मेरी माँ
मेरी माँ
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प्यारी, सुंदर सी वो मेरी सहेली
साथ मेरे करती हर वक़्त ठिठोली ।।
अच्छा, बुरा सब मुझको सिखाती
दुनिया ज़माने की रीत बताती ।।
अपने बचपन का किस्सा सुनाती
खुद भी हँसती, हम सबको हँसाती ।।
सबको खुशहाल रखते रखते
अपनी परवाह करना हमेशा भूल जाती ।।
बच्चों के लिए जीती आई है जो
परिवार की बुनियाद रखती है वो ।।
रिश्तों को न जाने कैसे सम्भाल लेती
बच्चों के लिए मन अपना मार लेती ।।
खुद के सपनों को भुला के वो
सबके सपनों में रंग है भरती ।।
ना जाने कितने रूप में मिलती
माँ के रूप में सबसे प्यारी लगती ।।
अब माँ के बारे में क्या क्या कहूँ
कलम ना रुकेगी बस पन्ना कम पड़ जाएगा
माँ तुमको इन अल्फाज़ों में कभी कोई
ना समेट पाएगा ।।
