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Plaban Choudhury

Others

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Plaban Choudhury

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कलम किताब से फिर जुड़ाव

कलम किताब से फिर जुड़ाव

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भूल चुका था क़लम चलाना,

पर आज फिर से क़लम उठाना पड़ा है।

अनकही बातों को शब्दों में पिरोकर,

फिर से किताबों में संजोना पड़ा है।।

आँसुओं की इन धाराओं को,

अब फिर से छुपाना पड़ा है।

दिल की अनकही भावनाओं को,

फिर से किताबों से बतलाना पड़ा है।।

पलकों तले छिपे दर्द को,

अब फिर से बाहर लाना पड़ा है।

ग़मों को खुशियों में बदलने की चाह में,

ग़म और भी ज्यादा गहराने लगा है।।

सिसकते हुए इन आंसुओं को,

अब फिर से होंठ पीने लगा है।

दिल को हराने के लिए दिमाग़ को अपनाया,

पर दिल फिर से दिमाग़ को मात देने लगा है।।

सोचा था क़लम से रिश्ता तोड़ दूँगा,

पर क़लम को फिर से अपनाना पड़ा है।

एहसास हुआ कि किताब कलम ही सच्चे साथी हैं,

जिनसे दिल आज फिर अपने जज़्बात बतलाने लगा है।।


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