साड़ी
साड़ी
पाँच मीटर का कपड़ा जिसमे ना जाने कितने अरमानों के धागे लगे होते हैं। लगे होते हैं खुशियों के बेल बुटे।अरमानों की किनारे होती हैं। और स्नेह सा छांव लिए खूबसूरत आँचल।
इंराधनुषी सपनो जैसे अनगिनत रंग।
हाँ हाँ.. पता है इंद्रधनुष में सिर्फ 7 रंग होते हैं। पर कितनी हीं बार एक साथ कई रंग मिल जाते हैं, और बन जाता है एक नया रंग। और यूँ हीं एक नए रंग की साड़ी भी।
मिज़ाज़ के अनुसार इसका चुनाव होना। किसी को पसंद हल्का रंग, तो किसी का चटक रंगों पर दिल खोना। कोई रेशम सा मुलायम चाहे, तो किसी को खादी के करारे किनारे पसंद। कोई सूती में सुकून ढूंढे तो कोई सलमा सितारे में देखे अपना रंग।
नानी से मम्मी... फिर मम्मी से मैं। और अब अपनी रिद्धि को भी छुप के साड़ी पहनते देखती हूँ ना, तो आँसू निकल आते हैं। की कैसे ये परंपरा सी बढ़ रही है पीढ़ी डर पीढ़ी।
कभी स्लीवलेस, कभी चुरीदार बाजु, कभी लटकानों वाली बांधनी तो कभी कॉलर नेक की ब्लाउज। पर साड़ी तो वही पाँच मीटर में हीं आती है। बदल रहे इस दुनियाँ में कोई तो लिबास है, जो अपने खुद के शक्ल में आती है।
औरत की गरिमा,तो कभी फटी हुई दिखकर वो दुःख में है ये समझाती।
लाल है तो दुल्हन की होगी... सादा रहने दो, क्या बिधवा को रंग में रंगोगी।
समाज के धकियानुसी विचार से भी अछूति नहीं ये, साड़ी।
टर्टल नेक की टीशर्ट के साथ ज़ब नवयुवातियाँ इसे तन पर सजाती है, तो लगता है कि इसको हराना किसी वेस्टर्न ड्रेस के बस की बात हीं नहीं।
लतीफ चाचा की बारीक़ कारीगरी पर दुर्गा देवी का दिल आता है,,, अरे ये साड़ी मजहब की दिवार को भी मिटाता है।
इसे संभालना हर किसी के बस की बात नहीं।
साड़ी है ये, आधुनिकता के इस युग में अगर इसे पहना जा रहा है, तो कुछ तो बात होगी इसमें।
पाँच मीटर का कपड़ा,
कहते हैं जिसे साड़ी।
इसको पहन कर लगे,
पारम्परिक हर नारी ।
