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Priyanka Jhawar

Others

4.9  

Priyanka Jhawar

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अच्छा हुआ, लाॅकडाउन लग गया !

अच्छा हुआ, लाॅकडाउन लग गया !

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अरे पारो! मैं आज सुबह से ही तुझे याद कर रही थी, और देख तेरा फोन आ गया। सौ साल जीयेगी तू! कैसी है तू ? सब ठीक है ना तेरे यहां पर?

मम्मी- हमारे घर पर काम करने वाली आंटी से फोन पर बात करते हुए बोली।

उन्होंने जवाब दिया- हां भाभी, सब ठीक है।

फिर धीमे से हॅंसी भरी आवाज़ में बोली - "अच्छा हुआ जो लाॅकडाउन लग गया!"

नहीं तो आप लोग मुझे पैसे काटने की चेतावनी दे देकर काम पर बुलाते ही रहते।

मम्मी ने मुस्कुराते हुए कहा - अच्छा मैंने तो कभी तेरे साथ ऐसा नहीं किया। मैंने तो पहले ही मना कर दिया था तूझे काम पर आने से।

आंटी बोली- मैं आपकी बात नहीं कर रहीं थीं भाभी, और लोग भी तो है कालोनी में।

मम्मी बोली- अच्छा और बता, तुझे किसी बात की कोई तकलीफ़ तो नहीं? राशन दवाई कुछ भी जरूरत हो तो बताना।

आंटी बोली- हां, अभी तो जैसे तैसे काम चल रहा है।

उन्होंने पूछा- आप कैसे हो, वहां पर कैसे हालात हैं?

मम्मी ने जवाब दिया - यहां पर भी वही हाल है, "अच्छा हुआ लाॅकडाउन लग गया!" ,

नहीं तो तुझे तो पता है, तेरे भैया को समझाना और घर पर बिठाना कितना मुश्किल है! उन्हें अपनी जान से ज्यादा काम प्यारा है।

बच्चे भी मानने को तैयार नहीं थे, अगर सिर्फ हम स्कूल नहीं गए तो हमारी परीक्षा छूटेगी, हम फेल हो जाएंगे। "अच्छा हुआ जो लॉकडाउन लग गया!" और स्कूल बंद हो गए।

नहीं तो मैं किस-किस को समझाती! ऐसा कहते-कहते मम्मी फोन लेकर रसोई में चली गई।


और यह पहली बार नहीं हो रहा था। अभी तक मम्मी ने जिन-जिन महिलाओं से बात की थी - रिश्तेदार, पड़ोसी, सहेलियां, सभी इसी संवेदना से जुड़े हुए थे और सबकी एक ही राय थी कि, "अच्छा हुआ लाकडाउन लग गया!"

इस बार फोन स्पीकर पर था, इसलिए वहां बैठी मैं, भैय्या और पापा हमको बातें सुनाई दे गई थी।

मम्मी के जाने के बाद, हमने आपस में तो कुछ नहीं कहा - पर मन ही मन हम भी सोच रहे थे कि हम जान बूझकर आपको परेशान नहीं करना चाहते। 

पर हम भी क्या करें? कोरोना के डर के साथ हमें एक डर और भी है। नौकरी छूटने का डर! परीक्षा में फेल होने का डर! व्यवसाय में नुकसान का डर!  

पापा ने जब बॉस से बोला कि, मैं कोरोना की वजह से अब नहीं आऊंगा तो वह उल्टा उन्हें ही समझाने लगे। सावधानी रखकर आने में कोई दिक्कत नहीं है। तुम्हारी सुरक्षा के सभी इंतज़ाम कर दिए गए हैं। बाकी सब भी तो आ रहे हैं।


स्कूल में मैडम को जब दूसरे बच्चे बोल रहे थे, तब ही हमने उनका जवाब सुन लिया था - कोरोना क्या तुम्हें अनोखे को चिपकने वाला है‌? बाकी सब भी तो आ रहे हैं। तुम नहीं आए तो फेल तुम ही होगे।

यह सुनने के बाद फिर से वही सवाल पूछने की हिम्मत नहीं हुई हमारी!

जिनका व्यापार है - उनको भी यही डर रहता कि अगर सिर्फ वह अपनी दुकान बंद करेंगे तो उसमें उनका ही नुकसान होना है।

यह किसी एक व्यक्ति या समूह का दोष नहीं है और ना ही उनकी निंदा की बात है।

उन सब पर भी किसी ना किसी का दबाव , जिम्मेदारी है जो उन्हें यह सब करने के लिए मजबूर करती हैं।


इंसान में सहानुभूति और संवेदना की भावना तभी आती है, जब वह उस दौर से खुद गुजरता है, जिन पर वह कभी दूसरों से सवाल किया करता था।

तब ही वह दूसरों की वेदना को समझ पाता है, और अपनी उस स्वार्थी सोच पर सवाल उठाता है कि मैंने तब उस इंसान की समस्या को, उसके हालात को क्यों नहीं समझ पाया।


पर दाद देनी पड़ेगी इस कोरोना वायरस कि- सब के साथ एक जैसा व्यवहार कर रहा है। एक बचेगा तो सब बचेंगे, एक मरेगा तो सब मरेंगे। किसी एक का नुकसान नहीं होने दे रहा।

और इसीलिए शायद सबके लिए एक जैसा नियम लागू हुआ है।

और इसीलिए शायद आज किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं है सब एक दूसरे के प्रति संवेदना की भावना, सहानुभूति की भावना रखे हुए हैं ।

और तो और खुद आगे होकर बोल रहे हैं -भाई! अगर तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है, तो तुम घर पर ही रहो काम पर आने की जरूरत नहीं है।

और पहले अगर ऐसा होता था तो हमें बीमारी को सच साबित करने के लिए भी कितनी सफाई देनी पड़ती थी।

जो स्कूल फेल करने की बात कर रहे थे, उन्होंने खूद ही बिना परीक्षा के अगली कक्षा में पहुंचा दिया!


यह संवेदना और सहानुभूति रखने की बात अगर इंसान दूसरे इंसान को समझाता है तो वह समझ नहीं पाता हैं, कभी किसी मजबूरी से, कभी किसी दबाव से। इसीलिए शायद भगवान एसी आपदा-विपदा के सहारे अपना संदेश भेजते रहते हैं, यही सोच कर कि, अब शायद इंसानों की स्वार्थी सोच बदल जाएं और कभी-कभार के लिए नहींं हमेशा के लिए एक दूसरे को समझें।

मगर इंसान तो आखिर इंसान ही हैं। तूफान शांत होने के बाद फिर अपने रंग में आ जाता हैं।


इन विचारों की खलबली मन में चल ही रही थी, कि ज़ोर से मम्मी की आवाज़ आई- अरे! कहां गए सब लोग? 

कितनी देर से आवाज़ लगा रही हूं, खाना खा लो। सुनाई नहीं दे रहा क्या? 

पापा, भैय्या और मैंने एक दूसरे को देखा और फिर मम्मी को मुस्कुराते हुए देख सहसा हम तीनों के मुंह से निकल गया- "अच्छा हुआ लाॅकडाउन लग गया"!,

नहीं तो हम मजबूरों को समझाना मुश्किल था। चलो खाना खाते हैं!


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