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Anupama Shrivastava Anushri

Others

5.0  

Anupama Shrivastava Anushri

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तरबतर

तरबतर

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378


लबालब भरे ये श्याम घन

चले आये हैं डग बढ़ाये 

धरा लहलहाती, खिलखिलाती 

है उनके आतिथ्य में सर झुकाये 


काले -काले मेघों के ये घेरे हैं ख़ूब घेरे

ज़रा सा हाथ बढ़ाया और बरस पड़े 

पावन सी प्रकृति खिल -खिल गयी 

 रेशमी बूंदों से पहन ताज़गी का पैरहन


ठहर -ठहर गुज़रती हवा आईने से जल पर 

करती चली बेतकल्लुफ़ चित्रकारियाँ 

बारिशों ने भिगोई है जो शाम ओ सहर

तरबतर हो गया है दिल का शहर।



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