नज़रंदाज़
नज़रंदाज़
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जब मेरे पास कुछ शेष न बचा
तो मैंने जो दांव खेला है, वो है " नज़रंदाज़ करना"।
मैंने अंत में हर उस चीज़ को नज़रंदाज़ किया है
जिसे मैंने अपनी ज़िंदगी में एहम हिस्सा बनाया है।
चाहे फिर वो मेरा कोई सपना हो , कोई व्यक्ति हो ,
कोई परेशानी हो , कोई हल हो , कोई खुशी हो , कोई गम हो ।
वो सारे क्षण और इंसान मेरे करीब तो रहता है
मगर मेरी उन भावनाओं को उनके प्रति व्यक्त करने से रोक देता है।
शायद ये अच्छा है , या शायद बुरा है।
