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आक्रोश
आक्रोश
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© Kavi Vijay Kumar Vidrohi

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हे तप्तरुधिर के भाग्य कोष ! इक बात कहूँ ? आदेश करो । 
त्यागो अब अर्थहीन मसले , जनमंडल में आवेश भरो ।
इन बीते वर्षों में हमने , क्या खोया है क्या-क्या पाया ।
देशप्रेम को त्यागा है , निजस्वार्थ सकल मन भरमाया ।
हम भूल चुके राणा का यश ,सज्जनता लाल बहादुर की ।
झंकारे सारी टूट चुकी , भारत माता के नूपुर की ।
लुटती, सहमी बेटी-बहने हैं , कुरुक्षेत्र की धरती पर ।
थोड़ी भी शर्म नहीं आती, हमको अपनी ख़ुदगर्ज़ी पर ।
माता की छाती चीर चुके हम, जिससे स्तनपान किया ।
जल रहा तिरंगा भारत में, हमने कैसा सम्मान किया ।
हम ख़ुद से लड़ते रहते हैं, कोई विरोध में नहीं खड़ा ।
सारा इतिहास खँगालो तुम, मस्जिद से मंदिर नहीं लड़ा ।
तुम पी.एम हो या सी.एम हो, लेकिन भारत से बड़े नहीं ।
धिक्कार तुम्हारे जीवन पर, यदि राष्ट्रमान हित खड़े नहीं । 
ईमान,त्याग, नैतिकता सब फूँका है क़फनखसोटों ने ।
हर तंत्र हमारा घायल है , गाँधी चिपके हैं नोटों में ।
“विद्रोही” जी कुछ शर्म करो, यदि दावनल आक्रोश नहीं ।
कविता में गर्भ में पलता हो यदि पुण्यप्रलय जयघोष नहीं ।
बस याद रखो उन वीरों को,जिनने अपना तन-मन वारा है ।
खंडन की पीड़ा झेल रहा ,सारा कश्मीर हमारा है । 

आक्रोश- ओजकवि विजय कुमार विद्रोही

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