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Anagha V

Others

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Anagha V

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प्रकृति

प्रकृति

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मैं प्रकृति हूं, मैं जीवन हूं  

मैं हूं सब कुछ इस संसार की ।

जान लिया है जान दिया है

इस धरती के जीवजालो को ।


हर दिन नए-नए चिड़ियों की

सुरक्षा करने वाले पेड़।

सबकी प्यास बुझाकर

बहती नदियां ।

सवेरे से सबकी दिल में

सूरज रोशनी फैलाता है ।

ऐसी कई-कई रूप थे मेरे ।


एक दिन थी जब में स्वतंत्र थी

किसी के चरणों पर नहीं थी

एक अस्थित्व थी मेरा

शांत रही थी मैं ।

चिड़ियाँ ख़ुशी से उड़ रही थी,

नदियाँ शांत होकर बहती थीं,

मोरनी ख़ुशी से नाच रही थी

कई तरह की फूल थे

हर तरफ हरियाली थी।


प्रकाश दिया मनुष्य को

फल दिया मनुष्य को

पानी दिया मनुष्य को

स्वच्छ वायु दी मानुष्य को

सुरक्षा दी मानुष्य को

सब कुछ दिया मनुष्य को।

मैं किसी के लिए माँ थी,

मैं किसी के लिए स्वर्ग थी ,

मैं किसी की बहन थी।


लेकिन मुझे क्या मिला?

अनादर और दुख।

कलिकाल में लोग मुझे भूल गए

और अपना घर बना लिया।

हरियाली को नष्ट करके

इसे नरक बना दिया।

प्रदूषण से नदियां रो रही हैं

पेड़ों को काटकर

पैसे के पीछे जा रहे हैं।

अब फूलों में खुशबू नहीं है,

 हर जगह प्रदूषण की बदबू है।


हर चीज की अपनी सीमा होती है

अब मेरे पास कोई ताकत नहीं है।

मैंने अपनी सीमाएं पार कर ली हैं

अब मैं और बर्दाश नहीं कर सकता,

अब मैं अपने गुस्से को रोक नहीं पाऊंगा।


वहां बाढ़ आ गई

प्रकृति आपदा आ रही है,

लोगों ने मेरी बहनों के रास्ते में

घर बना लिया।

मैंने उसे नष्ट किया और

बह गया।


मैंने जो चीजें मानव को दीं

मैंने सब कुछ वापस ले लिया।

संसार नष्ट हो गया

और मानव की विनाशकारी कर्मों की ।


मुझे यह नहीं चाहिए थी,

मैं यह कभी नहीं चाहती थी।

मैं सब कुछ देना जानती थी

मैं सबकी सेवा करना चाहती थी ।

लेकिन मानव का बुरा स्वभाव

मुझे बदल दिया।

अब मेरे पास शांती नहीं है।


जो मेरे साथ हुआ

इसका असर तुझ में भी होगा।

अपनी प्रकृति माता का सम्मान करें

मैं तुम्हें जीवन दूंगा।

लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है

तब मेरे पास कोई विकल्प नहीं होगा।


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