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Bhagirath Parihar

Others

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Bhagirath Parihar

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सिमटता जीवन

सिमटता जीवन

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 अम्मा गेट के बाहर अपने सामान के साथ बैठी थी चेहरे पर दुख, असहायता और अनचाहे होने के भाव झलक रहे थे। आँखों में सूनापन छाया था। न वर्तमान है न भविष्य इससे अच्छा हो वह अतीत हो जाए। निरर्थक जीवन को दूसरों के सहारे घसीटना, मुरझाते फूल की पंखुड़ियों का गिर जाना और मिट्टी में मिल जाना ही सार्थक है।

इतने में एक कार आकर बंगले के सामने रुकी अम्मा कुछ हरकत में आई। वह खड़ी हुआ चाहती थी कि कार से निकलकर उनका बेटा तपाक से उनके पास आया हाथ पकड़कर खड़ा किया और सामान उठाकर कार की ओर चला। 

बंगले से कोई व्यक्ति बाहर नहीं आया, न आनेवाला व्यक्ति बंगले में गया जबकि दोनों अम्मा के लाडले थे, उनका आपसी व्यवहार बिल्कुल पथरा गया है। अम्मा से भी उनका कोई भावनात्मक लगाव नहीं, बस थोड़ा सा कर्तव्य बोध और लोक लाज बची थी। 

अम्मा जी के इस बंगले में पंद्रह दिन पूरे होते ही बहू ने सामान के साथ बाहर कर दिया और देवर को फोन कर दिया कि अम्मा को ले जाओ।

अम्मा यानी मिसेज खन्ना, जब तक मिस्टर खन्ना जीवित थे वे स्वयं सक्षम थे और वे दोनों अपने मकान में सम्मान का जीवन जी रहे थे। दोनों बच्चे उच्च शिक्षा लेकर अच्छी नौकरी में सेट्टल्ड हो गए थे। दोनों ने अपने बंगले बना लिए मिस्टर खन्ना जितनी सहायता कर सकते थे उन्होंने की।

कार में अम्मा को बैठाकर ड्राइव करते घर पहुंचे। घर में घुसते ही उनकी पत्नी भड़क उठी ले आए पनोती को उठाकर अब भुगतते रहो पंद्रह दिन। बेटा चुपचाप अम्मा को उसके कमरे में ले गया। 

वह कहाँ किसी के जीवन में हस्तक्षेप करती है फिर भी बहुएं उनका तिरस्कार क्यों करती है और बेटे क्यों उनके आगे गूंगे हो जाते हैं? पोते पोती को उनके पास फटकने नहीं देते। कितना संकुचित जीवन हो गया है!



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