हड्डी की ज़ुबाँ
हड्डी की ज़ुबाँ
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इक दिन निकले सैर को
दिल में कुछ अरमान थे
एक तरफ थी झोपड़ियाँ
एक तरफ शमशान थे
पैर तले एक हड्डी आई
उसके यही बयान थे
चलने वाले ज़रा संभल के चल
हम भी कभी इंसान थे
हलचल का समा था चारों ओर
दिन यूँही न वीरान थे
सर कंधो पे हाथों में हाथ
दिन वो भी क्या दीवान थे
थे डूबे हम न कोई खबर
भाई उसके पहलवान थे
घर उसका एक अखाड़ा था
बस इससे हम अनजान थे
बस पहुँच गए हम उसके घर
दो शेर जहां दरबान थे
फिर दिल की बात जुबां पर आई
और पहुँचे हम शमशान थे।
