कौन सा है बेटी का घर
कौन सा है बेटी का घर
कितनी अजीब सी परम्परा है कि बेटी के अठारह साल पूरे होते ही उस घर में, जहाँ उसका जन्म हुआ जहाँ वह बडे़ नाजो से पली मां को नखरे और पिता को प्यार दिखाया । दादी की सेवा की और बाबा की उँगली पकड़कर चली। जब तक बह नन्ही सी कली थी तो मां की लाड़ली पापा की परी थी। अजीब सी कहानी है, इस परी की कि फूल बनते ही परी परायी ह हो गई। अब मां की आंखों में नींद नहीं, पिता को चैन नहीं ।कहाँ जाएं किससे पूछे क्या करें कौन सा है मेरी बेटी का घर। आखिर एक दिन आ ही जाता उस दरवाजे पर और कहता यही होगा मेरी बेटी का घर ।
बडे़ अरमानों के साथ पिता ने अपनी बेटी को गर्व के साथ अपनी कमाई पूंजी के साथ अग्नि के साथ सात फेरे दिलवाकर सामाजिक रीति रिवाजों के साथ उस डोली रूपी तराजू पर बिठाकर उस घर में भेज दिया। जहाँ उसे हर रोज तुलना था, कभी धर्म के पलडे़ पर तो कभी करम के पलडे़ पर। अब उसकी सुबह उसकी शाम उसकी नींद उसका चैन उसकी खुशी उसके आंसू अब सब कुछ समर्पित हैं उन पलड़ों को बराबर करने में।
कभी भागती इस पलड़े पर, तो कभी भागती उस पलड़े पर, भागते-भागते थक गई पर तराजू के पलडे़ कभी बराबर नहीं हुए। अब हताश और निराश होकर लेट गई, तो आवाज आती है कि हमारे घर में हो तो पड़ी हो वरना निकाल कर फेंक दी जातींं । यह सुनकर असहाय होकर उस घर के आंगन में सिमट जाती है. जिस घर में पिता ने बडे़ गर्व के साथ डोली रूपी तराजू पर बिठालकर विदा किया था। आखिर नहीं समझ पाई वह कि कौन सा है मेरा घर, वह पिता का था और यह पति का।
