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anita gupta

Others

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किस्मत भी बदलती है

किस्मत भी बदलती है

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"मेरी तो किस्मत ही काली स्याही से लिखी गई है। जिंदगी भर बर्तन ही घिसते रहो बस।" 58 वर्षीय जमुना काकी बर्तन साफ करते हुए बड़बड़ा रहीं थी।

"अरे! आज सुबह-सुबह ही टेप रिकॉर्डर चालू कर दिया और वो भी पुराना कैसेट लगाकर।" रामलाल काका जमुना काकी के पतिदेव काकी को छेड़ते हुए बोले।

"आप तो चुप ही रहो।" काकी ने काका को झिड़का।

"ऐसा क्या हो गया जो गुस्सा तुम्हारी नाक पर ही रखा है।" काका ने काकी से फिर चुहल की।

"ऐसा क्या हो गया? सब किया धरा तो आपका ही है और अब भोले बन रहे हो।" काकी ने गुस्से से कहा।

"क्यों पहेलियां बुझा रही हो? सीधे से क्यों नहीं बतातीं कि आखिर मैंने क्या कर दिया?" काका बोले।

"जब तुमको पता है कि मेरी तबियत थोड़ी गड़बड़ है, तब भी तुमने बेटे-बहू को घूमने के लिए भेज दिया। हमारी भी तो शादी हुई थी, हम गए थे क्या कहीं घूमने?" काकी गुस्से से बोलीं।


"ओहो! तो ये बात है। श्रीमती जी को पुराने गिला शिकवा हैं।" काका ने काकी को और छेड़ा।

"अरे! मैं क्या करूंगी गिले शिकवे। मेरी तो किस्मत ही काली स्याही से लिखी गई है।" काकी ने कहा।

मेरी तो किस्मत ही काली स्याही से लिखी गई है।काकी का तकिया कलाम है, जिसे वे हर कहीं फिट कर देती हैं।

काकी अपने मायके में आठ भाई-बहनों में सबसे बड़ी थी। जाहिर सी बात है, बड़े होने के कारण जिम्मेदारी भी थी। घर के कामों में मां की मदद करने में सबसे पहले बर्तन और झाडू ही उनके पल्ले पड़ी। सबसे बड़े होने के कारण हर चीज़ का त्याग भी उनको ही करना पड़ता।

18 साल की उम्र में शादी होकर आंखों में सपने सजाए ससुराल आ गईं। लेकिन सासू मां कुछ ज्यादा ही अनुशासन प्रिय थीं।

सुबह 4 बजे उठकर घर बुहारना, नहाना और पूजा करना फिर आटा पीसना। ये सब करते-करते 6.30 हो जाते और घर के सदस्य उठने लगते और जमुना पहुंच जाती रसोई में सबके लिए चाय बनाने।

घर की सबसे बड़ी बहू और चार ननदों और दो देवर की भाभी जमुना का पूरा दिन रसोई में निकल जाता। घड़ी भर सुस्ताने का टाइम भी ना मिलता। ऊपर से सासू मां की डांट और सुनने को मिलती। घर के बाहर तो कदम रख ही नहीं सकते थे और पतिदेव के साथ जाने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता। क्योंकि भले घर की बहू-बेटी पति के साथ कहीं नहीं जाती हैं।

शादी का एक साल होते-होते एक बेटी की मां बन गई जमुना। अब तो काम और भी बड़ गया।


शादी के पांच साल में एक बेटा भी गोद में आ गया। इधर ननदों की शादियां होती गई। जब देवर की शादी हुई तब जाकर जमुना को कुछ आराम मिला।

समय के साथ सब बदलता गया। छोटे से कस्बे में रहने वाला सासू मां का परिवार शहर में शिफ्ट हो गया। कस्बे के घर में रामलाल का परिवार और सासू मां रह गए। रामलाल और जमुना मुहल्ले के काका-काकी हो गए। बेटी की शादी हो गई और बेटा शहर में नौकरी करने लगा। सासू मां दिवंगत हो गईं। ससुर जी तो काका के बचपन में ही चले गए थे।

सब कुछ बदल गया था लेकिन नहीं बदली थी तो काकी की जिंदगी। काम तो कम हो गया था लेकिन उम्र के साथ काकी शारारिक रूप से कमजोर हो गई थी इसलिए थोड़ा सा भी काम बहुत लगता। मदद के लिए कोई काम वाली सहायिका रखना उनको पसंद नहीं था।

बस खुद ही खटती रहतीं और बड़बड़ करती रहतीं। अभी 2 हफ्ते पहले ही बेटे की शादी की तो कुछ बहू से उम्मीद थी काकी को मदद की। लेकिन काका ने उनको चार दिन पहले हनीमून पर भेज दिया। बस इसी बात से काकी नाराज थीं।

नाराज तो क्या उनकी एक हसरत थी ट्रेन में बैठने की, जो अभी तक पूरी नहीं हुई थी और बहू बेटा हवाई जहाज से गए थे। ये ही बात चुभ रही थी उनको ।

एक हफ्ते बाद बहू बेटे काकी के लिए एक सरप्राईज लिए वापस आ गए।

"मां! ये देखो। आपकी बहू आपके लिए क्या लाई है?" बेटे ने बड़े उत्साह के साथ कहा।


"अरे! इस उम्र में अब कोई मैं सलवार सूट पहनूंगी क्या?" काकी दिखावटी गुस्से से बोलीं।

"हां मां! पहनोगी भी और पिताजी के साथ शिमला घूमने भी जाओगी। वो भी हवाई जहाज में बैठकर।" बहू ने कहा।

"क्या!" काकी की आंखे आश्चर्य से फटी रह गईं।

"हां। शिमला जाकर आपकी सभी दबी हुई इच्छाएं पूरी हो जाएगी। आप ट्रेन में भी बैठोगी और हवाई जहाज में भी। साथ ही पिताजी के साथ कहीं घूमने जाने की इच्छा भी पूरी हो जाएगी।" बेटा बोला।

"ये तो जो मैंने सोचा था उस से भी ज्यादा पूरा हो रहा है। मेरी किस्मत मुझे आसमान में भी उड़ाएगी..." काकी की बात काटते हुए काका हंसते हुए बोले, "कि जिंदगी भर बर्तन ही मंजवाएगी।" 

"रहने दो। ये सब आपके बस का नहीं था। ये सब कमाल तो मेरी बहू का है। मेरी किस्मत तो मेरी प्यारी बहू ने बदली है।" कहते हुए काकी ने बहू को गले से लगा लिया।



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