STORYMIRROR

लपकती लाश

लपकती लाश

4 mins
3.6K


खून भले ही सूखकर पपड़ी  बन गए थे पर लाश अभी भी कोमल थी। उसके शरीर से कोमलता जाने का नाम नहीं ले रही थी। लाश बन चुकी थी पर लग नहीं रहा था कि मरी है। ऐसा लग रहा था कि पेटकुनिया सोई हुई है रूठ कर! पर जैसे ही बाॅडी को सामने घुमाया तो। उसका मुंह किसी भूतहा फिल्म के भूत से भी ज्यादा खतरनाक दिख रहा था। केवल मुंह नहीं बल्कि आगे का पूरा हिस्सा एक परत छिल दिया गया था, किसी पेड़ के छाल की तरह। अगर कुछ सलामत था तो वह था उसका दांत जो कि उसे और भी भूतहा बना रहा था। आंखें खुली थी शायद कातिल का दीदार कर रही थी।
लाश को उठाने के लिए झुका तभी ना जाने किसी गिले और लार जैसे चिकने द्रव्य पर पैर फिसल गया और मैं उस लाश पर गिर पड़ा। ऐसे गिरा कि मेरे आंख उसके आंख से जा मिले। तबतक पीछे से कुछ हाथ मेरे पीठ को पकड़कर उठाए।
 'भाई मुझे छोड़ो और इस लाश को उठाकर गाड़ी में रखो।' बाकी लोग लाश को उठाने में लग गए और मैं अपनी वर्दी झाड़ने  लगा पर खून का दाग झाड़ने  से कहाँ छुटने  वाला था। इतने में किसी के फोन की घंटी बजी। रिंगटोन राज फिल्म का बजा 'चींईईईईईईई, कौन है, कौन है...'. 'क्या आदमी हो यार फोन चाइना का और रिंगटोन राज का रखकर बताना क्या चाहते हो?'
 तबतक ऊपर से कुछ शर्ट पर गिर पड़ा, लगा कि छिपकली होगी पर वह छिपकली नहीं बल्कि कुछ और ही था। 'साला ये कत्ल करने वाले भी अजीब जगह का चयन करते हैं।' उस पुरानी हवेली से लाश लेकर हमलोग निकल रहे थे। तभी अचानक आंधी चलने लगी। पुरानी हवेली में खिङकी दरवाजे जाम हो चुके थे पर ऊपर में एक दरवाजा जोर से बजा। आवाज इतनी तेज थी कि सबकी नजर उधर  ही चली गई। फिर भी लाश उठाकर जाने लगे। अभी दस कदम चले होंगे कि एक कपड़ा उङकर मुंह पर आ चिपका। कपङा खून से सना था।
माजरा समझते देर नहीं लगी और हमलोग लाश को नीचे छोङकर ऊपर की ओर भागे। जाकर देखा तो छत की कङी में एक काले कलुटे लङके की लाश चिपकी हुई थी। बिल्कुल वैसे ही जैसे कि हाॅरर फिल्म में भूत चलता है, छत से सटकर। लाश को गौर से देखा तो पता चला कि कातिल ने लाश को कील मारकर चिपका दिया था। जैसे ही कुर्सी लगाकर लाश की ओर हाथ बढ़ा कि, बिजली इतनी जोर की कङकी कि मैं डर से लाश के हाथ को पकड़ा, कुर्सी पर संतुलन बिगड़ा और लाश का हाथ पकड़कर मैं फर्श पर गिर पड़ा और लाश पैर के बल लटक गई। उसकी खुली आंख व निकले जीभ ने डर पैदा कर दिया। पेंडुलम की तरह उसका हिलता शरीर, मानो हमें छूने की कोशिश कर रहा है। अभी कुछ करते कि तभी फिर से दरवाजा खटाक से बंद हो गया। अब पुरानी हवेली का कमरा अंधेरे में नहा रहा था।
 मैं मोबाइल की लाइट जलाने के लिए कहा। लाइट जलती इससे पहले लगा कि मुझे किसी ने छुआ और मेरे मुँह से चीख निकली और साथ में मेरा साथी भी चीख पङा। क्योंकि गलती से उसीका हाथ मुझे लगा था।
 मोबाइल की लाइट जली और उल्टी लटकी लाश पर नजर पङी, जिसके आंख कुछ ज्यादा ही चमक रहे थे। हम तीनों पीछे मुड़कर दरवाजे की ओर बढ़े और तेजी से नीचे उतर गए।
पर नीचे में माजरा किसी डरावने फिल्म से कम नहीं था क्योंकि लड़की की लाश गायब थी। माजरा कुछ समझ में नहीं आ रहा था। इतने साल के पुलिस करियर में पहली बार भूतिया फिलिंग हो रही थी। क्योंकि जो हो रहा था वह सिर्फ फिल्मों में ही होता है। पर यहां तो माहौल के साथ मौसम भी चमका रहा था हमें ।
लाश उठाने के लिए और पुलिस बल मंगवाना मतलब खुद की काबिलियत पर सवाल खड़ा करवाने के जैसा था। यह सब सोच रहा था कि कुछ लद से गिरने की आवाज सुनाई पङी। शायद टंगी हुई लाश गिर पड़ी थी! पर अब हिम्मत नहीं जुटा पाया ऊपर जाने के लिए।
इतना सब कैसे हो रहा है? कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा हूँ! तभी मैं सामने देखा कि वह उल्टी लटकी लाश अपने बांहों में लङकी की लाश को उठाकर हमारी ओर आ रहा है। उसके आंख, नाक और मुंह से खून टपक रहे हैं और वह हमारी ओर बढ़े जा रहा है। अब बस कुछ ही दूरी पर है। मैं वहां से भागा तेजी से और आकर जीप के पास रूक गया। मेरे पीछे दोनों साथी भी दौङे भागे चले आए।
 दोनों हांफते हुए बोले- क्या हुआ, क्यूं भागे वहां से? अरे! तुम दोनों ने उस भूत को...
सर- ऐसा कुछ नहीं दिखा. हमलोग तो ऐसा कुछ नहीं देखे वहां पर. मौसम तो डरावना हुआ है और ऊपर से आप भी डरा रहे हैं। सर, चलिए जल्दी चलिए लाश उठाते हैं, घर चलना नहीं है क्या!
तभी एक लपकते हाथ ने मुंह से चादर हटाया. चादर हटते ही लंबे-लंबे बिखरे हुए बाल गालों पर सोहरने लगे। आआआ.... की तेज आवाज के साथ, हांफते हुए मैं उठा। चेहरा  पसीना-पसीना हो गया था. 'क्या यार तुम भी ना, एक तो सपना से डरा मरा था ऊपर से तुम सुबह-सुबह ऐसे जगाई कि जान ही निकाल दी।'
'सिपाही जी इतना मत डरिए. जब देखो आॅन ड्यूटी रहते हैं'.


Rate this content
Log in

More hindi story from Ravi Ranveera