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घाट

घाट

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‘मुझे प्यास लगी है मेरे चारों ओर नमकीन पानी है और मैं मीठे पानी का सोता ढूंढ़ रही हूँ.....असह्य बेचैनी से....’

‘मैं कहीं जा रही हूँ अकेली ...मेरी अटैची और एयरबैग तैयार पड़े हैं...मैं अपना कुछ जरूरी सामान ढूंढ़ रही हूँ....’

‘मैं किसी पहाड़ पर चढ़ रही हूँ, अपने दोनों हाथों की सहायता से बड़ी आसानी से....जैसे कोई हवा मुझे ऊपर लिये जा रही है। मैं अपना ऊपर चढ़ना देखती हूँ....लगातार चढ़ना ...कहीं कोई अंत नहीं है....’

टुकड़े –टुकड़े स्वप्न ....दिनों ...हफ़्तों के अंतराल में...फिर एक दिन मैंने देखा...एक सुन्दर नारी आकृति ...सिर ज़रा सा ऊपर उठा हुआ...एकदम सीधी खडी एक घुटना ज़रा सा आगे की ओर मुड़ा है...उसी पैर का पंजा जमीन को छूता हुआ...सारा बोझ दूसरे पैर पर लिए...मैं नहीं जानती कैसे, पर मुझे लगा, वह मैं थी।

वानगाग थक गया है, अपने भाई थियो से कहता है... ‘थियो, मैं मरना चाहता हूँ।’

वानगाग की यात्रा मेरी यात्रा नहीं है पर वानगाग का दुःख मेरा दुःख है...अपने असीमित न हो पाने का दुःख, खुद को सम्पूर्णतया अभिव्यक्त न कर पाने का दुःख...बचे रह जाने का दुःख...या शायद दुःख भी उतना नहीं...एक गहरी खराश...भीतर की दीवारों पर महसूस होती हुई।

तमाम जगहों पर लगी गांठे मैंने काफ़ी पहले खोलनी शुरू कर दी हैं। मैंने इतनी जगहों पर अपने पैरों के निशान छोड़ दिये थे कि अब पछता रही थी... जीवन में हम जिन्हें मुश्किल काम समझते हैं, मसलन...खुद को जगह-जगह फैला लेना या अपने काम के बीज इस तरह उछालना कि वे खेतों की मिटटी में मिलकर पौधों की शक्ल में उभर आयें, यह सब आसान है। मुश्किल है संसार के ब्लैकबोर्ड से अपना नाम मिटाना और सफ़ेद में सफ़ेद होकर मिलना....

मैं नहीं जानती क्यों पर मुझे हमेशा लगा है, मुझसे श्रेयस छुड़वाकर प्रेयस में डाल दिया गया है और अब मैं यहाँ से भागने की तरकीबें ढूंढ़ रही हूँ।

नींद खुल गयी है...मैं दिये गये और बचे हुए समय का हिसाब लगाती हूँ....समय जैसे धुआं हो...मेरी मुट्ठी सरीखी देह के भीतर भी...बाहर भी....घड़ी देखी....चार बज रहे हैं...उठकर खिड़की तक आती हूँ...भोर का तारा आसमान से लुप्त नहीं हुआ है...तारों का गुच्छा आसमान के कोने में छितरा हुआ...मैं चुपचाप उसे देखती हूँ...

मैं उन लोगों के बारे में सोचती हूँ जो नहीं रहे। निर्मल वर्मा नहीं रहे, अमृता प्रीतम नहीं...सद्दाम हुसैन नहीं रहे...जे. कृष्णमूर्ति ख़ामोशी से बोलते रहे ...ख़ामोशी से चले गए...उनके इर्द-गिर्द के लोग शोर मचाते रह गए...योजनाएं बनाते। और तो और सदी का आखिरी वंडर...रजनीश भी नहीं रहे। मां-पिताजी मेरी बहनें....वे किस लोक में होंगे? क्या वे मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे? क्या उन्हें पता होगा, मेरा समय निकट आ गया है? सिर्फ़ उन्हें ही क्यों?जब भी कोई फूल खिलता या मुरझाता है तो क्या यह सिर्फ़ एक पौधे की बात होती है? जंगल भी उसी उत्सव या पीड़ा से नहीं गुज़रता? रक्त सम्बन्ध ही तो वास्तविक सम्बन्ध नहीं...कुछ और भी तो है...जन्म-जन्मान्तरों के सम्बन्ध...मैंने पतंग आसमान में छोड़ दी है...चरखी घूम रही है...हवाओं ने उस पतंग की उड़ान संभाल ली है और वे उसे अपने पंखों पर उड़ा ले जाने को तैयार हैं...

मैं वापस बिस्तर तक आई हूँ.... छत धुंधली होते-होते अदृश्य हो गयी है ...मेरी आँखें शायद अन्दर मुड़ गयी हैं...कोई चीज़ जैसे एक जगह इकट्ठी हो रही है। मुझे अपने होश कायम रखने हैं। हाथ-पैरों से चेतना सिकुड़ती हुई...भ्रूमध्य की तरफ़ आ रही है...बुझने से पहले अचानक लपट तेज हो गई है....मूर्तिमान समय विषम, विरुद्ध गति में अपने आपको परसानीफाई करता हुआ, तेजी से आकृति दर आकृति भागता चला जा रहा है....समय खुद चेतना हो गया है... अपने-आपको ढालता हुआ..... तेजी से गुज़रते लोग, शहर, स्टेशन, रेलगाड़ियाँ, पहाड़, बर्फ़ न जाने कहाँ से आते कहाँ विलीन होते। तेजी से भागती परछाइयों में से कुछ की गति धीमी हो गयी है....ठहरने लगा है समय का पानी...धीमे-धीमे और धीमे.... एक लड़की तेजी से लाइब्रेरी की सीढ़ियाँ चढ़ती हुई...इधर –उधर फैले तमाम लड़के-लड़कियों की भीड़ को अनदेखा करती पहुंची एक टेबिल पर...एक धुंधली सी सफ़ेद शर्ट....किताब के पन्ने पलटता एक हाथ...कुर्सी खिसकने की तेज आवाज़...सफ़ेद शर्ट हवा में हिलती हुई....टेबिल पर चार हाथ....एक-दूसरे में गुंथे हुए...कसकर एक–दूसरे को थामने की कोशिश में छूटते....छूट जाते....बादलों की गड़गड़ाहट...तेज बारिश....पानी कालेज के कैम्पस में घुस आया है....पार्किंग में आधी डूबी गाड़ियाँ...लाइब्रेरी में ठण्ड से कांपती एक देह...अनछुई किताब अलमारी की सबसे ऊँची शेल्फ़ पर टंगी...पानी नहीं रुकता ....लाइब्रेरी की किताबें खारे पानी में तैरती हुई...मैं दृष्टा की तरह देख रही हूँ सब....पानी में तैरता एक स्टेशन....पानी में तैरती एक रेलगाड़ी...पानी के जहाज की तरह....कोई उतरता है...पानी पर चलते हुए नज़दीक आता है, हाथ पकड़कर चलने लगता है...आसान है पानी पर चलना ....पानी में हिलता-डुलता चेहरा नहीं दिख रहा....सिर्फ़ हाथ।

दिये की लपट तेज है....एक क्षण के लिये मैंने चारों तरफ़ देखा...मेरे चारों तरफ़ वही चेहरे....पहले तेज फिर क्रमशः धुंधलाते ....धुंधली पृष्ठभूमि पर धुंधले चेहरे....उनकी आवाज़ मुझ तक नहीं पहुँच रही...न ही उनका स्पर्श...मेरी आँखें बंद हो गयीं।

एक पतली स्पष्ट पारदर्शी रौशनी ....रौशनी के सफ़ेद पुंज में परिवर्तित होती....एक शीतल अग्निपुंज....यही तो हूँ मैं.....

बातें करने और सिसकने की आवाजें....मेरी चेतना कुछ पकड़ नहीं रही....फिसल रही है...जंगलों में तेज चलती हवाएं...चिड़ियों का शोर...दूर-सुदूर चलते हुए चार पैर...एक हल्का सा मोड़ और चारों पैर गायब।

‘खत्म हो गया सब....’सिसकी में डूबी एक आवाज़।

मैं उसको देखती रही, खुद को भारहीन अनुभव करते हुए. घोंसला था यह मेरा ही। मैं मुस्करा दी। देखा मैंने....मुंह और आँखें अधखुली सी ...बूढ़ी-नाज़ुक झुर्रियों से अटी देह...निःसत्व...मुरझाई...यह मैं हूँ....अभिमान था मुझे इस पर बहुत। इसे छोड़ा नहीं कि लम्हे भर में कैसी हो गयी? वहां से हटने का मन न हुआ....मैं अपनी देह के नज़दीक खड़ी हूँ।

वे दोनों पिछले क्षण से मेरे साथ हैं...लम्बी-काली-सफ़ेद दाढ़ी, लम्बे-काले-सफ़ेद बाल, दुबला-पतला शरीर, शरीर पर वार्डरोब और स्नेहिल आँखों से मुझे देखती वह स्त्री....मां।

मेरी देह पर झुके रोते हुए रक्त सम्बन्धी मुझे मृत मान रहे हैं....मुझे उन्हें चुप कराने का ख्याल आया तो उन्होंने मुझे रोक दिया..उन्हें अपना काम करने दो।

अंतिम क्रिया हो रही है, हम देख रहे हैं...लकड़ियों के बीच लकड़ी सा रखा जिस्म। जिससे जो-जो लिया...वापस उसी को। लकड़ियों और जिस्म के जलने की गंध। बेटे की हिचकियाँ। एक कोहरा सा समूचे परिद्रश्य पर....

पाठ चल रहा है....मुझे प्यास लगी है....पानी कहीं दिखाई नहीं दे रहा...जंगल में जाते हुए चार पैर...चिड़ियों का नामालूम सा शोर...फिर ख़ामोशी..

‘उठो...यह मृत्यु जो तुम पर घटित हुई है...यह तुम्हारे ही आनंद के लिये है। ज्योतिर्मय...उद्दीप्त जीवन के लिये है, मुक्ति के लिये है।’

इस आवाज़ को सुनते हुए और गहरी धुंध में गिरती जा रही हूँ...और उस धुंध के भीतर मेरे ही अपने जीवन के कर्म क्षय होने के निमित्त मुझे घेरे चले जा रहे हैं...भोगना तो पड़ेगा। जो भी हमने धारण किया है...वही हम देखते और जीते चले जाते हैं...हमीं हटते हैं अपने से...हमीं जुड़ते हैं अपने से। चारों ओर अचानक सन्नाटा छा गया है। कहीं किसी भी तरह की सुरक्षा नहीं है। अंतर्विरोध....एक ऐसा गहरा अंतर्विरोध ....जिसे मैंने आज तक नहीं भोगा...मेरी घबराहट बढ़ती जा रही है। अगला क्षण क्या होगा? इसकी कल्पना मात्र से मैं सिहर उठी हूँ...उसी क्षण कोई बहुत गहरी, धीमी, भरी- भरी आवाज़ में बोलता जा रहा है ......

‘ओ! मार्ग प्रशस्त करने वाले अद्रश्य सनातन पूर्ण पुरुष...दिव्य शक्ति संपन्न चेतन प्रकृति जो यहाँ हो और चारों तरफ़ हो...अनजाने मार्ग के समस्त बन्धु जो अभी हो, जो पहले भी थे और जो बाद में भी रहोगे। पूर्व के समस्त गुरुओं, ईश्वरत्व की की श्रेणी में पहुंचे हुए सभी तृतीय पुरुष, समस्त रहस्यमयी आत्माएं, विश्ववासियों के सभी समूह, सुनो! प्रेम और सहानुभूतिपूर्ण आत्मीयता से भरकर सुनो.... समय अभी है, इसी वक्त और इसी वक्त सुनो...ध्यान से ... इसे, जो प्यास से अतृप्त है, परेशान है, इसकी मदद करो और इसे बतलाओ कि हम जो कुछ भी यहाँ भोगने वाले हैं, वह कुछ भी यथार्थ नहीं है। यह हमारे ही मन की स्थिति है। हम ही इसका निर्माण करते हैं, हम ही भोगते हैं. हम ही प्यासे रहते हैं और इसी कारण मृत्यु के पश्चात हम इस कष्ट को भोगते हैं, इस रास्ते से गुज़रते हैं और मुक्त भी हम ही हो सकते हैं, इसलिये इस अतृप्त कार्मिक बंधन से छुटकारा पायें।’

सुन रही हूँ बार-बार ....इस बात को सुन रही हूँ। समझना नहीं चाहती, मानना नहीं चाहती और पता नहीं कब सब-कुछ उस वायड के भीतर शांत सा हो गया है। कितनी देर तक नहीं जानती। मैं निश्चल मन उस वायड में कहीं स्थिर सी हो गयी हूँ....समय निकलता जा रहा है...और मुझे मूर्छा सी आ गई।

होश आया तो मैंने स्वयं को एक उज्जवल वातावरण में पाया...बिना सूर्य का उजास...न दिन...न रात...न सुबह...न शाम...विश्राम काल...मैंने अपनी मां को देखा...वैसी ही लगीं वे....अपनी मध्य वय में स्थिर सी...न कि वृद्धावस्था में जब वे पलंग से उठ नहीं सकती थीं और उन्हें कुछ दिखाई नहीं देता था..हम दोनों के ह्रदय करुणा और प्रेम से आप्लावित। मां मुझे दिखाती रहीं....यहाँ के फूल, यहाँ के रंग, यहाँ का वातावरण....पृथ्वी पर रहते हुए मनुष्य इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकता... न स्वर्ग है यहाँ न नर्क...न ऐसे संसार...यहाँ वही संसार है जो मनुष्य खुद बनाता है। धरती से छूटते हुए ही हम अपनी इन्द्रियों की सीमाओं से भी छूट जाते हैं...न सर्दी, न गर्मी, न आंधी-तूफ़ान, न भूख, न प्यास....किसी भी कामना की पूर्ति का साधन है विचार। यहाँ सब एक-दूसरे की सहायता करते हैं। ज्ञान और प्रेम ही इस लोक में महत्वपूर्ण हैं।

उन्होंने मुझे उन नियमों के बारे में भी बताया जिनसे इस सृष्टि की उत्पत्ति हुई है और जिनसे यह संचालित होती है। दिखते अनियमों के भीतर कितने गहरे नियम काम करते हैं, मैंने एक बार फिर जाना.....

‘मैं हूँ तुम्हारे लिये क्योंकि तुम चाहती थीं ऐसा। मैं तुम्हारे जीवन के तमाम सफ़र के दौरान तुम्हें देखती रही हूँ। जब-जब भी तुम अपने लम्बे सफ़र के दौरान थकी हो या जब भी तुम्हें सहायता की आवश्यकता हुई है....हमने दी है। हम तुम्हारे जैसे मनुष्यों की प्रगति को एक खास ढंग से देखते और प्रतीक्षा करते हैं। यहाँ तुम कई अनाशक्त आत्माओं से मिलोगी जो प्रकृति के रहस्यों को जानने के दौरान बीच-बीच में अवकाश लेकर देह बदलने यहाँ आते हैं। तुम उन्हें पहचान लोगी। यही देह....जो संसार के सामान्य लोगों के लिये बंधन है, उन्हें मनुष्यत्व के धरातल से ऊपर उठाकर प्रकृति के महत तत्व से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.....’

मैं उन्हें देख-सुन-समझ रही हूँ......

‘कभी-कभी मैं तुम्हें लगभग बेसुध अवस्था में लिखते हुए देखती थी। उस वक्त मैं तुम्हारे पास ही होती। अपने भीतर के अमूर्त विचारों को शब्दों का मूर्त रूप देने की तुम्हारी छटपटाहट की साक्षी.....’ वे मुस्कराती रही....

‘यहाँ से वह सब-कुछ कितना निरर्थक लगता है...जो जिया और जाना गया है, क्या सचमुच कहा जा सकता है? यही तो स्मृतियों का पुंज है...जिसे हम अपने साथ लिये बार-बार न सिर्फ़ आते-जाते हैं...इसी से सीखते और अपने विकास चक्र को आगे बढ़ाते हैं। ज्ञान हो या प्रेम, जिस धरातल पर घटित होता है, मनुष्य जब तक अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करता, नहीं जान सकता वास्तव में। और यह छटपटाहट एक रास्ते पर तो डाल ही देती है। अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करने की छटपटाहट। इस कोशिश में तुम्हें देखा है मैंने। तुम कौन हो? कहाँ से आई हो? इस संसार में क्यों भेजी गयी हो? क्या अर्थ है तुम्हारा? यही जानना चाहती हो न तुम? जान चुकी हो काफ़ी कुछ, जानती हूँ, फिर भी जो बचा है, उसे जानने को फिर धरती पर जाना ही होगा। कदाचित तुम किसी को ढूंढ़ रही हो?’

उनकी आवाज़ की सारगर्भिता से मैं मुस्करा दी। वे जानबूझकर मुझसे दूर चली गयीं। मुझमें सतरंगी स्वप्नों का संसार कौंधने लगा। हां, मैं ढूंढ़ रही हूँ उसे जो मात्र दो ही कदम दूर है मुझसे...और पहुँचने में ही मैंने सदियाँ लगा दीं। एक गहरी धुंध ने मुझे फिर अपने आगोश में ले लिया...जब जागी तो भीतर खुशी, शांति और सौम्यता का भाव। चारों तरफ़ अजीब चित्ताकर्षक धुनें.... चमकीले रंगों के सतरंगे पंख....पंखों से झरती खुशबूएं....कौन सी दुनिया है यह? चेतन जगत या चेतना का जगत? देह से लिप्त चेतना नहीं देह से निर्लिप्त चेतना। मेरा सूक्ष्म जगत से विश्राम खत्म हुआ और अब मैं अपनी तीसरी काया में हूँ...अग्नि या विचार काया ...मानस जगत का भाव तत्व.....

यह वह लोक है, जहाँ कविता और संगीत जिस रंगीन भाषा में व्यक्त होते हैं....वह पृथ्वी की भाषा में समझाया नहीं जा सकता। जीवन भर जिन शब्दों को साधते हैं हम, यहाँ आकर कितने व्यर्थ हो जाते हैं। लाखों प्राणी हैं यहाँ ...परियां...मछलियाँ, पशु, देवता, सिद्ध. सभी अपने-अपने कर्मानुसार। सारे फासले...सारे रूप...सारे परिवर्तन, सारे काम केवल इच्छा या संकल्प से। मैं चाहूँ तो फूल हो सकती हूँ, चाहूँ तो चिड़िया, चाहूँ तो मनुष्य। मैं अपनी इच्छा के दिव्य रथ पर सवार हूँ। इस लोक का हर भाग सुन्दर है ... आलोकित ... छायाहीन...इन्द्रधनुषों और किरणों के पुष्पों से चमकता-महकता...

अग्नि जगत के सूक्ष्म पदार्थ के कारण ही जैसे ही मैं कुछ सोचती हूँ, आकृति की तरह सामने आ जाता है। यही अग्नि सदैव हमारे विचारों में मौजूद रही है। यही वह जगह है, जहाँ व्यक्ति अपने स्वर्ग का निर्माण खुद कर सकता है। विचारों की समृद्धि ही परिवेश की समृद्धि है। यहीं हम उन लोगों से मिलते हैं जिन्हें कभी न कभी हमने प्रेम किया होता है....ज्ञान और प्रेम...सहज...शाश्वत अविनाशी। विचारों का स्तर समान हो तो कहाँ हैं दूरियां...

मैं देखती हूँ...वे सारे स्फुलिंग शरीर जिन्हें किसी न किसी रूप में मैंने चाहा था, प्रेम किया था....पर वह कहाँ है जिसे सबसे ज्यादा जिया मैंने अपने भीतर.... जो मेरी समस्त यात्राओं का केंद्र बिंदु रहा है...अनेक यात्राएं करवाई हैं उसने....कभी मुझसे दूर जाकर, कभी आगे-पीछे जन्म लेकर...कभी रूठकर... कभी यूँ ही अपनी निर्विकारता के चलते....और विचार के साथ ही वह आ गया। मैं मुस्करायी ....

‘अब नहीं भाग सकते ...’

‘मैं कभी नहीं भागा. कहाँ जाता? कोई उपाय न था।’

‘तुम जानते थे न?’

‘तुम जानती हो, मैं जानता हूँ। तुम मानती नहीं थीं। कहता नहीं था मैं तुमसे, इस सृष्टि की रचना इतनी विलक्षण है कि हम अपनी चाहों से बंधे वहीं-वहीं आ जाते हैं....’

‘तुम अपनी देह को याद कर रहे हो?’

‘तुम कर रही हो?’ वह हंस पड़ा। मैं जब धरती पर ही उसकी आँखों से नहीं बच पायी तो अब यहाँ तो कोई सवाल ही नहीं......

‘हां....मैं कर रही हूँ।’

‘क्यों?’

‘तुम जानते हो।’

‘फिर भी बोलो...’

‘देह हमारी सीमा भी है ...जम्पिंग बोर्ड भी...वहीं से हम खुद से बाहर छलांग लगा सकते हैं। कोई भी प्राप्ति सबसे पहले वहीं दिखती है, फिर वहीं से आगे बढ़ती है। घाट पर है अभी मेरी नाव...मैं एक बार फिर बहना चाहती हूँ तुम्हारे साथ....’

‘हूँ तो सही मैं तुम्हारे साथ।’

‘नहीं, इस तरह नहीं. मुझे मिटटी का आकार चाहिये...मिटटी की गंध...मिटटी का कसाव....’

‘फिर मिटटी? कुछ चीजें नहीं छूटती।’ वह शरारतन मुस्कराया।

‘छूटती हैं, पूर्णता प्राप्त कर लेने के बाद।’ मैं हंस दी....प्रसन्नता से, प्रकाश से, सुख से। हमारा समूचा अर्जन हमारे सामने। सुख का वह क्षणांश मैं पीती रही। और उसी क्षणांश में मैंने पिछला जीवन देने वाले कारणों को देख डाला ...परिणामों और प्रभावों को भी। अपने विचारों, अपने ज्ञान और प्रेम के सहारे जो फसल बोई थी मैंने....काटने का यही समय है...’

जान पाती हूँ.....मैंने अब तक अनंत मौतों का अनुभव किया है...न जाने कितने चोले उतार फेंके हैं....पत्थर। चट्टानें, वृक्ष, पशु-पक्षी, अनेकों के बाद अनेक मनुष्य...कितने संवत्सर....कितनी सदियाँ धरती के समय के हिसाब से गुज़ार दी हैं मैंने...संस्कारों और आदतों के प्रबल सम्मोहन से धीरे-धीरे छुड़ा पायी मैं खुद को....

अब यहाँ मैं अपने त्रितत्व के साथ हूँ। यही वह अविनाशी तत्व है जिसमें से एक व्यक्तित्व का जन्म होता है। यही हमारी वैयक्तिकता है। अनेक जन्मों की उपलब्धियों की शाश्वत वाहक...जो लगातार पुराने कपड़े उतारती नये पहनती चलती है। समस्त कायाओं को त्यागने के बाद ही अंत में बचते हैं हम।      

उस क्षण मैंने जाना....तीन जगतों में एक साथ रहते हैं हम...स्थूल जगत में अपनी काया में, सूक्ष्म जगत में अपनी इच्छाओं में और मनस जगत में अपने विचारों में। इसके लिये ही हमें एक शरीर मिला होता है, हमारी चेतना का वाहक। मृत्यु क्या है? हमारी चेतना के एक अंश का निम्नतर लोक में उतरना फिर वापस उच्चतर लोकों में चले जाना। बंधन मुक्ति है मृत्यु। हमें अपने स्वरुप में लौटने को स्वतंत्र कर देती है।

मैं उसे देखती हूँ.....प्रकाश की नदी में हम सब साथ-साथ बह रहे हैं.... वे भी कभी न कभी जिनके साथ मेरे सम्बन्ध रहे हैं। निरंतर की इस आवाजाही में हम शरीर के बिना ही एक-दूसरे एक-दूसरे को पहचान लेते हैं...मदद करते हैं एक-दूसरे की प्रेम और करुणा के साथ, उन्हें उनके लिए नियत रास्तों पर आगे बढ़ते जाने में। हम सबको किसी न किसी रूप में जब भी एक-दूसरे की जरूरत पड़ती है...हम सहर्ष आगे आ जाते हैं....

बहते-बहते ही क्षणांश को मिली दिव्य दृष्टि से मैंने अपने सारे अधूरे कार्य देख डाले। उन्हें पूरा करने को मुझे एक बार और जाना होगा। मैंने उसकी तरफ देखा....देखती रही...मेरे देखते ही वह मेरे पास आ गया....

‘चलोगे?’

‘तुम चाहती हो तो?’

‘तुम नहीं चाहते?’

‘मैं अपने काम पूरे कर चुका हूँ।’

‘एक काम बाकी है।’

‘कौन सा?’ वह हंस पड़ा।

‘मैंने अपने नाविक को पार तरावा कहाँ दिया है?’

‘यह तो नाविक का काम है। उसका काम ही उसकी ख़ुशी है।’

‘मैं तुम्हें सिर्फ़ एक कौड़ी दूंगी...अपनी मर्जी की एक कौड़ी ...और उसे लेने तुम्हें नीचे आना ही होगा.....ग्यारह रस्सियों से मैं तुम्हें खीचूंगी और तुम्हें आना होगा.....तुम्हें खोजने ही अनेक दुर्गम पथों पर चली हूँ मैं अनवरत। अनेक जन्मों में मैंने कमाया है यह पुन्य...अनेक जन्म मैं साथ रहना चाहती हूँ तुम्हारे....’

यह सब मैंने नहीं कहा पर वह समझ गया। समझता रहा है वह मुझे मेरे बिना कुछ कहे भी। उसने कहा नहीं पर मैं समझ गयी वह राजी है। इसके साथ ही मैंने देख ली अनेक जन्मों की हमारी विवशताएं ....जब हम नितन्तर घूमती इस पृथ्वी पर अनेक-अनेक मनुष्यों की संगत में ....अनेक कार्यों और संपर्कों में फंसे हुए...एक-दूसरे से दूर-दूर बहते रहे।

धीरे-धीरे हम अपने पुनर्जन्म के निश्चित समय की ओर बढ़ते रहे। इस बार चुनाव होगा, खुद चुनने का यह स्वर्णिम अवसर मेरे पास है....और मुझे आसान नहीं चाहिये कुछ...कठिनतर मार्ग मैं चुनना चाहती हूँ...अपनी चेतना को और-और उच्चतर आयामों की तैयारी करवाने के लिए.....

अग्नि जगत से मैं वापस आ रही हूँ...अपनी ऊर्जा के कुछ कणों को फैलाती हूँ....जिससे मानस जगत का कुछ पदार्थ मेरी ओर आकर्षित हो मुझमें समा जाता है। इसी पदार्थ से मैंने विचार शरीर का निर्माण किया और सूक्ष्म जगत में आ गयी। इसी तरह मैंने सूक्ष्म जगत के पदार्थ को अपनी ओर आकर्षित किया। मेरी सूक्ष्म इच्छाओं से यह काया बन गयी। इसके बाद मैंने स्थूल जगत के ईथरीय पदार्थ से ईथरीय काया का निर्माण किया। इसके साथ ही मेरे लौकिक जन्म समय आ पहुंचा....एक बार फिर अपने नये जीवन के निश्चित पाठ और कार्य के लिए ...जिसे पूरा किया जाना है।

और धरती के हिसाब से न जाने कितना समय बीता होगा..मैं लगातार अपने लिए अनुकूल गर्भ ढूढ़ती रही....अपने आगे की यात्रा के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करने को।

मैंने देखे....अपने चारों ओर अनंत मैथुनरत जोड़े...सृष्टि का समूचा आनंद और सृजन दो विपरीतताओं के मिलन में है। प्रकृति के हर कण में जो व्याप्त है ....वह है प्रेम। मैं उनके पास से गुजरती चली गयी और रुकी वहां जहाँ प्रकाश की नदी बह रही थी चारों तरफ़...अनंत उर्जा....मैंने असीम प्रेम और दिव्यता का अनुभव किया। मैं ठहर गयी उस क्षणांश में ...आधे-आधे दोनों....मिलकर पूरे होते...अर्धनारीश्वर ...क्षणांश में ही मैंने उन्हें पहचान लिया और उनमें प्रवेश कर गयी.......

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


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