परिश्रम
परिश्रम
मेरी कहानी किसी फिल्मों की कहानी नही हैं। ये कहानी हैं मेरे किसी अपने की ,जो मेरे सबसे करीब हैं। ये कहानी हैं लगन, परिश्रम और मेरे कठोर प्रयास की। ये कहानी हैं एक छोटे से गरीब लड़के की, जिसके मेहनत ने उसके सपने पूरे किए और उसने अपनी मेहनत के दम पर सब कुछ हासिल किया।
मेरी कहानी की शुरआत होती हैं ५ अगस्त १९९३ से। मतलब मेरे जन्म से। एक छोटे से परिवार में जन्म लिया। मै अपने माता पिता की तीसरा संतान, तीसरा बेटा।।
बचपन से ही मेने अपने माता पिता को पूरे दिन काम करते, मेहनत से कमाते देखा। जब आरो के माता पिता उस उम्र में सैर सपाटे कर रहे थे तब मेरे माता पिता अपने बच्चों को किस तरह पढ़ाए, का सोच कर पुरे दिन कमाने में लगे थे। पिता मेरे जूती बनाने का काम करते थे,मुश्किल से एक दिन का खर्चा होता था उस कमाई से और माता मेरी कढ़ाई का काम करती थी ,अपने घरबका सारा काम जल्दी जल्दी खत्म कर , अपने काम पर लगती थी, नही सोचती थी की उसके भी कुछ सपने हैं, उसे भी आरो को तरह गंगा स्नान करना हैं या उसे भी आरो की तरह अपने जिंदगी में सारे सुखों को पाना हैं।
वो पूरे दिन बस अपने बच्चों के बारे में सोचती और बस चाहे कुछ भी हो जाए वो हमेशा अपने बच्चो अपने परिवार के बारे मे सोचती।। बस यही देखते देखते मेने अपना बचपन निकाला हैं, कभी परेशानी से जूझ रही मां को देखा तो कभी कंधों पर बोझ लिए पिता को देखा।।कभी भाइयों के प्रेम को देखा तो कभी बड़े भाई को उम्र से बड़े होकर परिवार के लिए कमाते हुए देखा।
देखते ही देखते मेरा बचपन निकल गया।
बचपन से एक सपना था जिसकी रट लिए मैं बड़ा होता गया, पर वक्त को ये भी मंजूर नहीं था।
कभी कभी हम जो पाना चाहते हैं को उतना भी सरल नही होता जितना हम सोच लेते हैं।
बिल्कुल वैसे भी मेने भी यही सोचा था कि अपने परिवार की परिस्थिति ठीक करने के लिए मैं खूब पढ़ाई करूंगा और खूब पढूंगा, चाहे कुछ भी हो जाए मै मेहनत करूंगा।
मैने बस अपनी आंखों में हमेशा डॉक्टर बनने का ही ख्वाब देखा था पर हाल ए वक्त को जहां मंजूर था। कक्षा १२वी जब सब बच्चे अलग से कोचिंग जाते थे तब में एकांत देख कर पढ़ता ओर मेरे पास आरो की तरह इतने पढ़ने के साधन भी नही थे फिर भी कभी रोड़ लाइट से तो कभी किसी के घर जाकर बस पढ़ाई करता । इस तरह से मेने अपनी १२वी पूर्ण की। अपने कक्षा में टॉप पर आने वाला बच्चा था और इस बात का मुझे गर्व भी था।
१२वी के बाद जब सब अपने भविष्य का सोच रहें थे तब मेरा रास्ता साफ था की मुझे कुछ भी हो जाए बस डॉक्टर ही बनना हैं।
क्या कहूं अब मै मेरे बारे में घर में खाने के पैसे भी मुश्किल से होते थे उस वक्त में डॉक्टर की पढ़ाई का भी बोलूं तो कैसे बोलू, फिर भी मेने मां को बोला मुझे डॉक्टर बनना हैं इसलिए मुझे कोटा जाना हैं, मां मेरी भोली सी उसने कहा ठीक है, पर बात पैसे की आई तो वो भी क्या कर सकती थी, पिता के पास भी इतना खर्चा था नही की को मुझे बाहर भेज सके।
एक गरीब परिवार के बच्चे को क्या क्या सहना पड़ता हैं बस वही बता सकता हैं
जैसे मेरी कहानी, कितना भी प्रयास किया पर मुझे कोटा जाने के लिए वहा के खर्चों के लिए पैसे नहीं जुटा पाया और जब मुझे मां ने कहा की पढ़ना हैं तो यही पढ़ । उस दिन मानो जैसे मैं बिखर गया। शुरू से जिस सपने को लिए मै बड़ा हो रहा था वो सपना मेरा छूट गया।
जिस सपने को लेकर मेने विज्ञान लिया को पीछे रह गया। कभी कभी पेसो की मार इंसान को मार देती हैं शायद मेरे साथ भी वही हुआ।
दो दिन तक खाना खाया, अच्छे से सोया नही पर क्या ही करते मेरे मां बाउजी , जब वो खुद पैसे से हारे बैठे हैं। उस वक्त कोई भी हमे उधार देने को भी तैयार नही था। गरीबी में आटा गीला बस वही बात हैं की जब जेब में पैसे नही हैं तो सामने वाला तो यही सोचेगा की ये क्या मुझे पैसे लोटाएगा।
बस वही हुआ, या यह कह दूं मेरे सपने का अंत हुआ।मेरे सपने की हत्या हुई मेरे सामने, और मै कुछ नही कर पाया।। डॉक्टर बनने का सपना बस मेरी किताबों के पन्नो में रह गया।।जिस सपने को लेकर मेने विज्ञान लिया को पीछे रह गया। कभी कभी पेसो की मार इंसान को मार देती हैं शायद मेरे साथ भी वही हुआ।
दो दिन तक खाना खाया, अच्छे से सोया नही पर क्या ही करते मेरे मां बाउजी , जब वो खुद पैसे से हारे बैठे हैं। उस वक्त कोई भी हमे उधार देने को भी तैयार नही था।
गरीबी में आता गीला बस वही बात हैं की जब जेब में पैसे नही हैं तो सामने वाला तो यही सोचेगा की ये क्या मुझे पैसे लोटाएगा। बस वही हुआ, या यह कह दूं मेरे सपने का अंत हुआ।
मेरे सपने की हत्या हुई मेरे सामने, और मै कुछ नही कर पाया।। डॉक्टर बनने का सपना बस मेरी किताबों के पन्नो में रह गयाऔर साथ ही मुझ में छुपा को डॉक्टर बनने का वो एक प्यारा सा अहसास भी।।
पर फिर भी मेरी कहानी अभी खत्म कहा हुई हैं, शायद मानो जैसे कहानी की शुरआत हुई हैं।
किसी भी तरह बस अपने मन को मनाता गया और मैं सोचता गया सफेद कोर्ट तो पहनना ही हैं, अब डॉक्टर न सही तो नर्स ही सही। मेरे अच्छे नंबर के कारण मुझे घर से तकरीबन १०० km दूर कॉलेज में दाखिला मिला। सरकारी कॉलेज में दाखिला मिला तो फीस की चिंता तो नहीं थी पर घर से दूर रहना, खाना पीना कहा रहना ये सब खर्चे केसे होने , ये मै भी कही जनता था बस मेने तो कह दिया था मैं देख लूंगा।
तो मै निकल पड़ा घर से दूर घर को सजाने अपने आप को सजाने और अपने ख्वाबों को नई उड़ान देने, अपने बिखर गया सपने को पूरा करने। कॉलेज के पहले दिन ही पिता जी ने कमरा दिलाया वहा रहने के लिए और खाना बनाने के रसोई का सामान। कैसे बताऊं कितना मुश्किल था , खुद खाना बनाना, खाना।
कॉलेज के पहले दिन तो ऐसा लगा कि मै भाग जाऊं घर चला जाऊ पर मेरे सपनो ने तो मेरे पैरो में बेड़ियां लगा दी हो, मै थका जाता घर जाने के लिए रोता पर घर नही जाता, कॉलेज से आना खाना बनाना कभी कभी रात में ड्यूटी करना , ये सब मेरे लिए मुश्किल होता जा रहा था, ऐसा लग रहा था की यार कब रविवार आए कब घर जाऊ ओर वापस भी न आऊ और फिर पूरे सात दिन बाद घर गया।
घर जाने के बाद क्या हुआ?
क्रमशः
