Premjit Sunil Gatigante

Others


3.2  

Premjit Sunil Gatigante

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उन निन्यानवे लोगों को मेरा सलाम

उन निन्यानवे लोगों को मेरा सलाम

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रोज की भांति जब मैं निकल रही थी, तब मेरे कानिष्ठ महाविद्यालाय की प्रचार्याजी ने मुझे वार्षिक उत्साव में जीती हुई रकम दी। मेरा मन प्रफुल्लित हो उठा। सारे मेरे सहपाठी जा चुके थे। सोचा कल बता दूँगी। जैसे ही महाविद्यालाय के बाहर आई तभी मेरा एक विद्यार्थी मिला। वह मोबाइल फ़ोन पर था। 

बच्चे भोले होते हैं उन्हे यह पता नहीं होता माँ सरस्वती हमारी जबान पर रहती हैं और दिन में एक बार कुछ भी कहा सत्य हो जाता है। रिक्शा में बस बैठने जा रही थी तभी उस विध्यार्थी ने मुझे और वह रिक्शेवाले से कहा इन्हे आगे जाकर उतार देना फिर कहा "अरे हमारा अभी बारवी के इंग्लिश के गुण देने बाकी हैं तो ठीक से ले जाओ।"  


उस विध्यार्थी से मैं कुछ कह नहीं पाई क्यूंकि उस विध्यार्थी की मैं यशोधा न बन पाई। हर कक्षा से निकाले हुए सारे विधार्थियों की मैं शिक्षिका बन गई| ११२ में से हर किसी के दिल में जगह नहीं बना पाई। अफसोस है पर ख़ुशी उस बात की भी है कि कुछ विद्यार्थियों का तो जीता यही सची दौलत है। 


थोड़ी दूर जाते आचानक एक कुत्ता आ गया और रिक्शा पल्टी हो गया।   कुछ क्षण मेरी आँखे बंद हो गई और मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा था , सभी लोग मुझे पूछ रहे थे कि ठीक हूँ कि नहीं।कोई मुझे भाभी , कोई शिक्षिका , कोई प्रेमजीत, कोई सुनिल की पत्नी और कुछ लोगों के लिए मैं अजनबी थी। सारे लोगो को मेरी चिंता हो रही थी। किसी ने सुनिल को फ़ोन भी लगाया था पर उनका नंबर व्यस्त आ रहा था। जब तक मैं कुछ बोल पाती रिक्शे वाले को सही सलामत बाहर निकाल लिया था। उसे भी चोट आई होगी पर मुझे वह दिखा नहीं। 


हम कुछ सालों पहले उस जागीर मे रहते थे। बहुत कोशिश के बाद मैंने हिम्मत की और अपना सीधा पैर उठाया जो ज़ख़्मी हो गया था, सीधा  हाथ घिस चुका था और  खून निकल रहा था, बारीक कंकर घुस गए थे। जैसे तैसे कोशिश कायाब हो गई। मुझे पानी पिलाया और मुझे बैठाया l सारे  लोग मुझे अस्पताल ले जाने या घर ले जाने तैयार थे। 


मेरी सहपाठी ने मेरा चेहरा देखा रास्ते में  , पर अफसोस मेरा हाल चाल नहीं पूछा। दूसरे दिन जब में कॉलेज गयी तो पूछा "मैंने देखा लोग तुम्हें बिठा रहे थे।मैंने कहा " कल मेरा एक्सीडेंट हो गया था।" 


 जो मुझे जानते नहीं उन्हे मेरी चिंता थी और मुझे पहचानते थे उनमें कोई इंसानियत नही। दुख नहीं पर खुश हूँ , बड़ी समस्या आई थी पर घर से प्रार्थना करके जाने के फायदे से बच गई। 


मेरे कॉलेज के विध्यार्थी और जिन्हे पता चला मुझे फ़ोन करने लगे मेरी चिंता हो रही थी। दुसरे दिन ही मुझसे मिलने आये। अच्छा लगा मुझे।मैं कृतग्य हो गई उन निन्यानवे लोगों का और उन बच्चों का आप सभी को मेरा सलाम।



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