टिक्की,मोटू,बंदरु।
टिक्की,मोटू,बंदरु।
वह समय जब वह आई थी,
गुड़िया रानी कहलाई थी।
अपने छोटे-छोटे हाथ पैर से ,
मानो जैसे वह छटपटाई थी।
नाम पड़ा था उसका टिक्की पिक्की ,
यह नाम सुन मानो वो मुस्कुराई थी।
प्यारी, गोरी, नन्ही-सी जान ,
फूलों के संग आई थी।
बन गई है परिवार की सदस्य,
एक खिलौने वाली भालू होकर भी
वह हम सबके हृदय में समाई है।।
नहीं हुआ था टिक्की को 1 वर्ष भी,
एक और प्यारा, मोटा, गुलाबी भालू आया घर में।
बहन को इनाम स्वरूप मिला था वह,
रहता था अकड़ में।
उसका नाम रखाया पिक्की पिक्की,
मिलता-जुलता था पहली भालू के नाम से जो है टिक्की पिक्की।
पर नए भालू को प्यार से सब कहते हैं मोटू।।
नहीं हुआ था मोटू-टिक्कू को 1 वर्ष भी,
एक और प्यारा,लाल,हँसमुख,चंचल बंदर मिला।
पर यह नया नहीं था-
घर में ही पुराने खिलौने के ड्रम में से था मिला।
उसका नाम रखाया हँसमुख रामलाल।
पर इस बंदर को प्यार से सब कहते हैं बंदरु।।
तीनों मिलजुल-झगड़ के हैं रहते।
परिवार का भाग मानो है जैसे।
मनुष्य से तो लगते हैं यह सब अच्छे।
लगता अब यह भी हम से वार्तालाप है करते,
हंसते,रोते और भोजन करते।
किसे पता था एक दिन यह सब लगेंगे सबसे अच्छे-सच्चे।।
