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आतंकवाद
आतंकवाद
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© Anu Pande

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 बड़ा शोर मचा है आतंकवाद पर आजकल,

पर हिंसा की यह रीत तो है, सदियों पुरानी ।

नारी की गति देखो, जो कल थी आज भी वही,

पाप ओढे, पाप धो -धो, अब तो बेचारी गंगा भई ।

पुरातन काल हो या नवनिर्मित आधुनिक समाज,

नारी तो आतंकवाद का शिकार होती ही आयी ।

जन्म देती आयी मानव को हर युग में,

हर युग में हेय दृष्टि का पात्र ही रही ।

कब देवी बन उपर सिंहासन पर चढ़ना चाहा,

हर लम्हा, मानव सी मानवी ही बनना चाहा ।

कोख में संतति को आसरा देने वाली,

हर युग में आसरा तलाशती ही आयी ।

हिंसा हर स्वरूप में हिंसा ही है,

जो बोया वही फल तो उगा समाज में ।

जो घरों में रोपित हुआ, वही समाज में पल्लवित हुआ,

अब बोलो किस आतंकवाद को कहें धातक।

डोली क्यों अर्थी बनी, मानुष क्यो बने आतंकी? ? 

आतंकवाद नारी

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