लांछनों के हवन में सुलगती रही
लांछनों के हवन में सुलगती रही
बांधकर क्यूँ वचन में मुझे तुम प्रिये,
लांछनों के हवन में सुलगती रही।
मैं जलाता रहा रोशनी के दिये,
तुम अँधेरी गुफ़ा में भटकती रही।
थी विवशता तुम्हें क्या बताओ शुभे,
जो विखंडित किया अर्चना का कलश।
अनछुई देह की भंग कर साधना,
क्यों विसर्जित किया चेतना का कलश।
फोड़कर पनघटों की व्यथित गागरें,
मरुथलों में नवल प्राण भरती रही।
मैं--------------------------------(१)
वेद मंत्रों सहित देव के द्वार पर,
ताप सहता रहा नेह का आचमन।
आँख से नीर बनकर बही प्रार्थना,
पर नहीं तुलसियों में हुआ पल्लवन।
त्यागकर नेवले के अभयदान को,
विषधरों के फनों पर थिरकती रही।
मैं-----------------------------------(२)
हस्तरेखा लिए भाग्य रोता रहा,
पर न संबंध की कुण्डली मिल सकी।
स्वागतम् के लिए जो गुथा हार में,
उस सुमन की कहाँ पंखुड़ी खिल सकी।
रौंदकर चातकों की प्रणय भावना,
तुम अनावृष्टि बनकर बरसती रही।
मैं---------------------------------(३)
