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विशाल यादव बेबाक

Others

4.0  

विशाल यादव बेबाक

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पाप का ठिकाना

पाप का ठिकाना

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श्रेणी: कविता / दोहा

रचना:

​पाप किए जो भूमि पर, मन में भरा विकार।

अब ढूँढे चोर आकाश में, छिपने का आधार ॥

लेखक की कलम से:

अक्सर इंसान यह भूल जाता है कि उसके कर्मों की गवाह यह धरती और वह आसमान दोनों हैं। विकार मन में पालकर हम स्वर्ग की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ सकते। कर्म का फल अटल है, छिपने का कोई आधार नहीं।

— विशाल यादव 'बेबाक'

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