दो पंछी दो तिनके लेकर चले हैं
दो पंछी दो तिनके लेकर चले हैं
" जल्दी करो । मां अभी घूमकर आती होंगी। अगर उन्होंने अपने जान से भी प्यारे रेडियो को इस तरह से जमीन पर रखे देखा तो गुस्सा हो जायेंगी। " रोहित ने मां के कमरे की सफाई करती अपनी पत्नी प्रिया से कहा।
" बस हो गया रोहित । अभी दो मिनट में उठा कर ..." प्रिया की बात अभी पूरी भी नहीं हो पाई थी कि शांति देवी ने कमरे में प्रवेश किया और ...
" ये क्या ! तुमने मेरा रेडियो जमीन पर क्यों रख दिया है ? शांति देवी ने पूछा और रेडियो को अपनी गोद में उठा लिया।
" मम्मी जी ! आपकी अलमारी की सफाई कर रही थी, इसीलिए थोड़ी देर के लिए इसे नीचे रख दिया था।" प्रिया ने कहा।
" दादी ! ऐसा क्या है, इस रेडियो में जो आप इसे इतना संभाल कर रखते हो ? अब तो ये चलता भी नहीं है।" पोते राहुल ने पूछा।
" चलो ! आज तुम सबको नाश्ता करते हुए इस रेडियो की कहानी सुनाती हूं। सब लोग डाइनिंग रूम में आ जाओ । रोहन ! तुम भी आ जाओ ।" शांति देवी ने अपने दूसरे पोते को आवाज लगाते हुए कहा।
" हां दादी बताइए ।" दोनों पोते एक साथ बोले।
" ये रेडियो तुम्हारे दादाजी की निशानी है। इससे हमारे कई खट्टे - मीठे किस्से जुड़े हुए हैं। इसीलिए ये मुझे बहुत प्यारा है।" शांति देवी ने कहा।
" हमसे भी ज्यादा प्यारा है क्या , दादी ? " राहुल और रोहन ने पूछा।
" तुम दोनों मुझे बेकार के सवालों में ना उलझाओ और चुप होकर मुझे सुनो और बीच में कोई नहीं बोलेगा ।" शांति देवी ने कहना शुरू किया।
" मुझे बचपन से ही गाने सुनने और घूमने - फिरने का शौक था। लेकिन मेरे बाबूजी बहुत सख्त थे और इस सब चीज़ों को फालतू लोगों का काम समझते थे।
ये सब इच्छा लेकर मैं बड़ी हो गई और मेरी शादी के लिए लड़के देखें जानें लगे। मुझे बाबूजी ने अच्छे से समझा दिया था कि जब भी कोई देखने आए और तुमसे तुम्हारे शौक पूछे तो बताना कि साहित्य पढ़ने का शौक है।
जब तुम्हारे दादाजी ने मुझे पसंद कर लिया और मेरी गोद भराई के लिए जब पूरा परिवार आया तब अपनी बहन के माध्यम से पूछा कि मुझे क्या गिफ्ट चाहिए ?
और मैंने फौरन कह दि्या कि रेडियो चाहिए।
और तुम्हारे दादाजी ने शादी की पहली रात को मुझे रेडियो गिफ्ट में दिया। जिसे देखकर मेरी खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। उसी रात बातों - बातों में मैंने ये भी बता दिया कि मुझे नई - नई जगह पर जाना भी बहुत अच्छा लगता है। यहीं से मेरी बचपन की दोनों इच्छाएं पूरी होने लगी।
तुम्हारे दादाजी की नौकरी दूसरे शहर में थी। तीन चार दिन बाद हम अपनी गृहस्थी बसाने के लिए उस शहर के लिए निकल गए। उस समय तुम्हारे दादाजी के पास फिएट कार थी। हमने खाने पीने का सामान डिक्की में रखा और रेडियो, सूटकेस और बेडिंग ऊपर रख दिए।
हम कार में आकर बैठ गए और ये " दो पंछी दो तिनके लेकर चले हैं कहां " गाना गुनगुनाते हुए कार चलाने लगे।
शाम तक हम लोग अपने आशियाने में पहुंच गए। सबसे पहले इन्होंने रेडियो सेट किया । उस दिन उस समय बिनाका आ रही थी। इन्होंने बिनाका लगाकर मुझे सुनने बैठा दिया और खुद खाना परोसने लगे।
मैंने पहली बार बिनाका सुनी थी। अमीन सयानी का बिनाका प्रेजेंट करने का स्टाइल इतना अच्छा लगता था कि उस दिन के बाद से मैंने कभी बिनाका सुनना मिस नहीं किया। तुम्हारे दादाजी से मेरी शर्त लगती थी कि आज कौन सा गाना कौन से पायदान पर आयेगा और तुम्हारे दादाजी हमेशा मुझ से हार जाते।
ये अक्सर टूर पर रहते थे और मुझे भी साथ ले जाते थे। जिससे काम और घूमना दोनों हो सके। मैंने अपने साथ रेडियो जरूर ले जाती थी। जिससे मेरा पसंदीदा प्रोग्राम बिनाका ना छूट जाए।
रोहित और तुम्हारी बुआ के स्कूल शुरू होने के बाद से मेरा घूमना तो बहुत कम हो गया लेकिन रेडियो प्रेम वैसा ही बरकरार रहा।
आज जब तुम्हारे दादाजी नहीं रहे तो ये रेडियो उनकी निशानी के रूप में और भी अज़ीज़ हो गया है।" कहते - कहते शांति देवी की आंखे नम हो गई।
गमगीन वातावरण होते देख राहुल बोला,
" अरे वाह ! दादी । आप तो बड़ी फिल्मी और रोमांटिक निकलीं। हम तो आपको सीधा साधा समझते थे।"
राहुल की बात सुन सब हंसने लगे और दादी झेंपते हुए मुस्करा दीं।
