मानवता
मानवता
"आज सुबह से ही शहर में उपद्रव हो रहा था। सरकार के किसी फैसले को लेकर देश मे विरोध मार्च निकाले जा रहे थे । विरोध की आग अमन के शहर में भी आ गयी कुछ संगठनों द्वारा विरोध प्रदर्शन का आव्हान किया गया था। अचानक इस शांति पूर्ण प्रदर्शन में कुछ शरारती तत्वों ने शहर को दंगे की आग में झोंक दिया जगह जगह आगजनी पथराव की घटनाएं होने लगी । राहगीरों को निशाना बनाया जाने लगा गाड़ियों व बसों में आग लगाई जाने लगी । चारों ओर अराजकता का माहौल , पुलिस प्रशासन शांति कायम करने में जुटा था तभी पुलिस के एक आला अधिकारी के एक पत्थर सर पर पड़ा उसके सर से खून की धार बहने लगी।
अपने अधिकारी के सर से खून निकलता देख पुलिस वालों की आंखों में खून उतर आया। अब उन्होंने ताबड़तोड़ लाठीचार्ज शुरू कर दिया जो उनके हत्थे चढ़ता भारी पिटाई चारो ओर अफरातफरी , चीख पुकार जिसे जहां जगह मिल रही दौड़ रहा छुप रहा इन सबके बीच कई निर्दोष परिवार से बिछुड़ गए ।
इन सबके बीच एक दो साल का बच्चा भी अपने माँ बाप से बिछुड़ गया और बीच सड़क पर रो रहा था। दयानन्द जी जो अपने बच्चों के लिए खाने पीने का समान लेकर जा रहे थे उनकी नजर पड़ी। दयानंद जी ने सोचा यदि बच्चे को न बचाया गया तो निश्चित ही किसी मुसीबत में फंस सकता है। पर क्या करें चारो ओर ओर पेट्रोल बम फेंके जा रहे थे और पुलिस भी सबको एक तरफ से कूट रही थी खुद की जान का भी खतरा था।
अचानक उन्होंने बच्चे की ओर दौड़ लगा दी उसे उठाकर सुरक्षित जगह ले आये उससे पूछा कि क्या नाम है वो कुछ न बोला सिर्फ माँ , मां करता रहा जब शाम तक शान्ति हो गयी तो वो उसको अपने घर ले आये कई दिन तक उसको पूछने वाला कोई न आया तो उन्होंने खुद पास के पुलिस स्टेशन में जाके सारी बात बताई। वहां पता चला कि उस दिन दंगों में कई निर्दोष महिला पुरुष मारे जा चुके थे । पुलिस अधिकारी ने उनसे बच्चे को अनाथालय भेजने की सलाह दी पर दयानंद जी के दिल इसके लिए तैयार नही हो रहा था बच्चा भी उनको बड़े प्यार से देख रहा था।
उन्होंने सोचा पता नही किस जाति धर्म का बच्चा है क्या करूँ अनाथालय ले जाऊं या घर । बहुत देर तक उनके मन मे अंतर्द्वंद्व चलता रहा । आखिर में मानवता जीत गयी दयानंद जी उसे घर ले आये। घर वालों ने भी बहुत विरोध किया पर वो न माने । जब भी बच्चा माँ कहता दयानंद जी उसे समझा देते आ जाएंगी एक दिन जबकि वो जानते है माँ कभी नहीं आएगी कभी नहीं।
