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Sanya Tikarya

Others

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Sanya Tikarya

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न में शिव न में शक्ति

न में शिव न में शक्ति

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खुद को छुपा कर रखो हमेशा

बात मुझे माँ बतलाती थी,

नकाब रहे व्यवहार पे मेरे

बात ये उसे सताती थी,

सही गलत क्या समझाती थी

प्यार भी मुझसे बेशुमार करती थी,

फिर भी न जाने क्यों माँ मेरी 

सच्चाई से डरती थी।


न में शिव हूँ न में शक्ति,

उस ईश्वर की मैं नेमत थी,

वजूद मेरा भी अधिकार मेरा भी

मैं दृढ़ विश्वास व सहमत थी।


अर्ध नारीश्वर रूप प्रभु का,

या विष्णु जी की माया कहो,

किन्नर हूँ तो क्यों समाज में

आजीवन मेरी निंदा हो ?

  

क्या में बस एक अभिशाप हूँ

नापाक हूँ क्या, क्या एक पाप हूँ,


खुद को खुद में हूँ तलाशती 

कभी सँवरती, कभी निखरती

कभी भावनाओं में यूँ बिखरती  

लज्जा से सिहरती, फिर क्यों हूँ अलग सी ?


मैं तारा हूँ, इस आसमान का 

फिर क्यों चरित्र पर मेरे अंधकार ये

क्यों ये घुटना, क्यों ये सहना

क्यों है ऐसा तिरस्कार ये !


यौवन ने जब छुआ मुझे था,

कुछ बदलाव तो हुआ मुझे था,

खुद के घर से तिरस्कार फिर 

दूषित हास्यास्पद अँखियों से घिर 

प्रियजनों ने मुझे ठोकर मारी,

कहो न कैसे हूँ मैं अस्थिर ।


है समाज ये प्रश्न है तुमसे 

क्या रक्त से मूल्य है वस्त्र का ज़्यादा 

तुम सा ही हूँ मैं मांस का पुतला 

फिर क्यों मुझसे ऐसा इरादा !!

फिर क्यों मुझसे ऐसा इरादा !!


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