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माँ - बाप

माँ - बाप

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कितने बेबस हो जाते हैं वो माँ - बाप,

जिनकी औलाद उन्हें कह दे-

की अब जरूरत नहीं है हमे आपकी,

अब ज़िन्दगी को जीना सीख चुके हैं हम!


और माँ - बाप बेचारे उन्हें हँसकर अलविदा

कर देते हैं।

अंदर ही अंदर खुद घटते जाते हैं,

पर वो बेचारे किसी को अपनी "दर्द - ए - दासता"

सुना भी न पाते हैं।।


ज़िन्दगी की इस कशमकश में

कुछ लोग (औलाद) इतने मशरूफ हो जाते हैं!

की इस भीड़ भरी दुनिया में

अपने माँ - बाप को भी नहीं पहचान पाते हैं!!


पर अफसोस!

"दर्द - ए - इम्तिहान तो तब शुरू होता है,

जब यही औलाद एक दिन खुद माँ - बाप बन जाते हैं!!


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