पाँच दिन
पाँच दिन
कनकनाती ठंड, खिड़की से झाँकती हल्की धूप और सेवई का उपमा.....
तबीयत थोड़ी ख़राब है। अरे नहीं कुछ खास नहीं हुआ, वहीं महीने के तकलीफ भरे पाँच दिन। जिस पर यूँ किसी ग्रुप में चर्चा करना भी असभ्य माना जा सकता है। पर क्यों ?
क्योंकि ये वर्षों से चली आ रही परम्परा है। इस पर खुल कर बोलना भी ज़ब अटपटा सा लग सकता है, ज़रा सोचिए, तकलीफ होने पर भी मुंह बंद रखना कितना पीड़ादायक होगा।
हम बिहारियों में रसोई से भी छुट्टी नहीं मिलती इन दिनों। शायद मिलना चाहिए था, इसी बहाने आराम तो होता। असहाय पीड़ा, हज़ारों काम और ऊपर से बच्चों की देखभाल। बाप रे वो भी क्या दिन थें। लगता था की बस कैसे भी सब कर लूँ। पूजा पाठ की अनुमति नहीं, तो वो काम घट जाता था। पर उसके बदले मिलते थे और भी काम। मतलब औरत की इस पीड़ा को औरतें नहीं समझी।
मेरी कहानी तो अब पुरानी हुई। मम्मी ने कभी बताया नहीं था पहले। और स्कूल में पहली बार इसका आना मेरे बाल मन में काफ़ी डर पैदा कर गया था। कैंसर नई बीमारियों में तब टॉप पर हुआ करती थी। मैं मन ही मन सोच कर मरी जा रही थी, की जैसे ही मम्मी को बताऊंगी की ऐसा हो रहा है। वो पक्का बोलेंगी की अरे पिंकी तुझे तो कैंसर हो गया।
डरते डरते कैसे मैं स्कूल से घर गई थी, आजीवन भूलने लायक नहीं। वो मेरा जमाना था। खुल कर बात कहाँ होती थी। और घर के बच्चों में मैं स्वयं सबसे बड़ी थी।
पर अब तो बारी है बेटी की। मैं खुल कर बात करती हूँ। और बेटी ने ही मुझे सिखाया, की मैं बेवजह इस पीरियड से इतनी डरती हूँ।
बेटी के शुरुआती दिनों में माँ का दिल करुणा से भर जाना सामान्य है। उसकी हालत देख कलेजे का फटना, हर बेटी के माँ के हिस्से आया होगा।
बचपन की पगडंडी से,
यौवन वाली गली में...
जाते ही मिल जाते हैं,
वो पाँच दिन तकलीफ के।
डरा दे किसी भी बाल मन को..
रक्तस्राव भयभीत से।
मानो स्थिति का पल पल बदलना,
कमर के दर्द से धीरे धीरे चलना।
मन मितलाना, सर का दुखना,,
सम्भल सम्भल के चलना झुकना।
नन्हीं नन्हीं आँखों में पानी की बुंदे,
क्या सोचे बिटिया मेरी,
अपनी आँखों को मुंदे??
क्यों होता है ऐसा मम्मी??
मुझसे नहीं सम्भलता।
हाँ बेटी होना अब है मुझे खलता!
आपकी तरह मैं दवा नहीं खाऊंगी,
कमर दर्द होने पर मैं,
बोतल से सेंक लगाऊंगी।
पैड की क्वालिटी आप अच्छी ही लाना,
घंटों होता है मुझे स्कूल में बिताना।
गुमसुम सा चेहरा और इतनी बातें,
कट ही जाती हैं ये मुश्किल पाँच रातें।
मैं उसको तब, हर बार थी बताती,
क्यों ये तकलीफ है सिर्फ लड़की को सताती।
क्यों इसके लिए ईश्वर ने औरत को ही चुना,
औरत में सहन शक्ति पुरुष से सौ गुना।
महीने में पाँच दिन, है याद ये दिलाते,
स्त्री का अस्तित्व, इसी रूप में बताते।
रक्त का सम्बन्ध है सृजन से होता,
लड़कियों का हर गर्भ नवजीव है पिरोता।
