मेरे इर्दगिर्द तुम
मेरे इर्दगिर्द तुम
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बड़े दिनों बाद
फिर से सजाई
अपनी बुक शेल्फ,
किताबों के बीच
रखे रंगीन बुकमार्क
फिर से टटोले..
किसी मायूस से लम्हे में
लिखे तुम्हारे नाम को
कई कई बार पढ़ा..
मेरी पहली डायरी के,
आखिरी पन्ने में लिपटी
तुम्हारी तस्वीर को,
नज़रो ने छुआ..
खिड़की की झिर्रियों से,
दरवाजे की आहट से,
अखबार पे बनी तस्वीरों की
अनगढ़ सजावट से,
तुमसे बातों की
धार में कुतरी पेंसिल से,
कमरे में बेतरतीबी से
फैले तुम को,
हर बेज़ा जगह से उठाया..
करीने से सजाया..
अक्सर होता है..
तुम मुझमे जितना बिखरते हो
बाहर मैं उतना समेटती हूँ..।।
