STORYMIRROR

Nupur J

Others

3  

Nupur J

Others

बक्से

बक्से

1 min
93

बस बक्से ही बक्से हैं

ज़िन्दगी के इस सफर के

कुछ नीचे दबे पड़े हैं

बचपन की यादों से भरे हैं

बहुत ही प्यारे क्षण हैं

पर आज के दिन में 

बिल्कुल निश्चल हैं

कुछ तो ऊपर छिपा दिए हैं

दुछत्ती पर

ताले भी लगा दिए हैं

कभी छिप कर इन्हें देखेंगे

कुछ सपनों को फिर से छुएंगे

पर न कभी समय मिला

चाभी भी अब याद नहीं 

कहाँ रखी थी

शायद वह भी हो किसी एक बक्से में


कुछ बड़े हो गए बच्चों के

छोटे छोटे कपड़ों के हैं

टूटे फूटे खिलौनों के हैं

वे अब इनसे खेलेंगे नहीं कभी

ये तो हमने उस समय को

बक्सों में बंद करके रखा है

ये मेरे छोटे हो गए कपड़ों के हैं

कभी हम ऐसे भी थे

ये तुम्हारे कपड़ों के हैं

कभी तुम भी ऐसे ही थे

ये जब हम पहाड़ों पर गए थे

ये जब समंदर के पास गए थे


इस बक्से में वे चीज़ें जब तुम बीमार पड़े थे

इस में वे जब तुम अकेले रहने गए थे

ये बक्सा बेटे को पहली बार दिया था

घर से बाहर जाते हुए

ये बेटे ने हमें दिया था

पहली बार वापस आते हुए

इस बक्से में हमने इकट्ठा की थीं 

आने वाली बहू की सौगातें

इस बक्से में रखी थीं

माँ बाबू जी की कुछ यादें

कुछ बक्से रखे हैं आगे काम आएँगे

ज़िंदगी जब तक है

जारी रहेगा सफर

जुड़ते रहेंगे बक्से 

कुछ उम्मीदों से भरे

कुछ यादों से ।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Nupur J