STORYMIRROR

Manavi Awasthi

Others

4  

Manavi Awasthi

Others

भोर है जीती, तम है हारा

भोर है जीती, तम है हारा

1 min
437

रवि प्रतिबिम्ब के सम्मुख बैठी मैं,

गहन सुंदरता का करूँ आज मैं वर्णन!

शब्द शब्द में प्रेम बसेगा!

बोल बोल से होगा अभिनन्दन!।


जो अस्ताचल पर आए हैं दिनकर,

संध्या सागर में मिल है शर्मायी!

जो प्रकट हुए निशानाथ हैं नभ में,

गगन ने शबनम की बूँदे बरसायीं!।


पूर्णमासी की उज्जवल निशा आज,

चाँदनी को लाख उलाहने देती है,

चाँद से पाकर चमक हाय री!

कालिमा, तमस मेरी हर लेती है!।


पथिक देखकर जिससे दिशा अपनी,

खोज ढूंढ़ता अपनी राह है,

जो खत्म हुई ये रात्रि उजियारी!

गगन में प्रतिक्षण बढ़ता उत्साह है।।


रश्मि भरकर जो निकलेगा दिनकर,

लहरे अब सागर की डोलेंगीं,

जो सोए हुए थे सारे नभचर!

वो सारी चिड़िया अब बोलेंगी।।


श्याम रात को भेद है आया,

लगता अति मोहक है उजियारा!

चलें प्रकृति क्रम वैसा ही,

भोर है जीती, तम है हारा।।


सुंदर अभिराम सरोवर तट पर,

खग विहग चहकने लगते हैं!

हरियाली का है नूतन उत्सव,

सब पुष्प फूल महकने लगते हैं।।


इस क्रम में कोयल का कलरव,

नव संचित ऊर्जा लाता है!

धरा प्रसन्न इस महाउत्सव से,

अंबर भी तनिक तनिक मुस्काता है।।


इस प्रकृति के सुंदर अवसर में,

मैं स्याही लेकर लिखती हूँ।

नूतन सा ये रंग रूप है,

सौम्यता का अनुभव करती हूँ।।


जो छूट जाए लेखनी हाथ से,

पर्यावरण खिलता ही जा रहा है!

वन कानन में कोयल गूँज रही,

मन संवरता ही जा रहा है।।


चलो मुस्काती हुई इस प्रकृति का,

मैंने शब्दों से अभिषेक किया!

मृदुल मृदुल शीतल अनुभव ने,

मुझे भाव पूर्ण अतिरेक किया।।


सुंदर सांझ, सुंदर सुबह!

सुंदरता की अविरल महिमा का।

रखती हूँ कलम, शब्द नहीं हैं,

अनुभव करती एक द्विधा का।।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन