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Divya Rathour

Others


5.0  

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कौन तुम्हें समझाए

कौन तुम्हें समझाए

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कौन तुम्हें समझाए

कौन आगे बढ़ कर आए

तुम गलत चल रहे हो कोई

कैसे बताए

जब तुम अपने माता-पिता

का सम्मान नहीं कर पाए


तुम एक-एक कदम चलते गए

बिना सोचे आगे बढ़ते गए

क्या सही है क्या गलत

इस बात की परख तुम नहीं

कर पाए

कौन तुम्हें समझाए


जब तुम खुद से फैसले

कर रहे थे

कुछ रिश्ते पीछे छूट रहे थे

तुम्हारे अपने तुम्हारा हित

चाहते हैं

तुम यह भूल गए थे

वरना ऐसे यूं तन्हा ना होती

तुम्हारी राहें

कौन तुम्हें समझाए


माना कि अपनों का फैसला

हर वक्त सही नहीं होता

लेकिन हमारे सही फैसले भी

कभी गलत हो जाते हैं

यह बात हमें तब समझ आती है

जब छूट जाता है सब कुछ और

रूठ जाती हैं सारी यादें

कौन तुम्हें समझाए


काश कोशिश की होती सबके

दिलों को समझने की

कोशिश की होती अपनी बात

को सहजता से कहने की

कोई निर्णय ऐसा ज़रूर आता

जिसमें तुम्हारी खुशी होती

कौन तुम्हें समझाए

रिश्ते स्वार्थ से नहीं जाते निभाए



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