बसंती हवा
बसंती हवा
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चलने लगी है अब बसंती हवा,
मेरे बीमार दिल को मिल गई दवा।
बाग बगीचे सरसों मटर के खेतों में
बिताने लगा हूं मैं पहर दोपहर।
कोयल की कूक, पपीहे के पीहू पीहू
गूंज रहा है गांव गांव शहरों शहर।।
चलने लगी...
सूरज ने अब ले ली है अंगड़ाई,
सारे लोगों के तन बदन में गर्मी छाई।
धूम मचा रही है अब हवा पुरवाई,
जी मचलता है देख हसीनों की अंगड़ाई।।
चलने लगी.....
पीली हो गई खेतों की साड़ी,
तितलियां रस चूसकर बनी मतवाली।
देखो सब को ललचा रही है,
गोरी की आंखों के काजल काली काली।।
चलने लगी....
बसंत शुरू हुवा आ गया फगुआ,
शादी विवाह करवाने लगे अगुवा।
नव दंपति मिल रहे शर्माते शर्माते
बातों ही बातों में बिता दे रहे हैं रातें।।
चलने लगी है या बसंती हवा।
मेरी बीमारी दिल को मिल गई दवा।।
