Girijesh Singh

Others


3.8  

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खुद को खोज लो

खुद को खोज लो

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बात दस दिन पहले की ही है जब मुझे अहसास हुआ कि मैं आज एक नये जीवन में प्रवेश कर गया। हां, नया जीवन ही तो हुआ जब यह अहसास हुआ की जो जीवन जी रहे थे वह नींद मे जी रहे थे। और नींद में तो व्यक्ति जो देखता है, जो समझता है वह सपना होता है। मतलब जीवन के चालिस साल सपने मे बीत गये और पता भी न चला।सपने जो बचपन में देखे थे, मन में बसे रह गये थे और जीवन के उहापोह में समय बीतता जा रहा था कोई लगाम न थी, कोई आभास न था क्या किए जा रहे है। बस सबके साथ सबके पीछे विकास की दौड़ मे शामिल खुद को सही, काबिल और सफल बनाने की होड में जीवन खपाए जा रहे थे, कि यकायक अहसास हुआ कि अंदर कोई है जो सो रहा है।बहुत दिनो से बडी गहरी नीद सो गया है और सोये मे एक सपना देख रहा है, एक ऐसे जीवन का सपना जो कभी मिल न पाऐगा इस भागदौड के जीवन में।

एक गहरी शांति की तलाश थी उस सपने मे, एक परम संतोष का तलाश था।मानो घनघोर गहरे जंगल में एक विशाल वृक्ष के नीचे बुद्ध की तरह आसन लगाए ज्ञान पाने की तलाश में शांतचित एकांत में मौन साधे ध्यान में बैठे हो।सब तरफ प्रकृति ही प्रकृति हो कुछ भी कृत्रिम न हो।कलकल बहती नदी की आवाज, जंगल में चहकते पंछी और हवाओ की मंद बहती पत्तों से टकराती आवाज सब कुछ शांत और निर्मल होने का अहसास कराती गई ।

फिर सामने स्वर्ग दिखा और वहां राधा कृष्ण खडे मिले एक दुसरे के साथ आनंद मे डूबे हुए। मुझे देखते ही राधा कृष्ण से बोल पडी पहचाना इसे कौन है यह।

खुद की पहचान उनसे सुनने को बेताब खडा मैं खुद विचारने लगा कि शायद वो बोलेंगी यह एक पुरूष है जो धरती पर अमूक स्थान पर रहता था।

 फिर भान आया उसी सपने में कि स्वर्ग तो सशरीर जा नही सकते शायद राधा जी को जो दिखा वो मेरी आत्मा होगी।तभी अहसास हुआ कि फिर वो पुरूष हूं कि स्त्री यह कहां जान पाऐंगी क्योंकि आत्मामें तो लिंगभेद सुना नहीं मैने आत्मा तो सबकी एक होती है न पुरूष न स्त्री ।न उसकी जाति होती है न कोई और भेद।

फिर वो पहचानेंगी कैसे। शायद मेरे आत्मिय भावों से।तब उसी क्षण मैं अपने अंतःस्थल में बसे भावों को खोजने लगा।कौन हूं मैं क्या भाव हैं मेरे? यह तलाश शुरू होते ही सपना टूटने लगा।पहले लगा भावों से मै पुरूष हूं।फिर लगा कि अंतःकरण में तो सदैव एक स्त्री की लालसा समाई रही ।और स्त्री भी कैसी राधा सरस रसीली ऐसी स्त्री जो इतना प्रेम करे मुझे जितना राधा करती थी कृष्ण से।

प्रेम पाने का यह भाव अंदर से बाहर आया पर साथ में यह भय कि क्या राधा जी स्वयं इसे जान पाऐंगी कि मेरे मन में उनके जैसी ही एक स्त्री बसती है जिससे मैं मिलना चाहता रहा जीवनभर।वह स्त्री कौन थी? क्या वह मेरे मन में थी या मेरी आत्मा थी वह।अहसास हुआ कि जीवन भर बेहोश रहे हम उस प्यार को पाने के लिए जो निस्वार्थ और निश्छल हो।पर मिला नहीं कारण जानने कि कोशिश की तो पता चला हम क्या खोज रहे थे हमें पता ही न था।

सफलता तरक्की और विकास के दौड में खुद के अंदर देखने का मौका न मिला था।आज सपने में देखा तो पाया स्वयं राधा को पाने नहीं नही राधा के प्रेम की प्यास में मेरी आत्मा व्याकुल थी।

पर तभी बगल में खडे श्रीकृष्ण पर नजर गई। गइया कि पीठ का सहारा लिए खडे मुरलीधर एक हाथ में बांसुरी और दुसरा हाथ राधा जी के कंधे पर डाले मंद मंद मुस्कुरा रहे थे।उनकी मुस्कान मुझे अंदर तक हिला गई लगा सब कुछ बदल गया।मेरी तलाश राधा को पाने की नही नही राधा के प्रेम को पाने की खतम हो गई।

 राधा तो मेरी ही थी, उनके प्रेम पर तो बस मेरा ही अधिकार था वो बस मेरी ही थी। उस कृष्ण में मै दिख रहा था। मुझमें राधा दिख रही थी।

सपना टूट चुका था, मैं जाग गया था। चालिस साल से सोया मेरा अंतःकरण अब चीर नींद्रा से बाहर आ गया था।मुझे मेरे अस्तित्व का एक हल्का भान हुआ था।उस स्वर्गीय आनंद ने जीवन को उमंग से भर दिया।एक पुरूष होने के बावजूद खुद में स्त्री को पाकर मैं अति प्रसन्न था। 

बस यही सोच रहा था, खुद के अंदर एक कोमल हृदया स्त्री के होने का अहसास इतना आनंदमय है तो वास्तव में स्त्री होना कितना आनन्द मय होगा सोचने वाली बात हैं।जिस स्त्री से भगवान् स्वयं प्रेम रखते हों उन स्त्रीयों में भगवान तलाशना उनके प्रेमपात्र बनने भर से ही सम्भव हो जाता है।

धन्य हो धरती की वो प्रेम स्रोत जिन्होने हर रूप में पुरूष को प्रेम पाने को प्रेरित किया। क्योंकि प्रेम ही आनंद सच्चे भाव लाता है ।और आनंदित पुरूष ही पुरुषत्व का घोतक होता है।

                   


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