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कवि कैसा चोर सा
कवि कैसा चोर सा
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© Shiwanjali Pandey

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कवि कैसा चोर-सा

चोरी करता लाज

रूप रंग और साज

भिक्षुकों का भीख

बेसहारी चीख

वात्सल्य का ब्याज भी

सैकड़ों अभिलाष भी

गणतन्त्र से गण चुराता

तंत्र का उल्लास भी

 

कवि कैसा होड़-सा

पीछे रहने में ही जिसमें जीत हो

मैं लघु हूँ मानता यह प्रीत हो

आपका है आपको यह रीत हो

होड़ हो पर आपसी मनमीत हो

 

कवि कैसा मोर-सा 

रूप यौवन की घटा को देखकर

प्रेम की धूमिल छटा भर देखकर

मानकर कि कब यहीं बरसेगा यह

झूम उठता एक पग बस टेककर

 

कवि कैसा चोर-सा

होड़-सा और मोर-सा

It's all about poet

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