Anurag Saxena

Children Stories Inspirational


4.5  

Anurag Saxena

Children Stories Inspirational


पंछी की अंतरात्मा

पंछी की अंतरात्मा

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एक पक्षी तार पर बैठा था अचानक जोर से आँधी आई जिससे उसका संतुलन बिगड़ गया और वो नीचे कीचड़ में गिर गया।

थोड़ी देर के पश्चात जब आँधी चलनी बंद हो गई तो उसने उड़ने की कोशिश की किंतु पंखों में कीचड़ लग जाने के कारण उसका प्रयास असफल रहा। कुछ लोगों की नजर में पड़ा तो वो उसे पत्थर मारने लगे, पत्थर मारने के बहाने निशाने बाज़ी करने लगे, इस वजह से उसके पंख घायल हो गए और बार-बार असफल होने के बाद अब उसने उड़ने की कोशिश भी छोर दी। वो मन ही मन में सोचने लगा कि, "मुझे उड़ना आता है मगर मेरा वख्त ख़राब निकला, मैं तो पंछी हूँ ये इंसान क्यों बेहिसाब निकला, जिन हाथों को मुझे साफ़ करके उड़ा देना चाइये था,

क्यों इन्हीं हाथों से मेरी ओर दाने की जगह केवल पत्थर ही निकला",  

पक्षी यूँ ही घायल पड़ा रहा इंतज़ार करता रहा कि कोई तो इंसान होगा जिसे इंसानियत याद होगी, साँसे अटक रही थी धड़कन भी थम रही थी मगर आसपास किसी का नाम-ो-निशाम नहीं था, तब एक चमत्कार हुआ, सामने बिल्डिंग के दूसरे माले से एक ६ साल के बच्चे ने ये सब देखा और भगवान् जाने कैसे भाप लिया की पंछी घायल है और मदद के लिए आस लगाए बैठा है। उस समय केवल वो 6 साल का बच्चा और उसका कुत्ता ही घर में थे। जैसे ही बच्चे ने उस पंछी की तरफ़ इशारा किया और अपनी तोतली आवाज़ में बताओ-बताओ बोला, नाजाने उस कुत्ते को कैसे ये सब समझ आया और वो फुर्ती से नीचे गया और उस पंछी को अपने मुँह में दबाके ऊपर बच्चे के पास ले आया। बच्चे ने उसके पंख में लगी खूब सारी मिटटी देखी, जख्म दूसरी तरफ था तो वो दिखा नहीं। बच्चे की समझ में यही आया कि ये गन्दा है नहाया नहीं है काफी दिनों से इसलिए उड़ नहीं पा रहा है, वो उसे लेकर बाथरूम गया और उसे साफ किया।

तत्पश्चात उसे पंछी का जख्म दिखाई दिया, उसी समय टीवी पर स्टेफ्री का एडवर्टाइजमेंट आ रहा था और बच्चे को याद आया की एक बार उसने अपनी मां से पुछा था इसके बारे में तो उन्होंने बोला था की ये चोट पर लगाते हैं, बच्चे ने तुरन्त उस बात को इस बात से जोड़ा और अलमीरा से एक पैड निकाल लाया, उसने देखा ये पंछी तो छोटा है और पैड काफी बड़ा है, पैड व्यर्थ हो जायेगा,

तब वो जाके एक कैंची और टेप लेके आया, पैड को छोटे टुकड़े में काट दिया, बच्चे ने अपनी मां के कहे अनुसार टेबल पर रखे चोट का ट्यूब उठाया और पैड के टुकड़े पर दवा लगाई, ऊपर से टेप लगाके पंछी के ज़ख्म पर सेट कर दिया। तब बच्चे ने सोचा की पंछी भूका होगा तो उसने डोगी की कटोरी जिसमे दूध था उठाया और पंछी के समक्ष रख दिया, पंछी पहले से ही प्यासा और भूखा था इसलिए उसने थोड़ा दूध पिया और कुछ घंटों बाद वो ठीक हो गया, जब वो थोड़ा थोड़ा उड़ने लगा तब उड़के चला गया, उस पंछी को कुछ ऐसा लगाव हो गया था उस बच्चे से की कुछ-कुछ दिनों में उस बच्चे से मिलने आता था। 

उसको देख के उसके मन में सवाल आया, जब तक ये बच्चा छोटा है तो इसने मेरी जान बचाई, मेरी मदद की, बड़े होकर ये भी क्या अन्य लोगों जैसा बन जायेगा? 

मेरे मिट्टी लगने से मैं उड़ नहीं पाया, क्या बड़े होकर इंसान भी मैले हो जाते हैं, जो सही गलत का फैसला नहीं कर पाते।

बचपने में जो हाथ बचाते हैं, वही हाथ बड़े होकर पत्थर मारते हैं। ऐसी कौनसी मिट्टी उनके शरीर पर चढ जाती है जो उन्हें ऐसा बना देती है? 

उसके बाद उस पंछी ने पूरी जिंदगी उस बच्चे के आसपास रहके गुजार दी बस इसी सवाल में की वो कौनसी उम्र होगी जब ये भोला भाला बच्चा भी हाथों में पत्थर उठाता है और किसी पंछी को घायल करता है।


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