शीशे के उस पार
शीशे के उस पार
शीशे के उस पार गाँव के आख़िरी छोर पर एक पुराना सा घर था। लोग उसे “शीशेवाला घर” कहते थे। कहते थे उस घर में लगे शीशे सिर्फ़ चेहरा नहीं, बल्कि इंसान की आख़िरी सच्चाई दिखाते हैं। आयशा को इन बातों पर भरोसा नहीं था। वह शहर से गाँव आई थी—अपनी नानी का घर बेचने के लिए। वही घर… शीशेवाला। शाम ढल चुकी थी। बिजली नहीं थी, मोबाइल में नेटवर्क नहीं। घर के अंदर घुसते ही उसे अजीब-सी ठंड महसूस हुई, जैसे किसी ने उसकी गर्दन पर साँस छोड़ी हो। “कोई है?” उसकी आवाज़ दीवारों से टकराकर वापस आई। हॉल में एक बड़ा सा शीशा लगा था—पुराना, धूल से भरा। आयशा ने जैसे ही शीशे को साफ़ किया, उसकी परछाईं हल्की-सी देर से हिली। वह ठिठक गई। “थकान है…” उसने खुद को समझाया। रात को वह उसी घर में रुक गई। आधी रात अचानक शीशे के टूटने जैसी आवाज़ आई। धड़धड़ाता दिल लिए वह हॉल में पहुँची। शीशा बिल्कुल सही था। लेकिन इस बार शीशे में वह मुस्कुरा रही थी, जबकि असल में उसके होंठ काँप रहे थे। “ये मज़ाक ठीक नहीं…” आयशा फुसफुसाई। शीशे वाली आयशा बोली— “मैं मज़ाक नहीं हूँ। मैं वो हूँ… जो तुम हो सकती थीं।” आयशा पीछे हट गई। “तुम… तुम कौन हो?” “मैं तुम्हारी वो सच्चाई हूँ, जिसे तुमने दबा दिया,” शीशे की परछाईं की आवाज़ भारी और खोखली थी। तभी आयशा को याद आया— सालों पहले, इसी घर में, उसकी छोटी बहन सीढ़ियों से गिरकर मर गई थी। सबने कहा—हादसा। लेकिन सच यह था… आयशा ने गुस्से में उसे धक्का दिया था। शीशे में अब खून के धब्बे उभर आए। एक छोटी बच्ची की परछाईं दिखाई दी। “दीदी…” उस आवाज़ ने आयशा की रूह हिला दी। “नहीं! मैंने जानबूझकर नहीं—” वह चिल्लाई। शीशे की आयशा हँसी। “सच को कब तक छुपाओगी?” अचानक शीशे से हाथ बाहर निकले और आयशा की कलाई पकड़ ली। घर की दीवारों पर फुसफुसाहट गूँजने लगी— “सच… सच… सच…” सुबह गाँव वाले जब घर पहुँचे, तो हॉल में शीशे के सामने आयशा की लाश पड़ी थी। आँखें खुली थीं। चेहरे पर डर जमी हुई थी। और शीशे में… आयशा मुस्कुरा रही थी। अब लोग कहते हैं— जो भी उस शीशे में खुद को ज़्यादा देर देखता है, वह बाहर नहीं निकलता। क्योंकि कुछ सच… सिर्फ़ आत्मा ही सह पाती है।

