकल जाएंगे। अंतस्तल कांप उठा। उनके समझ में कुछ भी न आ रहा था कि अब क्या करें और क्या न करें? उसे समझाने-बुझाने का बड़ा प्रयास किए। पर, कंचन एक ही झटके में उनसे पल्ला झाड़ कर पीहर की राह पकड़ ली।

प्रोफेसर साहब उदास मन से ठकुआए हुए खड़े-खड़े देखते रहे। बाद में काफी मान-मनौव्वल करने पर भी फिर मायके से वापस ससुराल न आई। सास-ससुर तो दूर, माँ-बाप के समझाने पर भी कोई असर न पड़ा। कोई वश न चलता देखकर लाचार कुलदीप कोर्ट की शरण में चले गए। अर्जी देकर कानून से अर्ज किए कि उनकी अपरिपक्व पत्नी को उनके पास रहने के लिए राज़ी किया जाय। बेचारी अभी अल्हड़ और नादान है। दुनियादारी का उसे अभी कोई ज्ञान नहीं। अदालत ने उन्हें एक साथ रहने का हुक्म दे दिया।

परंतु अदालती फरमान से भी कंचन का दिल तनिक न पसीजा। वह आगे बढ़ने को कतई तैयार न थी। कचहरी में आदर्शवादी शौहर से हारकर भी जीवन संगिनी अपने प्राणप्रिय से किसी कीमत पर हार मानने को सहमत न थी। न्यायालय में मुकदमा जीतकर भी कुलदीप बाबू अपनी भार्या से हार गए। समय पंख लगाकर उड़ने लगा। तारीख पर तारीखें पड़ती रहीं। नतीजा यह कि मनुहार के सभी रास्ते बंद हो गए। आखिर, मामला बढ़ते-बढ़ते तलाक के मोड़ तक पहुँच गया।

जज साहब भी कंचन को खूब समझाए-बुझाए ताकि घर न उजड़े। सुलह कराने का जी तोड़ यत्न किए। वह यहाँ तक कह दिए- कंचन, पतिव्रता पत्नी का यही धर्म है कि वह पति के बिना धैर्य न रखे। क्योंकि पति वियोग की दशा में उसे तपस्विनी जैसा जीवन बिताना पड़ता है। स्त्री का बल, हिम्मत और इज़्ज़त-आबरू पति तक ही सीमित है। मिया-बीवी में नोक झोंक चलती रहती है। झूठे आत्माभिमान की शान बघारने के चक्कर में घर उजाड़ना बुद्धिहीनता है। तब भी कंचन टस से मस न हुई।

विवश होकर जज साहब सुनवाई की तिथि आगे बढ़ा देते। मामला ज्यादा ही उलझता हुआ देखकर एक दिन खारिज भी कर दिए। फैसला सुनते ही कुलदीप और कंचन नदी के दो किनारों की भाँति अलग होकर एकाकी जीवन बिताने के लिए मजबूर हो गए । कंचन से बिछड़कर कुलदीप को पत्नी वियोग का बड़ा ग़म हुआ। गुमसुम घर-परिवार से कटे-कटे से रहने लगे। उसकी यादों के सहारे घुट-घुटकर जीने के लिए विवश हो गए। उनका जीवन वौराग्यमय हो गया। आँखें अंदर को धँस गर्इं। उधर कंचन झूठे गुमान की भँवर में भटकती हुई पति वियोग की चिंता में सूख कर काँटा हो गई। वह कुलदीप से तो अलग हो गई लेकिन, उन्हें मन से न भुला सकी। पति विहीन स्त्री संसार के सभी सुखों से वंचित हो जाती है। सोते-बैठते कुलदीप की याद आकर उसे झकझोर देती। उसके हृदय का कोना-कोना सुना हो गया। उसका कांतिमय चेहरा मलिन हो गया। वह रह-रहकर तड़प उठती। लज्जा और शील स्त्री का सबसे कीमती आभूषण है।

मन कभी कहता कि अतीत को भूलकर पति के आगे नतमस्तक हो जाऊँ तो दूसरे ही पल दुविधा के दलदल में धँस जाती। वह सोचती कि एक बार पराजय मान लेने पर जीवन भर लोगों के उलटे-सीधे ताने सुनने पड़ेंगे। इस मोड़ तक पहुँचकर मैं आत्म-समर्पण नहीं कर सकती। इस प्रकार उन्हें अलग-अलग रहते हुए तीन वर्ष बीत गए। पर, बात नहीं बनी।

कुलदीप के बाल सखा संजीव कुमार बड़े विद्वान और सज्जन थे। हँसमुख और दृढ़ निश्चयी भी। एक रोज़ की बात है। संजीव मुंबई (छ.शि.ट.) से नई दिल्ली तक कंचन को जाने-आने के लिए पंजाब मेल का रिज़र्व टिकट खरीदकर कूरियर से उसके पास भेज दिए। उसमें कंचन को अपनी शादी में आने का निमंत्रण वह कुछ इस तरह लिखे-भाभी जी, आपको मालूम ही है कि माँ का साया मेरे सिर से बचपन में ही उठ गया था। आप मेरी माँ समान हैं। यहाँ आकर दो-चार दिन सँभाल लें तो मैं स्वयं को धन्य समझूँगा। आशा है कि आप मेरा दिल न तोड़ेंगी।

दूसरी ओर वह कुलदीप से टेलीफ़ोन पर बोले-भईया, मैं आपकी विवशता और मानसिक पीड़ा से भली भाँति वाक़िफ़ हूँ। किन्तु, आप विवाह में न आएँगे तो मेरा दिल टूट जाएगा। यह सुनकर कुलदीप चुपचाप हामी भर दिए।

वह बोले-अरे पगले, दिल इतना छोटा क्यों करता है? मैं पंजाब मेल से एकाध दिन पहले ही आ जाऊँगा। अब तो तू खुश है न? उधर पत्र पढ़कर काफी उधेड़बुन के बाद कंचन ने भी निर्णय किया कि मैं मुंबई अवश्य जाऊँगी।

अब इसे कुदरत का करिश्मा कहें या कुछ और। मुंबई जाने लिए पंजाब मेल के जिस कोच में कंचन को निचली सीट मिली थी, उसी बोगी और कूपे में कुलदीप को भी ऊपरी बर्थ मिली। ईश्वर की मर्ज़ी देखिए कि जिस दिन कंचन को वहाँ जाना था, कुलदीप को भी उसी तिथि का रिजर्वेशन मिला। नियत तिथि पर वह स्टेशन पहुँचे और अपनी बर्थ पर जाकर शांत भाव से लेट गए। गाड़ी चलने ही वाली थी तब तक कंचन भी आकर अपनी सीट पर उदास मन से बैठ गई। सामने की बर्थ पर 2-3 मनचले जवान लड़के गपशप कर रहे थे।

गाड़ी पूरे दिन चलती रही। फिर रात हो गई। लोग खा-पीकर सो गए। कंचन भी सो गई। वह अकेली तो थी ही। उसे असहाय पाकर वे छोकरे आपस में उटपटांग और बड़ा फूहड़-फूहड़ मजाक करने लगे। अशिष्टतापूर्ण उनका शोरगुल सुनकर कंचन की नींद में खलल पड़ गई। कुछ वक्त चुप रही लेकिन, अभद्रता बढ़ती देखकर भूखी शेरनी की भाँति दहाड़ते हुए बोली-जिसका कोई नहीं, उसका परमात्मा होता है। चुपचाप रहो वरना, अभी पुलिस के हवाले कर दूँगी। मुझे ऐसी-वैसी न समझना।

तब तक आव देखे न ताव। अकेली स्त्री के साथ छेड़खानी करते देख कुलद्वीप बाबू झटपट बर्थ से नीचे कूद पड़े और बाज की तरह झपटकर एक लड़के की गर्दन पकड़कर बोले-इस बेचारी को अकेली और असहाय समझकर तुम लोगों को बड़ी हँसी-ठट्ठा सूझ रही है। इतना मारूँगा कि अक्ल ठिकाने आ जाएगी। बच्चू, अभी सारी मजनूगिरी भूल जाओगे।

उन्हें देखते ही कंचन एक अजीब सी अंतर्वेदना से तड़प उठी। सारी निष्ठुरता देखते ही देखते न जाने कहाँ छू-मंतर हो गई। अंतस्तल कमजोर पड़ने लगा। वह अंदर से हिल गई। कुलदीप की आँखों में आँखें डालकर मार्मिक भाव से सकुचाते हुए बोली- स्वामी, आप वास्तव में कितने आदर्शवादी और नेक हैं। इन बदतमीजों को जाने दीजिए। आज मुझे एक बड़ा अनोखा ज्ञान मिला कि पुरूष का स्त्री के पास रहना सबसे बड़ी प्रसन्नता और सुख क्यों है। मैं झूठे गुरूर में आपसे दूर रहकर भीतर से टूट चुकी हूँ। आपके सहारे की कितनी जरूरत है, इसे मैं भली भाँति समझ गई। बिना पुरूष के स्त्री सच में अधूरी और असुरक्षित है।

कुलदीप शांत चुप पड़े रहे। कुछ बोले नहीं। दिमाग पर कुछ ज़ोर डालने पर याद आया कि अरे,आज तो पहली मई हमारी शादी की वर्षगाँठ है। कंचन उनका हाथ पकड़कर बोली-कितनी विचित्र बात है? विधि का विधान देखिए, आज वही दिन है, जब हम दोनों एक हुए थे और उसके बाद इसी दिन एक-दूजे से अलग भी हुए। कमाल की बात तो यह है कि हम जिस गाड़ी में लड़- झगड़कर अलग हुए थे, वह भी यही पंजाब मेल है। एक दिन वह था कि हम इसे कोस रहे थे। वहीं एक दिन आज का है कि इसे शुक्रिया अदा कर रहे हैं। यह हमारे लिए एक नायाब, स्वर्ग जैसा सुंदर मिलन-स्थल है। जो भूलकर सपने में भी कभी मिलने को तैयार न थे, उन्हे अचानक मिलाकर इसने बड़ा उपकार किया। जब इसे भी हमारा अलग-अलग रहना पसंद नहीं तो हम ही क्यों ऐसे रहें? सारे शिकवे-गिले भुलाकर चलिए हम फिर से एक हो जाएं। हमे माफ़ कर दीजिए। मैं आपकी अर्धांगिनी हूँ। आज सालगिरह का एक ऐसा उपहार दीजिए जो जीवन भर याद रहे। हमें दोबारा अपना लीजिए। मैं और कष्ट नहीं भोगना चाहती।

कंचन का बदला हुआ रूप देखकर कुलदीप को यकीन ही न हो रहा था कि यह वही कंचन है, आज अचानक इतना बदल कैसे गई? यह सोचते हुए फौरन उसके मुँह पर हाथ रखकर कहने लगे- अरे पगली, भूल का अहसास हो जाए तो क्षमा मांगने की जरूरत नहीं। सुबह का भूला शाम को घर वापस आ जाए, उसे भूला हुआ नहीं कहते। देर से ही सही, चलो तुम्हें कुछ समझ तो आई। तुम्हारा झूठा घमंड आपस में सामंजस्य बिठाने में आड़े आ रहा था। यह सुन कंचन उछल पड़ी। नेत्रों से खुशी के आँसू छलक पड़े। नेत्र गिले हो गए। अपने किए पर उसे बड़ा पश्चाताप हुआ। मन में बड़ी आत्मग्लानि हुई। हृदय कचोट उठा। कुछ कहने के लिए अब उसके पास कोई शब्द ही न बचा। शून्यभाव से उनके चेहरे को टुकुर-टुकुर देखने लगी। मानो उनसे कह रही हो कि क्या सोच रहे हैं? दिल की मालकिन को एक बार फिर अपना लीजिए। बातचीत करते-करते सवेरा हो गया। गाड़ी मुंबई पहुँच गई।

गाड़ी से उतरकर कुलदीप बोले-कंचन, सच बताऊँ, आज मैं बहुत प्रसन्न हूँ। तुम मिल गई तो मुझे और कुछ भी न चाहिए। लेकिन, यह तो बताओ कि तुम जा कहां रही हो?

कंचन बोली- संजीव के विवाह में दो-चार रोज़ उनका घर संभालने। लेकिन, आप कहाँ जा रहे हैं?

कुलदीप बोले- जहाँ तुम जा रही हो, वहीं तुम्हारी साया बनकर मैं भी जा रहा हूँ। कंचन! हमें साथ-साथ देखकर संजीव हर्षित होकर झूम उठेंगे। उनकी खुशी का कोई ठिकाना ही न रहेगा। हमारा यह अटूट बंधन जन्म भर का है। तुमने इसे तोड़ने में कोई कसर न छोड़ी। पर, इस गाड़ी ने तो आज वाकई कमाल कर दिया। रही बात उपहार की तो वह तुम्हें बिना मांगे ही दे दिया। इसे सहेजकर रखना, खो न देना।

तब कंचन विनीत भाव से बोली- और यह बहुमूल्य उपहार पाकर मैं धन्य हो गई। जीवन सफल हो गया। इससे बढ़कर क्या प्रसन्नता होगी कि आज हम फिर साथ-साथ हैं।

जब वे संजीव के घर पहुँचे तो उन्हें एक साथ देखकर वह फूले न समाए। उन्हें बड़ा ताज्जुब हुआ। वह कुलदीप के हृदय से लगाकर बोले- कुलदीप भईया, मैं जो देख रहा हूँ, हकीक़त है या कोई सपना? हमें तो विश्वास ही न हो रहा है कि आप दोनों एक साथ सामने खड़े हैं। मुझे भी तो बताइए कि यह सब कैसे संभव हुआ?

तब कुलदीप बोले- क्या बताएं संजीव, यह एक बड़ी विचित्र घटना है। अब देखो न, अलग-अलग आरक्षण कराने पर भी हम दोनों की सीटें एक ही जगह मिलीं। रात को अकेली औरत समझकर कुछ लफंगे इन मेम साहिबा के गले पड़ने लगे। आ बैल मुझे मार, वे इनके साथ छेड़ खानी करने लगे। मैं यह सहन न कर सका। उनसे लड़ने-मरने को उतारू हो गया। जी में आया कि उनका गला ही घोट दूँ। परंतु जो हुआ, वह अच्छा ही हुआ। इन्होंने देखते ही कोई अनर्थ होने से रोक दिया।

इतना कहकर उन्होंने उन्हें सारी कहानी सुना दी। संजीव बाबू सुनकर दंग रह गए। दाँतों तले ऊंगली दबा लिए। तब कुलदीप बाबू हँसकर बोले- संजीव, वक्त-वक्त की बात है। बात बनने पर जब आई तो सारी परिस्थितियां बदलती चली गर्इं। सब कुछ हमारे अनुकूल होता गया। इतने दिन हमें इसी तरह रहना भाग्य में लिखा था। तकदीर ने करवट लिया तो बिना मांगे ही मन की मुराद पूरी हो गई।

समय के करवट लेते ही पति-पत्नी की खोई हुई ख़ुशियाँ पुन: वापस आ गर्इं। चिड़िया बगीचे में फिर चहकने लगी। तब वे पंजाब मेल को धन्यवाद देते हुए संजीव कुमार के विवाह के कामकाज में व्यस्त हो गए।

विचार तलाक सतयुग

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