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रणनाद
रणनाद
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© Kavi Vijay Kumar Vidrohi

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समरभूमि में काल दुन्दुभी ,
जब रणनादित होती है
अरिनय की सरिता खप्पर में
जब प्रासादित होती है

मृत्युनाग फुफकार उठे अरु
फन विजय पसारे बोले
रक्तपान निर्णय की गुत्थी
जब महाकालिका खोले

बहुत बहा है अरितन शोणित
अब तो मुझ तक आने दो
मलिनजनों के तप्तरुधिर से
खप्पर यह भर जाने दो

तैयार रहो लो ख़त्म हुआ
उस रणभेरी का गुंजन
अतिवीर बढ़ो अब रणपथ पर
खुद करो कालअभिनंदन

कर छिन्न भिन्न हर शत्रु उठा
पुरजोर मुखर तलवारें
आकाशदामिनी वार बनें
निजनयन बनें अंगारे

शांतिकबूतर जिन लोगों ने
सदा काट कर खाये हैं
सतवाचन के अर्थ अभी तक
जिन्हें समझ न आए हैं

उस मानसदल से बोलो अब
कब तक आशा रखना है
तुम मुझे कहो इस माता को
कितना प्यासा रखना है

मिले हार या विजयवरण अब
बस लोहू ही पीना है
मैं कालभवानी इसी तरह
चिरकाल मुझे जीना है

ये कौन समय है भारत का
कैसे पौरुष सोता है
बस मेरा खप्पर भरने दो
लोहू लोहू होता है

सततप्रतीक्षा में बैठी
कब से नर्तन करने को
पाषाणचक्षु हैं बरसों से
अरिमुंडमाल वरने को

2

उदधिराज सम अविलम्बित स्वर
तब जलधिमाल से फूटे
ज्यों सकल दिशा से तीन भुवन
पाषाणकेतु ने लूटे

तड़ितपात से दहली धरती
तल पाताल हुआ था
क्रोधावेशों से चेहरा
अम्बर का लाल हुआ था

दो नयनों से फिर टप टप टप
वेदना भूमि पर टपकी
भीषण सा अचरज कातरता
तब साँस समर की अटकी

दुखियारी नारी देवी सम
ठाड़ी दो हाथ पसारे
पास खड़ी थी कालभवानी
वो अब किस ओर निहारे

खाली खप्पर कर में धारे
अपनी शंका खोली थी
क्रोध त्यागकर प्रश्नवाक्य
फिर रणचंडी बोली थी

फटे वसन कुंठित सा मन
तन से लोहू रिसता है
बता मुझे मेरे बेटों से
तेरा कैसा रिश्ता है

हिमकिरीट हो पहने फिरती
जो है टूटा टूटा सा
नयनपीर दिखलाती है जो
भाग्य तेरा फूटा सा

तब दुखियारी बोल उठी
मैं भी इनकी माता हूँ
मैं ही वीरों के शौर्यवान
इतिहासों की गाथा हूँ

कोई सपूत जब मेरे हित
बलिदान दिया करता है
तब हे बहना! तप्तरुधिर से
तेरा खप्पर भरता है

लख आसमान दुखियारी ने
इक विकल पुकार लगाई
विपल बीतता इसके पहले
एक दिव्य सवारी आई

संलयन दिखा फिर पुंजों का
था रंग रंग आबंटित
था समरभूमि का कण-कण विस्मित
रथ भी था आभामंडित

महाकालिका मुस्काती थी
अरिदलबली हुए हैरान
हाथ जोड़ आभापुंजों ने
झुककर जब किया प्रणाम...

 

क्रमशः

विद्रोही रण रणनाद

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