ऑटोवाला

ऑटोवाला

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शाम के 4:00 बज रहे हैं। मैं ऑफिस से जल्दी घर जाने का सोच रहा हूँ। क्योंकि मौसम अच्छा नहीं है। आसमान में घने बादल छाए हैं। ऐसा लगता है मानो रात हो गयी हो और लुधियाना (पंजाब) की बारिश थोड़ा सा भी बरसे तो सड़के पानी में डूब जाती हैं। यहाँ के लोगो को तो कम लेकिन हम जैसे लोगो को बहुत मुश्किल हो जाता है, जो लोग घरों से दूर नौकरी करने आये हैं और किराये के मकानों में रहते हैं फिर मैं तो आया भी हिमाचल से हूँ। पहाड़ों में कहाँ पानी रुकता है। अभी ऑफ़िस से निकल कर सड़क पर पहुंचा ही था कि बारिश शुरू हो गयी बारिश बहुत तेज थी पल भर में भिगो दिया सड़क पर ऑटो भी गिने चुने दिख रहे थे, तभी एक ऑटो मेरे पास आया। मैने कुछ पूछे बिना ही बिना किसी देरी के उसमे चढ़ना उचित समझा। बैठते ही मैंने अपने बालों को झाड़ना और चेहरे को पोंछना शुरू किया। उसके बाद अपना पर्स और फ़ोन देखा सब ठीक था फिर बाहर देखा तो सड़क पूरी खाली खाली दिख रही थी मानो आज सारा शहर खाली हो गया हो और लोग सब कुछ छोड़ के कहीं चले गए हो। कुछ रह गया था तो वो था सिर्फ पानी ही पानी तभी मुझे याद आया के कुछ खाने का सामान भी घर ले के जाना था। लेकिन आज तो खुद पहुँचना मुश्किल सा लग रहा था तो सामान किसने देखा। अचानक ऑटो जोर से हिला तो मैंने ड्राइवर से कहा भाई ऊपर वाला तो रहम नहीं कर रहा आप तो कुछ रहम करो उसने मुस्कुरा के कहा साहब कुछ भी नहीं दिख रहा पूरी सड़क में तो पानी भरा है और सड़क पर गड्ढों की तो बात ही क्या करनी इतना कहते ही उसका फ़ोन बजने लगा।

फ़ोन सुनने के बाद उसके चेहरे पर कुछ परेशानी झलक ने लगी ऑटो में हम दो ही थे तो अब वहां ख़ामोशी थी। इसके बाद मैं अपनी ही उधेड़ बुन में लग गया। ये महीने के आखिर दिन चल रहे थे। सैलरी आने में अभी कुछ दिन बाकी हैं और काम बहुत सारे हैं। अपने लिए कपड़े लेने हैं, घर का किराया भी देना है, आगे ऐसे ही लिस्ट बनाते गये तो ये बहुत लम्बी बनेगी। मैं अभी इन सब मे उलझा ही था के एक दम जोर की ब्रेक लगी तो मैं अपने ख्यालों से बाहर आया। ऑटो वाला जल्दी से नीचे उतरा और सामने कोई आदमी खड़ा था, छाता ले के उसकी तरफ बढ़ गया हाथ जोड़े हुए उसने रेन कोट पहन रखा था। एक हाथ में छाता और दूसरे हाथ में किसी तरह की किताब जैसा कुछ लगा और दोनों आगे एक दुकान की तरफ बढ़ गए। ड्राइवर उसके सामने हाथ जोड़ कर कुछ कह रहा था। दूरी और बारिश की वजह से में साफ़ देखने में और उनकी बात सुनने में समर्थ नहीं था। इसलिए मैं दूसरी तरफ हो रही बारिश देखने लगा।

कुछ ही देर में ड्राइवर आया ऑटो स्टार्ट करके चलने लगा वो धीरे धीरे कुछ बड़बड़ा रहा था। कुछ झिझक के बाद मैंने उससे पूछ ही लिया के वो कौन था और क्या कह रहा था। उसने भरी हुई आँखों से पीछे की ओर सिर घूमा के कहा साहब पुलिस वाला था। इनको पैसे दो या 300 - 400 का चालान कराओ। मेरे पास सिर्फ 200 रुपये ही थे वो भी ले गया। आज सिर्फ यही कमाई हुई थी वो भी गयी। घर से बीवी का फ़ोन आया था के लड़की बहुत बीमार है। उसे बहुत तेज बुखार है। उसके लिए दवाई ले के जाना था इनका पेट नहीं भरता तो गरीबों की दवाई कहाँ से आये। मैंने उससे पूछा तुम्हारी लड़की की उम्र क्या है। उसने जवाब दिया साहब 5 साल की है। बच्चे बड़े हो तो कोई बात नहीं, दो दिन में बिना दवाई भी ठीक हो जाये लेकिन छोटे बच्चों का क्या करे।अगर वक़्त पर दवा न हो तो दुआ भी असर नही करती।

फिर यहाँ गरीबों की कौन सुनता है भगवान भी अमीरों का ही है। फिर वो चुप हो गया। मेरे मन में अब उसकी लड़की की एक धुँधली सी तस्वीर बन रही थी। तभी उसने ऑटो रोक कर कहा साहब हम पहुँच गये। मैं एक दम उन सवालों और जवाबों की उथल - पुथल से बाहर निकला और अपनी जेब से

पैसे निकाले मेरे पास 500 रुपये ही थे। उसे 300 रुपये देते हुए कहा ये लो मेरे पास इतने ही है। लड़की के लिए दवाई लेते जाना वो मेरे चेहरे की तरफ देखता रहा और 20 रुपये लिए बाकी मुझे वापस करते हुए कहा आप का बहुत - बहुत शुक्रिया, अगर मैं ऐसे पैसे ले लूँ तो मुझ में और उसमें फर्क ही क्या रह गया साहब। ये कह मुस्कुराया और वो आगे बढ़ गया लेकिन मैं आज भी जब उसके बारे मैं सोचता हूँ। तो अपने आप को उस बारिश में खड़ा महसूस करता हूँ। 

बस सोचता हूँ अमीरी किसी को कितना ग़रीब और गरीबी किसी को कितना अमीर बना देती है, "कोई सब कुछ पा के भी गिड़गिड़ा गया तो कोई खाली पेट ले के भी मुस्कुरा गया।"


                               





















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