Nidhi Shukla

Others


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Nidhi Shukla

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मै एक नारी हूँ।

मै एक नारी हूँ।

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दोस्तों आज मैं आपको कोई काल्पनिक कहानी नहीं बल्कि अपनी खुद पर बीती आपबीती सुनाती हूं।

जब मैं सिर्फ 21 वर्ष की थी तभी मेरे पिता ने मेरा विवाह कर दिया क्योंकि मेरे पिता जी अधिकतर बीमार रहते थे उन्हें चिंता थी कि उनके ना रहने पर कौन उनकी दो बेटियों के हाथ पीले करेगा।

बस इसी कारण मेरा विवाह एक छोटे से कस्बे में कर दिया गया।

मैं शहर के माहौल में पली एक अच्छे कॉलेज की तेज तर्रार स्टूडेंट थी हर कार्यक्रम में भाग लेना मेरी प्राथमिकता थी वाद विवाद प्रतियोगिता में जिला स्तर पर प्रथम आई थी।

पर अफसोस मुझे एक ऐसे परिवार की बहू बनना पड़ा जहां जेठानियाँ अनपढ़ थी क्योंकि सोच थी क्या करना है पढ़ कर आखिर बनाना तो रोटी ही है।

घर के बाहर निकलना तो दूर घर में भी अपने पति के सामने बाहर घूंघट में रहना होता था।

ज़िन्दगी में पहली बार देखा था मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनता और घर की औरतों का सारे आदमियों के खाना खाने के बाद ही खाना।

सबसे ज्यादा अचंभित तब हुई जब किसी कार्यक्रम के दौरान बड़ी से बड़ी दावत में घर की औरतें ही खाना बनाती थी।

मैं जिस माहौल से आई थी वहां छोटे से फंग्शन में भी हलवाई लगता था और घर की महिलाएं गपशप करती थी खूब सजधज कर शामिल होती थी।

पर यहां देख कर महसूस होने लगा कि सच में औरत का अपना कोई वजूद ही नहीं होता सारी पढ़ाई लिखाई धरी की धरी रह गई।

एक लंबे घूंघट में मेरी दुनिया सिमिट कर रह गई सिवाय अफसोस के कर भी क्या सकती थी क्योंकि पति ने घर में जो माहौल देखा था उसके विपरीत जाना शायद उनके वश में नहीं था।

 शिकायत करने पर जवाब मिलता हम नहीं गए थे आपके दरवाजे पर आपके घर से ही रिश्ता आया था। 

बस मेरा मुंह बन्द हो जाता, खैर परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की कोशिश करने लगी इसी तरह तीन बेटियों और एक बेटे की मां बनी।

 समय धीरे धीरे आगे बढ़ता गया घर के बुजुर्ग स्वर्गवासी हो गए और जवान लोगों में आपस में बनी नहीं अतः बंटवारा हो गया।

 एक दिन मैंने एक न्यूज़ पेपर में देखा कि हमारे कस्बे के एक संस्था द्वारा सावन क्वीन प्रतियोगिता आयोजित कराई जा रही है बस उत्साह के साथ चुपचाप फार्म डाल दिया बिना ये सोचे कि कोई भाग लेने देगा कि नहीं आखिर कौन सा बहाना बना कर घर से निकलूँ जो कार्यक्रम में हिस्सा ले सकूं।

 परंतु भाग्यवश जिस दिन प्रोग्राम था उस दिन ही पतिदेव को बाहर जाना पड़ा बस मेरे तो बारे न्यारे हो गए अब बेफिक्र होकर जा सकती थी बस फिर क्या था पूरे जोश के साथ कार्यक्रम स्थल पर पहुँच गई।

 बेहद खुशी तब हुई जब मुझे सावन क्वीन चुना गया और तालियों की गड़गड़ाहट के बीच मेरा जोरदार स्वागत किया गया उस दिन 40 वर्ष की उम्र में भी खुद को एक कॉलेज गर्ल महसूस कर रही थी वो एक रोमांचकारी पल था मेरे लिए जब सिर पर सावन क्वीन का ताज पहनाया गया इतने सालों बाद मैंने आज फिर अपने हिस्से की ज़िंदगी जी थी आंखों में अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी सब कुछ एक स्वप्न सा था उस दिन।

 अगले दिन सारे न्यूज़ पेपर में मेरी तस्वीर नाम के साथ छपी थी बस उस पल मेरी सारी खुशी काफूर हो गई डर गई कि अब घर में क्या माहौल बनेगा।

पतिदेव घर वापस आ चुके थे और न्यूज़ पेपर मांग रहे थे मैंने डरते डरते उनको पेपर हाथ में थमा दिया क्योंकि मेरे चाहते हुए भी ये बात अब छुपनी तो नहीं थी।

 पति ने अखबार के पन्ने पलटने शुरू किए और मेरे दिल की धड़कन ने जैसे मेरा साथ ही छोड़ दिया हो।

 अचानक आवाज आई (खुशी और अचम्भित भरी) अरे ये क्या निधि तुम्हारा फोटो निकला है इसमें तुम सावन क्वीन का खिताब जीती हो वाह मुझे नहीं मालूम था आज इतने सालों बाद भी तुम कुछ कर दिखाओगी वंडरफुल इमेजिंग वाओ बच्चों देखो जो तुम लोग नहीं कर सके वो तुम्हारी मम्मी ने कर दिखाया।

 पति के मुख से ये शब्द सुन कर मेरी खुशी दुगनी हो गई फिर क्या था हर रिश्तेदार को कटिंग भेजी जाने लगी हर कोई मेरे साथ साथ मेरे पतिदेव को भी बधाई दे रहा था हम दोनों बेहद खुश थे।

तब से आज तक मेरे पति हर कार्यक्रम में मेरा स्पोर्ट करते है आज मैं फिर से अपनी खोई ज़िन्दगी जी रही हूं बेहद उत्साह के साथ 

 हाँ आज मैं गर्व से कह सकती हूं कि मैं एक नारी हूं जो अपने पंख फैला कर आसमान की ऊंचाइयों को छूने का प्रयास कर रही हूं।

 अंत मे इतना ही कहूंगी की सपनों को पूरा करने की कोई उम्र नहीं होती बस लगन और आगे बढ़ने की ललक होनी चाहिए।

   


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