STORYMIRROR

Sanjiv Upadhyay`

Others

2  

Sanjiv Upadhyay`

Others

माँ

माँ

1 min
155

जब साथ वह तेरे होता था,

तेरी नसीहतें कड़वी लगती थीं

अब जाके समझ में आता है,

जब भी मैं अपनी ग़लती पर,

कोई ठोकर ख़ाता हूँ कि क्यूँ,

हर छोटी बड़ी गुस्ताखी पे,

माँ मुझ को डांटा करती थी


मैं याद करूँ तो, रोता हूँ,

कमरे में सबसे छुपकर के

कोई दर्द अगर दे जाता है,

माँ याद बहुत तू आती है

तेरी गुज़री बिसरी बातें,

फिर सोच सोच कर हँसता हूँ

तेरी स्मृतियों के आंचल में,


हँसते हँसते सो जाता हूँ

पर याद तू मेरी प्यारी माँ,

हर पल में आती रहती है

यादों में बस यही सोचूं मैं,

जब साथ वह तेरे होता था 


Rate this content
Log in

More hindi poem from Sanjiv Upadhyay`