कर्ण युग बदलाव में विवश क्यों?
कर्ण युग बदलाव में विवश क्यों?
चाहे काली रात हो, या देदीप्यमान सूर्य से दमकता दिन। घनघोर जंगल में मूसलाधार बरसात जिसके बीच अनजान मंजिल का रास्ता घने कुहरे से पटा हुआ जिस पर पांच कदम आगे बढ़ाने पर भय से भरता मन कि कहीं गड्ढा या खाई न हो। आखिर क्यों डगमगाता मन?
कहते हैं कि मानव मन को अनन्त उर्जा प्राप्त है फिर भी क्षितिज के उस पार के कल्पनातीत नकारात्मक पक्ष को जेहन में क्यों उतारता है? कहते है, हृदय के हर स्पंदन में सच्चाई छिपी है क्योंकि यह ही एक ऐसा अंग है जिसके तार ईश्वर ने अपने से जोड़ रखा है जो साहस, अहसास वह विश्वास दिलाता है कि वह चारों ओर सदैव सुरक्षा कवच के रूप में विद्यमान है इतना ही नहीं, वह संभावित खतरे के बारे में सचेत भी करता है भले ही वह कितनी ही झीनी या आवाज़ धीमी हो। अनन्त शक्ति के पुंज स्वरूप आत्मा के पास इस वातावरण को बदलने की शक्ति तो होनी चाहिए, कुछ लोग निश्चित तौर पर कहते भी हैं। फिर ऐसी क्या विवशता है, इस संसार में अच्छे संकल्प इतने सक्रिय क्यों नहीं हैं जिससे संसार में दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ रहे बुरे विकल्पों की रफ्तार में ब्रेक लगाया जा सके ?
कुछ तो बात अवश्य है।
आज लगभग हर घर अभिशापित है, प्रत्येक जगह पर्याप्त वरदानों से लैस "कर्ण" हैं फिर भी बुरी नियति वाला "शकुनि" ही सफल क्यों? शायद वह मानवीय, मानसिक और नियति प्रदत्त सीमाओं या कमजोरियों को अपनी शक्ति बना लेता है। हमें लगता है कि अगर व्यवस्था में वह बदलाव चाहता है तो उसे इन सीमाओं की जंजीरों को तोडना चाहिए और इससे शक्ति बनाकर सुअवसर ढूंढना चाहिए । और स्वतंत्र होकर अपने खुले विचारों की दुनियां में जीना चाहिए।
निश्चित रूप से शकुनि हर व्यक्ति में छिपे "हर कर्ण" की भूत, वर्तमान और भविष्य की जीवन कुंडली को भलीभांति जानता है। और उसके मानसिक विकार युक्त बुद्धि, अहं या अंध भक्ति की सामाजिक मान्यताओं और प्रवंचनाओं की सीमाओं से जकड़न को अपनी शक्ति बनाता है और विश्व में फैले तमाम महाभारतों में विषवमन कर पूरी सृष्टि को आग में झोंक कर राख कर देना चाहता है। हम सब यह भलीभांति जानते भी हैं और सभी नकारात्मक क्रियाकलापों से उबरना भी जानते है। बस थोड़ा अकेले में खुली हवा में सांस लेकर उचछवास होना है। कहते हैं कि व्यक्ति वीरान में विचरण कर अकेले में सोचता है तो उसका दिमाग चार व्यक्तियों के बराबर प्रबलता से चलता है , जब कभी वह इस प्रक्रिया में किसी एक को, चाहे वह अंतरगी ही क्यों न हो, संगी बना लेता है तो उसके सहारे से अपनी मानसिक शक्ति को क्षीण कर तीन व्यक्ति के बराबर कर लेता है। इस लगातार चलती प्रक्रिया में जैसे और व्यक्ति जोड़ता जाता है तो अपना बुद्धि, विवेक शनै शनै क्षीण कर देता है और खुद शून्य शक्ति हो जाता है।
उसे अपने में छिपी 'मैं ' से संघर्ष और कमजोरियों के क्षितिज से पार जाकर सोचना होगा। पर 'मैं ' यानी अहं से संघर्ष कर विजय प्राप्त करना असंभव सा है। इसके लिए नित्य परमशक्ति वान परमपिता परमात्मा से अंतर्रात्मा से पूरे मनोयोग से अनुग्रह करना होगा क्योंकि ईश्वर और" मैं" अर्थात "अहं" दोनों पक्ष एक दूज्ञरे के धुर विरोधी हैं। कहने का अर्थ यह है कि 'अह' पर विजय दिलाने वाला यही एक रास्ता है, अन्य कोई विकल्प नहीं। कहावत है
"जब मैं था, तब हरि नहीं; अब हरि हैं हम नाहि।
सब अंधियारा मिट गया, दीपक लेग्या माहिं। ।
दीपक तो ज्ञान का प्रतीक है वह सीधे व्यक्ति को ज्ञानयोग से जोड़ देता है। इस पर चलना कृपाण की धार पर चलने के समान है, अर्थात मुश्किलें बहुत हैं। इस हेतु अपने अन्दर छिपे 'कर्ण' को कृष्ण से और "राधेय"को "राधा" से जोड़ना होगा। इस संदर्भ में यहां यह कहना समुचित लगता है कि' अर् 'को शब्द ' क' से और उसके बाद 'ष्' को समाहित करना होगा। । 'अर्' शब्द अहम और जकड़ी बेड़ियों का प्रतीक है। उसे 'शब्द 'क' अर्थात कर्मयोग के पैर तले दबाना होगा और शब्द 'ष' अर्थात षटविकार को काट बचे शब्द 'ष्' को कृष्ण में समाहित करना होगा। और 'राधेय' शब्द से शब्द "य" को हटाकर अनासक्त और अनाकर्ष भगवद्भक्ति के द्वारा उत्कर्ष उदाहरण प्रस्तुत कर अमर प्रेम का खिताब पाना है। महाभारत का पात्र "कर्ण" जब भी "कृष्ण" अर्थात ईश्वर से वार्तालाप करता है तो इन सभी को समावेश कर बात करता है। जिससे उसके व्यक्तित्व में "शकुनित्व" आ जाता है और मित्र दुर्योधन के अंध मित्र भक्ति के जंजीरों में जकड़ जाता है, इसका हश्र क्या हुआ किसी से क्या छिपा है?
कृष्ण बार बार उसे आगाह करते हैं कि मुझमें समाहित हो जाओ और अपने अस्तित्व, व्यक्तित्व और विरासत को समझो और उससे शक्ति अर्जित करो। पर वह कुछ नहीं करता, और ऐसे ही अनंत में विलीन हो जाता है।
इस संदर्भ में वर्तमान में यह सोचने को मजबूर हो गये हैं कि हमारे अंदर का 'कर्ण" चौराहे पर क्यों खड़ा है? माना कि अव्यवस्थाओं का काला साम्राज्य है पर इससे निजात पाने की क्षमता भी उसमें निहित है। जब धारण करने के आधार में ग्लानि आता है तब उसके उत्थान के लिए ताकत लगाने की जुनून अनपेक्षित तौर से सिर चढ़ जाता है। युग के आवश्यकता के अनुसार वह मत्स्यावतार, कूर्मावतार, वाराहावतार, नृसिंह अवतार वामनावतार, राम , कृष्ण और बुद्ध का रुप लेता है। कभी वह कबीर के रूप में बेबाक बात भी करता है।
आवश्यकता है कुछ हटकर सोचने की? इसके लिए कभी ईशु की भांति सलीब पर चढ़ना पड़े तो उद्यत रहना चाहिए। और रश्मिरथी बन समाज में अतुल उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। अकेले चलना पड़े तो भी भय नहीं खाना चाहिए। माना कि अकेला भाड़ नहीं फोड़ सकता पर असर जरूर डालता है। बुजदिल होकर क्या जीना? आपको किसी से तुलना नहीं करनी, न ही समान व्यक्तित्व का बनना। बदलाव के लिए नयेपन के व्यक्तित्व के समावेश में तुम्हारा नाम ही काफी है। कुछ सोचकर या करके देखो तो सही!
