उन दिनों के इंतज़ार में
उन दिनों के इंतज़ार में
न जाने ये दिन कैसे आ गये
स्कूल के वो दिन न जाने कहां गये
स्कूल जल्दी आकर गेट पर गप्पे लड़ाने का अपना अलग ही मजा था,
क्लासरूम तक दौड़ कर जाना और कौन जीतेगा इसे जानने में अपना ही अलग मजा था,
वह दोस्तों के लंच झट से चट कर जाने में अलग ही मजा था,
न जाने ये दिन कैसे आ गये
स्कूल के वो दिन न जाने कहां गये
वह बसों के बीच घूमना और टीचर को देख लेने पर दुम दबाकर भागने में अलग ही मजा था
टीचर की क्लास के जाने के बाद किंग्स खेलने में अपना अलग ही मजा था
क्लास बोरिंग हो तो कभी-कभी बहाना बनाकर मेडिकल रूम जाकर बैठ जाने में भी अपना अलग ही मजा था
न जाने यह दिन कैसे आ गये
स्कूल के वह दिन न जाने कहां गये
दोस्तों से बात करने के लिए तरस चुके है,
टीचर को देखने के लिए व्याकुल हो चुके है,
वह कक्षा में पीछे बैठ कर उत्पात मचाना एक दूसरे का नाम ना ले कर सब को बचाना,
पानी भरने के लिए फील्ड तक जाना और एक दूसरे पर पानी छिड़क कर सब को
भिगोना
जब भी फील्ड में जाते थे पूरे स्कूल का निरीक्षण करके आते थे
वह दोस्तों का लड़ना झगड़ना
बर्थडे के दिन बर्थडे बोंब से बचना
छुट्टी हो जाने पर गेट के बाहर आइसक्रीम खाना और जो पैसे ना दे उसको पकड़ कर पीट डालना
न जाने ये दिन कैसे आ गये,
स्कूल के वो दिन न जाने कहां गये,
अब हर चीज के लिए तरस चुके हैं ,
ऐसा कहते हैं ना कुछ रास्ते चलाए नहीं थकते ,
कुछ पल रुकाये नहीं रुकते,
स्कूल की यादें भुलाए नहीं भूलती ,
हर चीज की यादें छुपाए नहीं छुपती ,
हर पल स्कूल की याद आती है,
सोचती हूं ;
ना जाने यह दिन कैसे आ गये
स्कूल के वो दिन न जाने कहां गये
क्या वो पल लौट कर आएंगे
या हम सब इन कमरों में ही बंद रह जाएंगे?
उन दिनों के इंतज़ार में…
