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Vivek Shukla

Others

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Vivek Shukla

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कविता

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"नारी सम्मान - एक छल"

हो रहा चीरहरण लाज का और,
सच को घुटते देखा है,
भीष्म सरीखे नेताओं को,
फिर भी हँसते देखा है।

सम्मान नारी का नौटंकी है,
बात बड़ी और छल कपटी है,
दांव लगाते स्वयंवरों में,
खुदको, तुझको देखा है।

पाखंडी संतों का डेरा,
नेताओं का रैन बसेरा,
इनमें मैने, तुमने भी तो,
मुजरा होते देखा है।

सोच सड़ी है, खोट बड़ी है,
सीधी और तने खड़ी है,
रक्षकों के साये में भी,
अबला को कल ही तो मैंने,
मुँह को ढकते देखा है।

उसको सिमटे देखा है,
लाज बचाते देखा है,
पलपल सिसके देखा है,
युधिष्ठिर को तब भी मैंने,
मूक खड़ा ही देखा था।

अब भी गौर दृष्टि से देखो,
मूक सरीखा बैठा है,
दु:शासन को कर चौड़ी छाती,
और ताल ठोकते देखा है,
"धर्म संस्थापनात्थाय..." मंत्र के,
मूल्य को घटते देखा है।

नाक के ऊपर पानी चढ़ता,
नेताओं का मन नहीं भरता,
और, क्या - क्या कर दिखलाओगे,
शर्म करो अब ठेकेदारों,
क्या फिर वह ,
दरबार लगाओगे।

 

रचना में शब्द भाव-

भीष्म- धर्म और राजनीति के पंडित
युधिष्ठिर- धर्म के ठेकदार
दु:शासन- दुराचारी


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